सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

संयुक्त परिवार व्यवस्था किसी भी समाज की रीढ़ होती है

संयुक्त परिवार व्यवस्था किसी भी समाज की रीढ़ होती है, जो न केवल सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिरता प्रदान करती है, बल्कि आर्थिक मजबूती और पारिवारिक सुरक्षा का आधार भी होती है। भारत में यह व्यवस्था हजारों वर्षों से चली आ रही थी, लेकिन वैश्विक शक्तियों, विशेष रूप से ग्लोबल मार्केट फोर्सेज, डीप स्टेट, और इंश्योरेंस माफिया द्वारा इसे योजनाबद्ध तरीके से कमजोर किया जा रहा है। यह कोई संयोग नहीं है कि पश्चिमी देशों, जापान और अब चीन में पहले से ही यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और अब वही षड्यंत्र भारत में चल रहा है।

इस पूरी योजना का मूल कारण व्यावसायिक हितों की पूर्ति है। ग्लोबल मार्केट फोर्सेज चाहती हैं कि पारिवारिक सुरक्षा व्यवस्था समाप्त हो, जिससे लोग पूरी तरह बाज़ार पर निर्भर हो जाएँ। यदि संयुक्त परिवार व्यवस्था बनी रहती है, तो लोग एक-दूसरे की मदद से जीवन के उतार-चढ़ाव से निपट सकते हैं, लेकिन जब एकल परिवार और अकेले रहने की प्रवृत्ति बढ़ती है, तो व्यक्ति को हर छोटी-बड़ी चीज़ के लिए बाज़ार और कंपनियों पर निर्भर होना पड़ता है। यह पूरी प्रक्रिया एक योजनाबद्ध षड्यंत्र का हिस्सा है, जिसे सरकार, वामपंथी विचारधारा और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के माध्यम से लागू किया जा रहा है।

डीप स्टेट, जिसे दुनिया के टॉप 50 कॉरपोरेट हाउस संचालित करते हैं, अप्रत्यक्ष रूप से विश्व की सरकारों को नियंत्रित करते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य अपने व्यावसायिक हितों को आगे बढ़ाना होता है, और इसके लिए वे समाज की मूल संरचनाओं को तोड़ने में भी संकोच नहीं करते। पारंपरिक परिवार व्यवस्था उनके लिए सबसे बड़ी बाधा है, क्योंकि यह समाज को आत्मनिर्भर बनाती है और बाज़ार की पूर्ण निर्भरता को रोकती है। इसलिए वे सरकारों पर दबाव बनाकर नीतियों में बदलाव करवाने की कोशिश करते हैं, जिससे पारिवारिक और सामाजिक संरचना कमजोर हो।

इंश्योरेंस माफिया इस पूरी योजना में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। संयुक्त परिवार व्यवस्था में बुजुर्गों, बच्चों और बीमार व्यक्तियों की देखभाल परिवार के अन्य सदस्य करते हैं, जिससे बीमा कंपनियों का व्यापार सीमित रहता है। लेकिन जब परिवार व्यवस्था कमजोर होती है और लोग एकल परिवार में रहने लगते हैं, तो उन्हें हर चीज़ के लिए बीमा खरीदने की आवश्यकता पड़ती है—चाहे वह स्वास्थ्य बीमा हो, जीवन बीमा हो, रिटायरमेंट प्लान हो या फिर चाइल्ड एजुकेशन प्लान।

यह बीमा कंपनियाँ सरकार पर दबाव डालकर ऐसी नीतियाँ बनवाती हैं, जिससे पारिवारिक सहयोग की व्यवस्था कमजोर हो। सरकार पर दबाव डालने के लिए ये कंपनियाँ लॉबिंग (Lobbying) करती हैं, राजनीतिक दलों को चंदा देती हैं और मीडिया व शिक्षा तंत्र के माध्यम से एकल परिवार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर परिवार विघटन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाती हैं। यदि किसी सरकार में इन नीतियों को लागू करने में कठिनाई होती है, तो वे वामपंथी विचारधारा और उनके NGO को फंडिंग करके अपने उद्देश्यों को पूरा करवाते हैं।

वामपंथियों और उनके NGO का मुख्य कार्य परिवार, समाज, राष्ट्र और संस्कृति जैसी संस्थाओं को ध्वस्त करना होता है, क्योंकि उनका वैचारिक आधार ही समाज में संघर्ष पैदा करना और पारंपरिक मूल्यों को खत्म करना है। ये NGO महिलाओं के अधिकारों, LGBTQ+ समुदाय, दलित उत्थान और अन्य सामाजिक सुधारों के नाम पर ऐसे अभियान चलाते हैं, जो अंततः परिवार व्यवस्था को कमजोर करने का काम करते हैं। ये संगठन विवाह और मातृत्व को दमनकारी संस्थाएँ बताकर महिलाओं को विवाह और परिवार से दूर करने की कोशिश करते हैं। वे बच्चों को माता-पिता की बजाय सरकारी संस्थाओं और बाज़ार-निर्भर सेवाओं पर निर्भर बनाने के लिए काम करते हैं।

जापान और पश्चिमी देशों का उदाहरण

यह प्रक्रिया जापान और पश्चिमी देशों में पहले ही अपनाई जा चुकी है। जापान में संयुक्त परिवार व्यवस्था को पिछड़ा बताकर तोड़ने का प्रयास किया गया। सरकार ने एकल परिवारों को प्रोत्साहित करने वाली नीतियाँ लागू कीं और महिलाओं को यह विश्वास दिलाया कि करियर और स्वतंत्रता ही सर्वोपरि हैं, जबकि विवाह और मातृत्व एक बंधन हैं। परिणामस्वरूप, वहाँ विवाह दर गिरने लगी और जन्म दर इतनी कम हो गई कि अब वहाँ की सरकार प्रोत्साहन योजनाएँ लागू करने के बावजूद इस संकट को रोक नहीं पा रही है।

जापान में कॉर्पोरेट संस्कृति ने भी इस संकट को और बढ़ा दिया, जहाँ कर्मचारियों को इतना अधिक काम दिया जाता है कि उनके पास परिवार बसाने या बच्चों की परवरिश के लिए समय ही नहीं बचता। मनोरंजन और मीडिया इंडस्ट्री ने पोर्नोग्राफी, आभासी साथी (Virtual Companions), एनीमे और रोबोट पार्टनर जैसी अवधारणाओं को प्रचलित कर दिया, जिससे लोगों की पारंपरिक संबंधों में रुचि खत्म होने लगी।

पश्चिमी देशों में भी ग्लोबल मार्केट फोर्सेज ने विवाह और पारिवारिक जीवन को हतोत्साहित करने के लिए नारीवाद के उग्र स्वरूप का उपयोग किया। महिलाओं को यह सिखाया गया कि विवाह और मातृत्व उनकी प्रगति में बाधक हैं। तलाक कानून इतने सरल बना दिए गए कि विवाह एक अस्थायी अनुबंध बनकर रह गया। LGBTQ+ और एकल मातृत्व को सामान्य बनाकर पारंपरिक परिवार को अप्रासंगिक बना दिया गया।

चीन का उदाहरण

चीन में भी पारिवारिक संरचना में बदलाव की प्रक्रिया को देखा जा सकता है। चीनी सरकार ने 1979 में एक संतान नीति लागू की थी, जिससे परिवारों को केवल एक बच्चा पैदा करने की अनुमति दी गई थी। इस नीति के तहत चीन में परिवारों की संख्या कम होने लगी और जनसंख्या असंतुलित हो गई। हालांकि अब चीनी सरकार ने इसे बदलने का प्रयास किया है, लेकिन इस नीति के प्रभाव से चीन में वृद्धावस्था और श्रमिकों की कमी का संकट उत्पन्न हो गया है। चीन में युवाओं का अपने माता-पिता की देखभाल करने के प्रति उदासीनता बढ़ी है और पारंपरिक परिवारिक बंधन टूटने लगे हैं।

भारत में असर

अब यही प्रक्रिया भारत में दोहराई जा रही है। शिक्षा और मीडिया में परिवार-विरोधी विचारधारा को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे नई पीढ़ी पारंपरिक परिवार संरचना को अस्वीकार करने लगे। सरकार पर दबाव डालकर ऐसी नीतियाँ बनवाई जा रही हैं, जो परिवार को कमजोर करें। यदि सरकारें इस एजेंडे को लागू करने से बचती हैं, तो वामपंथी संगठन और NGO को फंडिंग देकर उन्हें सक्रिय कर दिया जाता है।

इसका सीधा प्रभाव हिंदू समाज की जन्म दर पर पड़ रहा है। वर्तमान में हिंदुओं की जन्म दर 1.9 है, जो प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से नीचे जा चुकी है। यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो आने वाले दशकों में हिंदू समाज अपनी जनसंख्या संतुलन खो सकता है। इसके विपरीत, मुस्लिम समुदाय की जन्म दर 2.9 है, जो हिंदुओं की तुलना में अधिक है। इतिहास गवाह है कि जहाँ भी मूल जनसंख्या का जन्म दर गिरा और एक विशेष समुदाय का बढ़ा, वहाँ सांस्कृतिक और धार्मिक संतुलन बदल गया।

यदि हिंदू समाज को अपनी पहचान बचानी है, तो सबसे पहले अपनी संयुक्त परिवार व्यवस्था को पुनः स्थापित करना होगा। जब परिवार मज़बूत होगा, तो विवाह और संतानोत्पत्ति को सामाजिक समर्थन मिलेगा। प्रत्येक हिंदू परिवार को न्यूनतम तीन संतान उत्पन्न करने की आवश्यकता है, ताकि जनसंख्या संतुलन बना रहे। साथ ही, हिंदू आर्थिक मॉडल को अपनाना होगा, जिससे परिवार और समाज आत्मनिर्भर बन सके। शिक्षा प्रणाली में पारिवारिक और धार्मिक मूल्यों को अनिवार्य करना होगा, ताकि युवा पीढ़ी इन मूल्यों को अपनाने के लिए प्रेरित हो।

कल जय सनातन भारत की गोष्ठी में राजीव कुमार गर्ग जी ने जो विचार प्रस्तुत किए, उन्हें गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। कई लोग उन्हें दड़वादी या नकारात्मक कहकर उनकी बातों को नकार देते हैं, लेकिन जो सत्य वह कह रहे हैं, वही इस दुनिया की वास्तविकता है।

धर्म, संस्कृति, राष्ट्र और परिवार—ये चार स्तंभ ही समाज को एकजुट रखते हैं। ग्लोबल मार्केट फोर्सेज और उनके द्वारा पोषित वामपंथी शक्तियाँ इन्हें ध्वस्त करने में जुटी हैं।

यदि हम हिंदू संयुक्त परिवार व्यवस्था और अपनी जनसंख्या को नहीं बचा पाए, तो हिंदू समाज का अस्तित्व संकट में पड़ सकता है। अतः हमें अपनी प्राथमिकताओं को पुनः निर्धारित करना होगा और अपनी संस्कृति, परिवार एवं समाज की रक्षा के लिए सक्रिय कदम उठाने होंगे। यह केवल एक सामाजिक या सांस्कृतिक संघर्ष नहीं है, बल्कि हिंदू सभ्यता के अस्तित्व की लड़ाई है।

✍️दीपक कुमार द्विवेदी

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