सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

हिंदू समाज: वर्तमान चुनौतियाँ और समाधान का मार्ग

आज महेंद्र जी भाईसाहब से एक विषय पर चर्चा हो रही थी: हिंदू समाज के समक्ष वर्तमान परिस्थितियों में विकल्प क्या है और हिंदू समाज अपनी लड़ाई कैसे लड़ सकता है? जब हमारे संगठन और हमारा नेतृत्व वैचारिक रूप से दिग्भ्रमित है, तो यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है। क्योंकि जब हमारे नेतृत्वकर्ता यह कहते हैं कि भारत बुद्ध का देश है और हमने कभी किसी पर आक्रमण नहीं किया, तो इससे यह स्पष्ट होता है कि हमारे नेतृत्वकर्ता यह भूल चुके हैं कि शांति तभी संभव है जब हमारे पास शक्ति और बाहुबल हो। शक्ति और बाहुबल न होने पर शांति कभी संभव नहीं हो सकती।

इस संदर्भ में रामायण का उदाहरण लिया जा सकता है, जहाँ भगवान राम ने कमजोर और शोषित सुग्रीव को अपना मित्र बनाया, जबकि राजा बाली का वध भगवान राम ने छिपकर करना पड़ा। भगवान राम के पास विकल्प था कि राजा बाली का साथ लेकर लड़े, लेकिन उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए सत्ता और शक्ति नहीं, बल्कि सत्य, न्याय और नीति को चुना। इसी कारण उन्होंने सुग्रीव को मित्र बनाया क्योंकि धर्म सुग्रीव के साथ था। अधर्मी राजा बाली का वध एक राजा के प्रतिनिधि होने के नाते मनुस्मृति के अनुसार किया गया था। यही बात आज के संदर्भ में लागू होती है। सत्ता हमेशा स्थाई नहीं रहती है, शक्ति हमेशा आपके पास नहीं रहेगी, लेकिन धर्म हमेशा शाश्वत रहता है। जो धर्म के अनुरूप नहीं चल सकता, उसका विनाश तय है।

हमारे राजनीतिक शास्त्र के चार प्रमुख सिद्धांतों में साम, दाम, दण्ड, भेद का उल्लेख है, और यही सिद्धांत राजा को मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। इस प्रसंग में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की एक बात याद आती है, उन्होंने एक वरिष्ठ पत्रकार से कहा था कि "जो राजा दण्ड नीति का प्रयोग नहीं कर सकता, उसे मैं राजा नहीं मानता।" इस बात में एक गहरी सच्चाई है, क्योंकि यदि हम दुष्टों को उनके बुरे कर्मों के अनुसार दण्ड नहीं देंगे, तो वे अराजक हो जाएंगे और राज्य की व्यवस्था को ध्वस्त कर देंगे।

भारत में पिछले ढाई हजार वर्षों में सद्गुण के विकृति के कारण कारण हिंदू समाज का राजनीतिक नेतृत्व धर्म के मूल सिद्धांतों को भूल चुका है, जिससे आज यह स्थिति उत्पन्न हो गई है। यदि हम आज की स्थिति का विश्लेषण करें तो यह पाएंगे कि हिंदू समाज अगले 10-15 वर्षों में एक बड़ी और भयावह स्थिति का सामना करने जा रहा है, जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की होगी। बंगाल, केरल, उड़ीसा, बिहार, तमिलनाडु, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पूर्व-पश्चिम के कुछ हिस्सों में बड़ा नरसंहार होने की संभावना है, जिसमें 20 से 25 करोड़ हिंदू मारे जा सकते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि हिंदू समाज अपनी लड़ाई दूसरों के कंधे पर रखकर लड़ना चाहता है, स्वयं कुछ नहीं करना चाहता, जिससे हिंदू समाज पिछले ढाई हजार वर्षों से धोखा खा रहा है और आगे भी खाता रहेगा।

इस चर्चा के दौरान एक प्रश्न आया कि आपात स्थिति में हिंदू समाज कैसे प्रतिक्रिया देता है। मैंने कहा कि हिंदू समाज आपात स्थिति में प्रतिक्रिया देता है, लेकिन बिना तैयारी के प्रतिक्रिया देना बहुत घातक होता है। महाभारत से उदाहरण लिया जा सकता है, जहाँ पांडवों ने 12 वर्ष का वनवास और 1 वर्ष का अज्ञातवास बिताकर अपनी सेना को तैयार किया था। अर्जुन ने भगवान शिव की तपस्या कर पाशुपात्र प्राप्त किया, साथ ही अन्य देवताओं से शस्त्र प्राप्त किए। भगवान राम ने भी अपनी वानर और भालू की सेना बनाई, अकेले नहीं लड़े। यह स्पष्ट है कि बिना समाज के सहयोग के कोई युद्ध नहीं लड़ा जा सकता। यदि भगवान हमारे लिए युद्ध करने के लिए अवतार लें, तो समाज को सैनिक की भूमिका में खड़ा होना होगा। तभी हम युद्ध में विजय प्राप्त कर सकते हैं।

इसलिए हिंदू समाज को सैनिक बनना पड़ेगा। भविष्य में स्थिति खराब होने से बचने के लिए हिंदू समाज का सैन्यीकरण बहुत आवश्यक है। हमें 15 से 20 करोड़ सैन्य प्रशिक्षित और अनुशासित युवा चाहिए, तभी हम म्लेच्छों से युद्ध में जीत सकते हैं।

इस चर्चा के दौरान एक अन्य प्रश्न आया कि हमारी लीडरशिप कहती है कि हम बुद्ध के देश हैं और हमने कभी किसी पर आक्रमण नहीं किया। यह कहते हुए हमारे नेता क्यों भूल जाते हैं कि जब भगवान राम ने अश्वमेध यज्ञ किया, तब पूरी दुनिया में रघुवंश का ध्वज लहराया। महाभारत काल में युधिष्ठिर ने दो बार अश्वमेध यज्ञ किया, एक बार इंद्रप्रस्थ लेने के बाद और दूसरी बार महाभारत युद्ध के बाद। इसके अलावा विक्रमादित्य और पुष्यमित्र शुंग ने भी अश्वमेध यज्ञ किए। हमारे चक्रवर्ती सम्राट 70 देशों में राज करते थे, और यह सब बिना युद्ध लड़े और विस्तारवादी नीति अपनाए संभव नहीं था। यह दुनिया उसी की बात सुनती है जिसके पास समर्थ होता है, और जिनके पास समर्थ नहीं होता, उनकी बात कोई नहीं सुनता।

हमारे जगत जननी महाकाली युद्धभूमि में असुरों का रक्त पान करती हैं, और हम यह कहते हैं कि हमने कभी किसी पर आक्रमण नहीं किया, तो हम अपने आप से झूठ बोल रहे हैं।

अंत में एक और बात आती है, क्या म्लेच्छों को अवसर मिलेगा तो हमें क्या छोड़ेंगे? पिछले ढाई हजार वर्षों में हमारे राजनीतिक नेतृत्व ने सद्गुणों को विकृत कर म्लेच्छों को क्षमा देने की नीति अपनाई है। बौद्धों को एक राजा ने स्थान दिया और बौद्ध धर्म स्वीकार किया, लेकिन इसका परिणाम यह हुआ कि बौद्धों ने वैदिक धर्म से घृणा शुरू कर दी। मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को 17 बार माफ किया, लेकिन 18वीं बार मौका पाकर उसकी आँखें निकाल ली। इसी तरह की गलती 1857 में हुई, जब मुग़ल बादशाह बहादुर शाह जफर को अपने सेनापति के रूप में लिया गया। फिर 1920 के खलीफात आंदोलन का समर्थन किया, जिसके परिणामस्वरूप भारत विभाजन हुआ और लाखों हिंदू मारे गए। लेकिन हम आज भी अपनी गलतियों से नहीं सीखते।

इस संदर्भ में नागरिकता संसोधन कानून के विरुद्ध आंदोलन के वक्त एक मुस्लिम महिला पत्रकार की टिप्पणी याद आती है, जिसमें उसने कहा था कि "हमने रणनीति बदली है, (ideology) अर्थात विचारधारा नहीं बदली है।" पाकिस्तान बनने के बाद भारत की सड़कों पर यह नारा लगाया गया था "लड़कर लिया पाकिस्तान, हंसकर लेंगे हिंदुस्तान।" वे हमेशा अवसर की तलाश में रहते हैं, जबकि हम धर्म के मूल सिद्धांतों को भूल चुके हैं और सत्य को स्वीकार नहीं करना चाहते।

सत्य को स्वीकार करते हुए, मनुस्मृति में धर्म के दस लक्षण का स्मरण करना चाहिए : धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, स्वच्छता, इन्द्रियों पर नियंत्रण, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना। हमने धर्म के दस लक्षणों को भूल दिया है और पुरुषार्थ करना भी छोड़ दिया है।

ईसाईयों ने अर्थ को अपने लक्ष्य के साधन के रूप में लिया और वे 157 देशों में हैं। मुस्लिमों ने काम को अपने लक्ष्य के साधन के रूप में लिया और वे 57 देशों में हैं। लेकिन हम अपने धर्म, कुलधर्म और परंपराओं पर गौरव महसूस नहीं करते, जिसके कारण हमारा राजनीतिक नेतृत्व दिग्भ्रमित हो चुका है।

इसलिए हमें अपने धर्म और सिद्धांतों के अनुसार लड़ाई लड़नी होगी। यही एकमात्र रास्ता है, अन्यथा स्थितियाँ बहुत विकट हो सकती हैं।

मनुस्मृति के श्लोक के साथ अपनी बात समाप्त करता हूँ:

नास्य छिद्रं परो विद्याच्छिद्रं विद्यात्परस्य तु।
गूहेत्कूर्म इवांगानि रक्षेद्विवरमात्मन:।
वकवच्चिन्तयेदर्थान् सिंहवच्च पराक्रमेत्।
वृकवच्चावलुम्पेत शशवच्च विनिष्पतेत्॥

अर्थ: शत्रु को अपने छिद्र (निर्बलता) को न जानने दें और स्वयं शत्रु के छिद्रों को जानें। जैसे कछुआ अपने अंगों को गुप्त रखता है, वैसे ही शत्रु के प्रवेश करने के छिद्रों को गुप्त रखें। जैसे बगुला मछली पकड़ने के लिए ध्यानमग्न रहता है, वैसे ही अर्थसंग्रह का विचार करें। शस्त्र और बल बढ़ाकर शत्रु को सिंह के समान पराक्रम से जीतें। शत्रु को चीते की तरह पकड़ें और जैसे शश (खरगोश) के समान शत्रु से दूर भागें और बाद में उन्हें छल से पकड़ें।

हमें इस महान हिंदू सभ्यता और धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष करना होगा, अन्यथा भविष्य में हमें कोई अवसर नहीं मिलेगा।

✍️ दीपक कुमार द्विवेदी

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