सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

अपने बलिदानियों और धर्म योद्धाओं का सम्मान करना क्यों आवश्यक है

जब मुसलमान कबीलाई अवस्था में थे, तब भी वे लूट के धन से अपना तंत्र स्थापित करते थे। आज पेट्रो-डॉलर का धन है, जिसके बल पर वे संसार में अपना व्यापक तंत्र स्थापित कर चुके हैं। हम, सब कुछ खोकर भी, अपने आचरण को सुधारने के लिए तैयार नहीं हैं। चंदन गुप्ता के हत्यारों का मुकदमा भी संभवतः हिंदू वकील ही लड़ रहे होंगे। चंदन गुप्ता के हत्यारों को बचाने के लिए दुनिया भर के सात एनजीओ खड़े हो गए हैं। हम लोग अपने चंदन गुप्ता के परिवार को उनके हाल पर छोड़ चुके हैं। चंदन गुप्ता के परिवार की हमने कभी सुध भी नहीं ली।

इस्लाम, ईसाईयत और वामपंथ के संगठित गिरोहों से संघर्ष करने के लिए न तो हमारे पास कोई व्यवस्थित तंत्र (इको-सिस्टम) है और न ही कोई सुदृढ़ जनशक्ति (स्ट्रीट पावर)। वे अपने हत्यारों के साथ अडिग खड़े हो जाते हैं, जबकि हम अपने बलिदानियों और योद्धाओं के परिवारों की चिंता भी नहीं कर पाते। उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है। फिर हम प्रश्न करते हैं कि भारत हिंदू राष्ट्र क्यों नहीं बन रहा है? सरकार कुछ क्यों नहीं कर रही है?

हमने स्वयं से यह प्रश्न कभी नहीं किया कि हम क्या कर रहे हैं। हम चाहते हैं कि दूसरे का बेटा भगत सिंह बने, लेकिन अपने घर का बेटा भगत सिंह बने, यह नहीं चाहते। फिर हम कहते हैं कि सरकार कुछ नहीं कर रही। हमने कभी दर्पण में स्वयं को देखकर यह विचार नहीं किया कि हमने अपने योद्धाओं के लिए क्या किया है।

ऐसा भी नहीं कि सभी ऐसे हैं जो अपने लोगों और धर्मयोद्धाओं का, बलिदानियों का सम्मान नहीं करते। कुछ धर्मनिष्ठ सनातनी हैं, जिन्होंने अपना समूचा जीवन राष्ट्र और समाज के लिए समर्पित कर दिया है। वहीं, कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें जीवन के आरंभिक काल में धर्म और समाज के लिए कार्य करने का अवसर नहीं मिला। लेकिन जब उन्हें वर्तमान परिस्थितियों का ज्ञान हुआ और स्थितियाँ विकट हो गईं, तो उन्होंने अपने स्तर पर इस दिशा में प्रयास भी किए। उन्होंने आर्थिक और सामाजिक रूप से अपने योद्धाओं और बलिदानियों के साथ खड़े होकर उन्हें सबल प्रदान किया।

लेकिन ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है। वहीं इस्लामी, ईसाई और वामपंथी गिरोह अपने लोगों के साथ हर स्थिति में खड़े होते हैं, चाहे उनके लोग दोषी ही क्यों न हों। लेकिन हम लोग छोटी-सी बात पर प्रश्नचिह्न खड़े करने लगते हैं। अपने संगठन, अपने धर्मयोद्धाओं, यहाँ तक कि बलिदानियों के परिवारों, संगठनों और अपने राजनीतिक नेतृत्व के साथ खड़े होने की बात तो छोड़ ही दीजिए।

उनके यहाँ ऐसा नहीं है। इसी कारण उनका तंत्र (इको-सिस्टम) वैश्विक स्तर पर मजबूत है। हमारी स्थिति बहुत विकट है।

उनके यहाँ (विरोधी गुटों में), हत्यारों को बचाने के लिए सैकड़ों गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) खड़े हो जाते हैं। हमारे यहाँ तो धर्म के लिए बलिदान देने वालों को भी समय के साथ भुला दिया जाता है। हरियाणा की निकिता तोमर, जिसे दिनदहाड़े एक जिहादी ने सड़क पर गोली मार दी, कितने लोगों को याद है? राजस्थान के कन्हैयालाल और उमेश कोल्हे कितनों को स्मरण हैं? झारखंड की वह बहन, जिसे शाहरुख ने जला दिया, कितनों को ज्ञात है? दिल्ली के अंकित सक्सेना, जो अपने परिवार का एकमात्र सहारा थे, और जिन्हें जिहादियों की भीड़ ने घेरकर मार डाला, कितनों को याद हैं?

आईबी अधिकारी अंकित शर्मा, जिनका शव नाली से निकाला गया, जिन्हें करंट देकर सैकड़ों बार चाकुओं से गोदा गया, कितनों को स्मरण है? बहराइच के गोपाल मिश्रा, जिन्हें छत पर भगवा ध्वज फहराने के कारण गोली मार दी गई, कितने लोग जानते हैं? ऐसी अनगिनत कहानियाँ हैं, जिन्हें कोई नहीं जानता।

हम इन परिवारों की कितनी सहायता कर पाए? उनके लिए क्या किया, जो धर्म और समाज के लिए कार्य कर रहे हैं? न हम बलिदानियों का साथ दे पा रहे हैं, न अपने योद्धाओं का। फिर हम कहते हैं कि भारत अखंड क्यों नहीं बनता।

अखंड भारत और हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए सर्वस्व त्याग और समर्पण करना होगा। यह तभी संभव है, जब हम संगठित होकर अपने बलिदानियों और योद्धाओं का पूर्ण समर्थन और सम्मान करें।

✍️ दीपक कुमार द्विवेदी 

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