सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व और हिन्दू समाज: पहचान, सांस्कृतिक विभाजन और राष्ट्रवाद के विरोधाभास

वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व का विचारधारा और समाज, संस्कृति तथा इतिहास की समझ के प्रति दृष्टिकोण, बहुत ही अस्पष्ट और विरोधाभासी प्रतीत होता है। विशेष रूप से, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जिसने हमेशा व्यक्ति पूजा का विरोध किया, उसी संघ के विचार प्रवाह से उत्पन्न भारतीय जनता पार्टी (BJP) का नेतृत्व अब उसी व्यक्ति पूजा को प्रोत्साहित करता हुआ दिख रहा है। यह राजनीतिक विरोधाभास न केवल चिंताजनक है, बल्कि समाज के लिए भी खतरनाक संकेत प्रदान करता है। साथ ही, वर्तमान नेतृत्व ने ‘कल्चरल मार्क्सवाद’ के सिद्धांतों और उसके प्रमुख औजारों में से एक, पहचान की राजनीति (Identity Politics), को न समझते हुए उसे ही बढ़ावा देना शुरू कर दिया है।

कल्चरल मार्क्सवाद का मुख्य उद्देश्य समाज में पहचान की राजनीति के माध्यम से वर्ग संघर्ष और द्वंद्व उत्पन्न करना है। इसके तहत हिंदू समाज को जाति, वर्ग और धर्म के आधार पर विभाजित किया जाता है। यह केवल समाज में विभाजन नहीं पैदा करता, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक एकता को भी खत्म करने की दिशा में काम करता है। वर्तमान में, राष्ट्रवादी वर्ग ने इस सिद्धांत की गंभीरता को समझे बिना ही इसे बढ़ावा दिया है।

पहले, उन्होंने सरदार पटेल को 'भगवान' बना दिया, फिर महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव अंबेडकर का महिमामंडन करते हुए उन्हें देवतुल्य बना दिया। इसके परिणामस्वरूप, हिंदू समाज एक अजीब भ्रम और विभ्रम में फंसा हुआ है। संविधान का 'कुरानीकरण' किया जा रहा है, जिसके कारण हिंदू समाज को भविष्य बहुत बड़े संकटों का सामना करना पड़ेगा। 

यदि समान नागरिक संहिता (UCC) लागू होती है, तो यह संकट और भी गहरा हो जाएगा। हिंदू समाज, जो अभी यह कहने का साहस करता है कि “भारत हिंदुओं का देश है और इसे हिंदू राष्ट्र होना चाहिए,” भविष्य में इस बात को कहने की स्थिति में नहीं रहेगा। UCC के प्रभाव में, हिंदू समाज को पश्चिमी ‘सेकुलरिज़्म’ के सिद्धांतों को अनिवार्य रूप से स्वीकार करना होगा। इस्लाम और ईसाई समाज की जनसंख्या वृद्धि और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का उपयोग करके वे सत्ता पर नियंत्रण स्थापित कर लेंगे। इसके बाद, हिंदू समाज को 'सेकुलरिज़्म' और 'समाजवाद' की विचारधारा के माध्यम से दबाया जाएगा, जिससे वह अपनी सांस्कृतिक पहचान और अधिकारों की मांग नहीं कर सकेगा।

इस्लाम, ईसाईयत और वामपंथ की विचारधाराएँ अपने उद्देश्यों से कभी विचलित नहीं होतीं। इनका अंतिम उद्देश्य हिंदू सभ्यता और उसकी वैदिक परंपरा का उन्मूलन करना है। पिछले 80 वर्षों में, सरकारों ने योजनाबद्ध तरीके से हिंदू समाज की 85% बहुसंख्यक आबादी को 'शोषित', 'वंचित' और 'पिछड़ा' घोषित किया है। यह कार्य चर्च और विदेशी शक्तियों के दबाव में हुआ है।

भारत एक ऐसा दुर्लभ देश है, जहाँ बहुसंख्यक हिन्दू समाज की 85% आबादी को शोषित वंचित ‘पीड़ित’ और ‘पिछड़ा’ घोषित किया गया। अन्य देशों में जहाँ चर्च ने मूल निवासियों को मतांतरित किया या समाप्त किया, वहाँ कभी उन्हें विशेषाधिकार नहीं मिले। लेकिन भारत, जो हमेशा एक सभ्य और समानता आधारित समाज रहा, में बहुसंख्यक हिंदू समाज की 85% आबादी को सरकारों द्वारा संवैधानिक व्यवस्था दुरपयोग करते हुए शोषित वंचित पीड़ित’ और ‘पिछड़ा’ सिद्ध करना एक दुर्भाग्यपूर्ण छल है।

इतिहास साक्षी है कि जहाँ-जहाँ वैदिक सनातन धर्म का लोप हुआ, वहाँ हिंदू और सनातन वैदिक धर्म रूपी वटवृक्ष निकले मतो के अनुयायी समाप्त हो गये । नवबौद्ध आंदोलन, इस्लाम और ईसाई धर्म के प्रसार के अंतिम चरण का रूप हैं। भारत पर मुस्लिम आक्रमण इसलिए सफल हुआ क्योंकि अफगानिस्तान बौद्ध बहुल था और उसने इस्लामी आक्रमणकारियों का समर्थन किया था। वीर सावरकर ने इस तथ्य का स्पष्ट उल्लेख अपनी पुस्तक स्वर्णिम छः पृष्ठ में किया है।

भारतीय संविधान पूरी तरह से अवैदिक मतो के प्रभाव एवं अब्राहमिक पंथों को तुष्ट करने पर आधारित है। संविधान के प्रतीक-चिह्न और विचारधारा बौद्ध मत और मौर्यकाल से प्रभावित हैं, लेकिन इसमें भारत की आत्मा वैदिक सनातन धर्म का कोई स्थान नहीं है। यही उपेक्षा हिंदू सभ्यता के विलुप्त होने का प्रमुख कारण बनेंगी।

राष्ट्रवादी दक्षिणपंथी वर्ग, जो सनातन धर्म और हिंदुत्व की बात करता है, नीतिगत स्तर पर उन्हीं शक्तियों का समर्थन करता दिखाई देता है, जो वैदिक परंपराओं के विरोधी हैं। वहीं दूसरी ओर, कांग्रेस और विपक्ष का उद्देश्य साफ है—सनातन धर्म का उन्मूलन कर ईसाई तंत्र स्थापित करना। 

यह एक अत्यंत चिंताजनक स्थिति है, क्योंकि राष्ट्रवादी वर्ग ने वैदिक परंपराओं और हिंदुत्व की रक्षा के बजाय ऐसी नीतियों को अपनाया है, जो इस्लामी और ईसाई ताकतों के लिए रास्ता सुगम बना रही हैं। यदि हिंदू समाज को अपनी वैदिक धर्म और सांस्कृतिक पहचान को बचाना है, तो उसे वैचारिक स्पष्टता, रणनीतिक नीतियाँ और संगठित प्रयास करने होंगे। अन्यथा, यह सभ्यता शनैः-शनैः लुप्त हो जाएगी।

✍️ दीपक कुमार द्विवेदी

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