सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

प. गेंदालाल दीक्षित जी । क्रांतिकारीयो के इस गुरु द्रोणाचार्य की कहानी सुनेंगे तो सरप्राइज हो जाएंगे । लंबी है पर पढ़ लीजिएगा ।

#smriti_lest_we_forget #स्मृति_ताकि_हम_भूले_न tributeto #unsunghero प. गेंदालाल दीक्षित जी । क्रांतिकारीयो के इस गुरु द्रोणाचार्य की कहानी सुनेंगे तो सरप्राइज हो जाएंगे । लंबी है पर पढ़ लीजिएगा ।

✍️ पं. गेंदालाल दीक्षित का जन्म 30 नवंबर 1888 को भोलानाथ दीक्षित के घर हुआ था । माता को मात्र 3 वर्ष की आयु में खो देने के बाद भी वह पढ़ने में काफी अच्छे निकले । पढ़ाई लिखाई के बाद उन्होंने औरैया के डीएवी स्कूल में शिक्षक के तौर पर नौकरी कर ली। यहां वे युवाओं को क्रांति का पाठ पढ़ाते थे ।
✍️ गेंदालाल दीक्षित, क्रांतिकारी दल शिवाजी समितिऔर मातृवेदी के संस्थापक थे, उन्होंने अलग-अलग हिस्सों में काम कर रहे क्रांतिकारियों, रास बिहारी बोस, करतार सिंह सराभा, शचीन्द्रनाथ सान्याल, जैसे क्रांतिकारियों को अपने साथ जोड़कर उत्तर भारत में क्रांति की अलख तेज करने का काम किया ।
✍️ दीक्षित जी के इस दल में 80% सदस्य चंबल के बागी थे । काकोरी ट्रेन डकैती के नायक राम प्रसाद बिस्मिल भी उनके मातृवेदी दल के सदस्य थे। इस समूह का उल्लेख बिस्मिल के लिखे विभिन्न पत्रों में मिलता है। प्रभा पत्रिका के सितंबर 1924 के संस्करण में प्रकाशित ऐसे ही एक लेख में रामप्रसाद बिस्मिल लिखते हैं कि '1917 तक, मातृवेदी 500 सशस्त्र घुड़सवारों, 2,000 पैदल सैनिकों की एक सेना तैयार हो गई थी। साथ ही उस समय इनके पास आठ लाख रुपये की संपत्ति थी।'
✍️ जालौन जिले का कोंच क्षेत्र उनका आधार था, जिसमें दीक्षित मुख्य रणनीतिकार, पंचम सिंह सारी चीजों को क्रियान्वित करते थे और लक्ष्मणानंद प्रबंधन करते थे। उन्होंने अपने ड्रेस कोड और अनुशासन को नेपोलियन बोनापार्ट के तरीकों से अनुकूलित किया था। वे अपने सदस्यों को मासिक वेतन देते थे और अच्छे कार्य के लिए उन्हें पुरस्कृत करने में विश्वास करते थे। 
✍️ मातृवेदी दल के पास सशस्त्र दल के अलावा 40 जिलों में 4,000 से अधिक मुखबिरों का एक नेटवर्क था, जिन्होंने पैम्फलेट के माध्यम से अपनी विचारधारा का प्रसार किया। ये लोग अक्सर अंग्रेजों के प्रति वफादार व्यापारियों और सामंतों को निशाना बनाते थे।
✍️ 1918 के अंत में मातृवेदी दल ने मैनपुरी में एक व्यवसायी को अपनी गतिविधियों के लिए लूटने की योजना बनाई लेकिन बोली विफल रही और समूह का विघटन हुआ। शाह आलम ने अपनी किताब में 'क्रांति के मंदिर में (1929)' और 'मैनपुरी षड्यंत्र केस फाइल (1919)' के संदर्भों का हवाले देते हुए मातृवेदी समूह के पतन की कहानी सुनाई है। उन्होंने कहा कि दिसंबर 1918 में इस दल से जुड़े एक सदस्य हिंदू सिंह ने पुरस्कार राशि के लिए अंग्रेजों को जानकारी लीक कर दी।
✍️ उसी समय भिंड के मिहोना स्थित जंगल के खड्डों के किनारे समूह के 100 सदस्य छिपे हुए थे। उनमें से कई ठीक से सो नहीं पाए थे और दो दिनों से खाना तक नहीं खाया था। इसके बाद हिंदू सिंह ने इन लोगों को खाना दिया था। जब तक सदस्यों को पता चलता कि भोजन में कुछ नशीला पदार्थ मिला है, तब तक कुछ साथी होश खो चुके थे। इसके बाद भिंड की पुलिस ने इन पर हमला बोल दिया था। हालांकि अनजाने में पकड़े गए समूह के लोगों ने 50 अंग्रेजों पर हमला कर दिया था, जिसमें दोनों तरफ से 38 लोगों की मौत हुई थी।
✍️ इसके बाद दीक्षित जी शेष बचे लोगों को पकड़ा गया और उन्हें आगरा किले में रखा गया। मामले की कार्रवाई के दौरान दीक्षित ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया और उन्होंने सरकार को कहा कि आपने तो बहुत सारे बच्चे पकड़ लिए, इन बेचारों को क्या पता ? ये सारा षड्यंत्र मेरा है । मेरा संपर्क पूरे देश और विदेश में है । इसके बाद अंग्रेजो ने काफी युवाओं को छोड़ दिया । 
✍️ मैनपुरी में हवालात में बंद होने के दौरान उनके सहयोगी देवनारायण भारतीय ने उन तक फलों की टोकरी में रिवाल्वर व लोहा काटने की आरी पहुंचा दी, जिसकी मदद से गेंदालाल सलाखें काटकर लॉकअप में बंद सरकारी गवाह रामनारायण को लेकर फरार हो गए।
✍️ पंडित जी अपने एक संबंधी के पास कोटा पहुंचे, पर वहां भी उनकी तलाश जारी थी। इसके बाद वह किसी तरह अपने घर पहुंचे, परंतु घर वालों ने साफ कह दिया कि या तो आप यहां से चले जाएं, अन्यथा हम पुलिस को बुलाते हैं। अत: उन्हें वहां से भी भागना पड़ा। अहर्निश कार्य करने व एक क्षण को भी विश्राम न करने के कारण आपको क्षय रोग हो गया था। दस कदम चलने मात्र से मूर्छित हो जाते थे।
✍️किसी तरह दिल्ली आकर पेट भरने के लिए एक प्याऊ पर पानी पिलाने की नौकरी करने लगे। सेहत बिगड़ने पर उन्हें सरकारी अस्पताल में भर्ती करा दिया गया और वहीं मातृभूमि को स्मरण करते हुए इस वीर ने 21 दिसंबर, 1920 को प्राण त्याग दिए। गेंदालाल जी जैसे महान क्रांतिकारी इस दुनिया से चले गए और किसी को पता भी नहीं चला, जबकि उनकी इच्छा थी कि मेरी मौत गोली से हो। 

संकलन : निखिलेश शांडिल्य

टिप्पणियाँ