सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

वर्गीकृत पहचान(classified identity):

वर्गीकृत पहचान(classified identity):-
   वर्गीकृत पहचान(classified identity):-
                   भारत के विचारकों में यह वृत्ति तथाकथित आजादी के पश्चात से ही घर करने लगी थी। जबकि इस वॄत्ति का चलन ही #बंगाल_नवजागरण_काल के रूप में जाना जाता है। जब वर्गीकृत पहचान को आधार बनाकर भारतीय संस्कृति व परम्परा पर कुठाराघात आरम्भ किया गया। जिन विद्वानों ने इस प्रकरण का विरोध किया, वे सदा के लिए हाशिये पर डाल दिये गए, या उन्हें आमजनमानस में विलेन के रूप में ख्यापित कर दिया गया।
इस वृत्ति को समझने के लिए एक उदाहरण देती हूँ:-
"मैं ब्राह्मण पुत्री, अपनी इसी पहचान के साथ किसी तथाकथित #दलित या शूद्र के घर जाती हूँ, व खाना खाती हूँ।"
           यहाँ मैं आमजन को संदेश देती हूँ कि, हम सब एक हैं, किसी से कोई #छुआछूत नहीं है।
परन्तु जरा ठहरें, 
                      जैसा आरम्भिक रूप से मैं बोली, वैसा मैं कुछ नहीं कर रही, बल्कि यहाँ यथार्थ में मैं यह #ख्यापित कर रही, कि "मैं जिन लोगों के घर अभी खाना खाई, वे वो लोग हैं, जो हमारी सनातन संस्कृति अर्थात #परिवार_परम्परा के अंतर्गत नहीं आते। बल्कि ये वो लोग हैं, जिन्हें #महोपनिषद का ब्रह्मवाक्य "#वसुधैव_कुटुम्बकं" भी #अछूत मानकर अपने से बहिष्कृत कर रखा है। यहाँ मैं प्रत्यक्ष रूप से उन ऋषियों से अपनी श्रेष्ठता को उच्चतर बताती हूँ, जिन्होंने सम्पूर्ण पृथ्वी के #मनु_वंशजों को एक #कुल के सदस्य के रूप में व्याख्यायित किया था, व उसी प्रकार से उनका व्यवहार था।
                        किसी दलित के यहाँ मैं खाना खाई, जिसका इतना गहरा उद्देश्य निहित हो व जिसे छिपाकर यह मात्र बताया जाय कि, 
"मैं समरसता अउ समत्व का समर्थन करने के लिए किसी दलित के यहाँ खाना खायी" भलीविधि समझा जा सकता है कि, कितना बड़ा व घातक #षड्यंत्र है।

इसी प्रकार से,
                   बंगाल नवजागरण के तथाकथित समाज सुधारक जो पहले ही हिन्दू संस्कृति को #समाज जैसे #गिरोहवादी या #कबिलावादी शब्द में संकुचित करते हुए, मूल पहचान पर आघात कर चुके थे, वे पुनः इस प्रकार की "क्लासिफाइड आइडेंटिटी" का आलम्बन लिए, ताकि न केवल म्लेच्छों(ईसा/मूसा) की थ्योरी को स्थापित किया जा सके, बल्कि भविष्य के लिए एक ऐसी #विषाक्त स्थिति का सृजन किया जा सके, जिसके प्रभाव में नित्य प्रति #स्वार्थ की रोटियाँ सेंकी जाती रहें।
                    शङ्कर पीठाधीश्वर इस प्रकार के व्यवहार को आरम्भ से नकारते आये हैं व वर्त्तमान में भी इस प्रकार का कोई विशिष्ट पहचान मुलक कार्य करने से सदैव बचते देखे जाते हैं। इसलिए 
न केवल संघ बल्कि बंगाल नवजागरण के महामानवों(दानवों) के अघोषित पुत्रों द्वारा नित्यप्रति उनकी निंदा और गाली से स्वागत किया जाता देखा जा सकता है।

अभी हाल की घटनाओं की बात करें तो,
महाकुम्भ में #दलितों को महामंडलेश्वर व मठाधीश बनाया जाएगा।
तुलसी पीठाधीश्वर(अंधक बाबा) द्वारा दलितों का सम्मान
बागेश्वर धाम(चमत्कारी बाबा) द्वारा सफाईकर्मी(दलितों) का सम्मान
प्रमुख रूप से देखा जा सकता है।

क्या कहेंगे आपसब?                भारत के विचारकों में यह वृत्ति तथाकथित आजादी के पश्चात से ही घर करने लगी थी। जबकि इस वॄत्ति का चलन ही #बंगाल_नवजागरण_काल के रूप में जाना जाता है। जब वर्गीकृत पहचान को आधार बनाकर भारतीय संस्कृति व परम्परा पर कुठाराघात आरम्भ किया गया। जिन विद्वानों ने इस प्रकरण का विरोध किया, वे सदा के लिए हाशिये पर डाल दिये गए, या उन्हें आमजनमानस में विलेन के रूप में ख्यापित कर दिया गया।
इस वृत्ति को समझने के लिए एक उदाहरण देती हूँ:-
"मैं ब्राह्मण पुत्री, अपनी इसी पहचान के साथ किसी तथाकथित #दलित या शूद्र के घर जाती हूँ, व खाना खाती हूँ।"
           यहाँ मैं आमजन को संदेश देती हूँ कि, हम सब एक हैं, किसी से कोई #छुआछूत नहीं है।
परन्तु जरा ठहरें, 
                      जैसा आरम्भिक रूप से मैं बोली, वैसा मैं कुछ नहीं कर रही, बल्कि यहाँ यथार्थ में मैं यह #ख्यापित कर रही, कि "मैं जिन लोगों के घर अभी खाना खाई, वे वो लोग हैं, जो हमारी सनातन संस्कृति अर्थात #परिवार_परम्परा के अंतर्गत नहीं आते। बल्कि ये वो लोग हैं, जिन्हें #महोपनिषद का ब्रह्मवाक्य "#वसुधैव_कुटुम्बकं" भी #अछूत मानकर अपने से बहिष्कृत कर रखा है। यहाँ मैं प्रत्यक्ष रूप से उन ऋषियों से अपनी श्रेष्ठता को उच्चतर बताती हूँ, जिन्होंने सम्पूर्ण पृथ्वी के #मनु_वंशजों को एक #कुल के सदस्य के रूप में व्याख्यायित किया था, व उसी प्रकार से उनका व्यवहार था।
                        किसी दलित के यहाँ मैं खाना खाई, जिसका इतना गहरा उद्देश्य निहित हो व जिसे छिपाकर यह मात्र बताया जाय कि, 
"मैं समरसता अउ समत्व का समर्थन करने के लिए किसी दलित के यहाँ खाना खायी" भलीविधि समझा जा सकता है कि, कितना बड़ा व घातक #षड्यंत्र है।

इसी प्रकार से,
                   बंगाल नवजागरण के तथाकथित समाज सुधारक जो पहले ही हिन्दू संस्कृति को #समाज जैसे #गिरोहवादी या #कबिलावादी शब्द में संकुचित करते हुए, मूल पहचान पर आघात कर चुके थे, वे पुनः इस प्रकार की "क्लासिफाइड आइडेंटिटी" का आलम्बन लिए, ताकि न केवल म्लेच्छों(ईसा/मूसा) की थ्योरी को स्थापित किया जा सके, बल्कि भविष्य के लिए एक ऐसी #विषाक्त स्थिति का सृजन किया जा सके, जिसके प्रभाव में नित्य प्रति #स्वार्थ की रोटियाँ सेंकी जाती रहें।
                    शङ्कर पीठाधीश्वर इस प्रकार के व्यवहार को आरम्भ से नकारते आये हैं व वर्त्तमान में भी इस प्रकार का कोई विशिष्ट पहचान मुलक कार्य करने से सदैव बचते देखे जाते हैं। इसलिए 
न केवल संघ बल्कि बंगाल नवजागरण के महामानवों(दानवों) के अघोषित पुत्रों द्वारा नित्यप्रति उनकी निंदा और गाली से स्वागत किया जाता देखा जा सकता है।

अभी हाल की घटनाओं की बात करें तो,
महाकुम्भ में #दलितों को महामंडलेश्वर व मठाधीश बनाया जाएगा।
तुलसी पीठाधीश्वर(अंधक बाबा) द्वारा दलितों का सम्मान
बागेश्वर धाम(चमत्कारी बाबा) द्वारा सफाईकर्मी(दलितों) का सम्मान
प्रमुख रूप से देखा जा सकता है।

क्या कहेंगे आपसब?

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