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सेक्युलरवाद की आड़ में राजनीतिक अवसरवाद: बांग्लादेश के हिंदू नरसंहार पर चुप्पी और विपक्ष का अदानी-मोदी प्रोपगैंडा"


बांग्लादेश में हिंदू समुदाय पर हो रहे अत्याचारों ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है। हिंदू बहन-बेटियों के साथ बलात्कार, मंदिरों और मूर्तियों का विध्वंस, और संतों को जेल में डालने की घटनाएं, धर्म और मानवता दोनों पर हमला हैं। भारत का सनातन समाज सड़कों पर उतर कर विरोध कर रहा है। यहां तक कि ब्रिटेन की संसद में इस मुद्दे पर सवाल उठाए जा रहे हैं। लेकिन भारत का विपक्ष, जो हर मुद्दे पर मोदी सरकार को घेरने के लिए तत्पर रहता है, इस गंभीर विषय पर चुप है। इसके विपरीत, वह अदानी और मोदी के नाम पर मूर्खतापूर्ण प्रोपगैंडा सेट कर रहा है, जो न केवल उनकी प्राथमिकताओं की कमी को उजागर करता है, बल्कि उनकी राजनीतिक कायरता को भी दिखाता है।कांग्रेस, जिसने एक समय में भारत को एकजुट रखने की जिम्मेदारी निभाई थी, आज हिंदू समाज के प्रति इतनी असंवेदनशील हो चुकी है कि वह बांग्लादेश में हिंदू महिलाओं के साथ हो रहे बलात्कार और नरसंहार जैसे मुद्दों पर भी अपनी आवाज नहीं उठा रही। राहुल गांधी, जो खुद को "भारत जोड़ो" अभियान का प्रमुख बताते हैं, इस मामले पर मौन हैं। क्या उनका भारत जोड़ो केवल राजनीतिक नारेबाजी है? प्रियंका गांधी, जो महिला अधिकारों के लिए आवाज उठाने का दावा करती हैं, बांग्लादेश में हिंदू महिलाओं के साथ हो रहे अमानवीय अपराधों पर क्यों नहीं बोल रहीं? क्या उनका नारीवाद केवल राजनीतिक लाभ के लिए है?

वामपंथी और कम्युनिस्ट पार्टियां, जो अक्सर मानवाधिकारों की बात करती हैं, उनकी चुप्पी भी चिंताजनक है। यह वही दल हैं, जो भारत में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के नाम पर बड़े-बड़े आंदोलन करते हैं। लेकिन जब बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के खिलाफ सुनियोजित नरसंहार और धार्मिक उत्पीड़न हो रहा है, तब वे इस पर एक शब्द भी नहीं बोल रहे। यह क्या दर्शाता है? क्या यह उनकी हिंदू-विरोधी मानसिकता का स्पष्ट प्रमाण नहीं है?

यह चुप्पी इसलिए और भी अधिक शर्मनाक है, क्योंकि यह केवल नैतिकता का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों का उल्लंघन है। अगर भारत के विपक्षी दल वास्तव में धर्मनिरपेक्ष हैं, तो उन्हें बांग्लादेश के हिंदू समुदाय के लिए अपनी आवाज उठानी चाहिए थी। उन्हें भारत सरकार पर दबाव बनाना चाहिए था कि वह इस मामले को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाए। लेकिन उनकी निष्क्रियता यह दर्शाती है कि उनके लिए सेक्युलरवाद केवल राजनीतिक लाभ का एक उपकरण है।

सेक्युलरवाद का असली अर्थ है सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान। लेकिन भारत के विपक्षी दलों ने इसे केवल एक धर्म विशेष के पक्ष में उपयोग किया है। बांग्लादेश में हो रहे हिंदू समुदाय पर अत्याचार पर उनकी चुप्पी इस बात का प्रमाण है कि वे केवल मुस्लिम समुदाय के अधिकारों के प्रति जागरूक हैं। यह पक्षपात उनकी राजनीति को उजागर करता है।

आज जरूरत है कि भारत का हर नागरिक इन विपक्षी दलों से सवाल पूछे। राहुल गांधी से पूछा जाए कि उनका "भारत जोड़ो" अभियान क्या केवल चुनावी लाभ के लिए है? प्रियंका गांधी से पूछा जाए कि उनका नारीवाद क्या केवल भारत की महिलाओं तक सीमित है? वामपंथियों से पूछा जाए कि उनका मानवाधिकार आंदोलन क्या केवल उन्हीं मामलों में सक्रिय होता है, जहां उनका एजेंडा फिट बैठता है?

बांग्लादेश में हिंदू समुदाय का नरसंहार एक मानवीय संकट है, जो धर्म के आधार पर हो रहे अत्याचार की हकीकत को उजागर करता है। जब पूरा सनातन समाज और हर हिंदू संगठन इस अन्याय के खिलाफ खड़ा है, तो भारत का विपक्ष इस मुख्य मुद्दे को छोड़कर अदानी-मोदी के नाम पर प्रोपगैंडा चलाने में व्यस्त है। राहुल गांधी, जो खुद को "भारत जोड़ो" अभियान का नेता बताते हैं, इस मुद्दे पर पूरी तरह मौन हैं। क्या वह समझते हैं कि भारत जोड़ने की शुरुआत अपने पड़ोसी देशों में हो रहे अत्याचारों पर आवाज उठाने से होती है? प्रियंका गांधी, जो "लड़की हूं, लड़ सकती हूं" का नारा देती हैं, बांग्लादेश में हिंदू लड़कियों पर हो रहे अमानवीय अपराधों पर क्यों चुप हैं?

कांग्रेस और वामपंथी दलों का ध्यान मोदी सरकार पर हमला करने और अदानी के खिलाफ एजेंडा चलाने में अधिक है। यह प्रोपगैंडा उस समय और भी हास्यास्पद लगता है, जब हिंदू समुदाय पर हो रहे अत्याचार जैसे गंभीर मुद्दे पर उनकी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती। क्या अदानी का मामला बांग्लादेश के हिंदुओं के नरसंहार से अधिक महत्वपूर्ण है? या फिर यह केवल उनकी राजनीतिक स्वार्थ और हिंदू विरोधी मानसिकता को दर्शाता है?

विपक्ष का यह प्रोपगैंडा दर्शाता है कि उनकी राजनीति का उद्देश्य केवल जनता का ध्यान भटकाना है। उन्हें हिंदू समुदाय के दर्द से कोई सरोकार नहीं है। बांग्लादेश में हो रहे अत्याचार केवल धार्मिक मसला नहीं हैं, यह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों का हनन है। यह वह मुद्दा है, जिसे भारत के विपक्ष को प्रमुखता से उठाना चाहिए था। लेकिन उनका पूरा ध्यान केवल मोदी सरकार को घेरने पर है। यह न केवल उनकी प्राथमिकताओं की कमी को दिखाता है, बल्कि यह भी बताता है कि उनका तथाकथित "सेक्युलरवाद" केवल राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला मुखौटा है।

वामपंथी और कम्युनिस्ट पार्टियां, जो मानवाधिकारों और सामाजिक न्याय की बड़ी-बड़ी बातें करती हैं, बांग्लादेश के हिंदुओं के नरसंहार पर एक शब्द भी नहीं बोल रहीं। यही पार्टियां जब भारत में किसी मुस्लिम समुदाय से संबंधित मुद्दा उठता है, तो सबसे पहले खड़ी होती हैं। लेकिन बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे जघन्य अपराध पर उनकी खामोशी क्या उनके दोहरे मापदंड को नहीं दर्शाती?

यह साफ है कि भारत का विपक्ष सेक्युलरवाद के नाम पर केवल एक धर्म विशेष का तुष्टिकरण करता है। उनकी चुप्पी, खासकर जब पूरा हिंदू समाज इस मुद्दे पर एकजुट होकर सड़कों पर उतर रहा है, न केवल शर्मनाक है, बल्कि उनकी राजनीतिक विफलता को भी उजागर करती है।

यह समय है जब भारतीय नागरिक विपक्ष की इस चुप्पी और अदानी-मोदी प्रोपगैंडा को नकारें। राहुल गांधी से पूछा जाना चाहिए कि क्या वह "भारत जोड़ो" अभियान के तहत बांग्लादेश में हिंदू समाज के अधिकारों की रक्षा के लिए कुछ करेंगे। प्रियंका गांधी से पूछा जाना चाहिए कि क्या उनका "लड़ सकती हूं" का नारा सिर्फ भारत के चुनावों तक सीमित है। वामपंथियों से पूछा जाना चाहिए कि क्या उनका "मानवाधिकार आंदोलन" केवल उनके एजेंडे के अनुकूल मुद्दों तक सीमित है।
महेन्द्र सिंह भदौरिया (सामाजिक कार्यकर्ता)
प्रांत सेवा टोली सदस्य 
विश्व हिन्दू परिषद उत्तर गुजरात

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