सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

छठ पर्व अथवा करवा चौथ में एक समाज द्वारा बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर जी का तस्वीर लगाकर पर्व मनाने से न तो दुखी होने की आवश्यकता क्यों नहीं है?

छठ पर्व अथवा करवा चौथ में एक समाज द्वारा बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर जी का तस्वीर लगाकर पर्व मनाने से न तो दुखी होने की आवश्यकता है और न ही उसका मज़ाक़ बनाने की आवश्यकता है। 
उससे केवल दो बातें समझनी हैं, पहला यह कि तमाम समस्याओं, दुष्प्रचारों और अविश्वास पैदा करने के प्रयासों के बावजूद भी वह समाज उन पर्वों के साथ जुड़ा हुआ है और दूसरी बात यह कि आप भले बाबा साहेब का मज़ाक़ बनाये अथवा उनको कमतर साबित करें लेकिन एक बड़े समाज के वह भगवान से कम नहीं हैं। 
इस संबंध में मेरे अनुज विट्ठल गोस्वामी जी ने मुझे एक महत्वपूर्ण क़िस्सा सुनाया था। एक ब्राह्मण परिवार और खटिक परिवार में लंबे समय से मुक़दमा और विवाद चल रहा था। एक बार ऐसे ही ब्राह्मण परिवार के व्यक्ति ने खटिक समाज की देखादेखी बाबा साहेब के जयंती पर अपने घर में भी झालर और लाइट लगवा दी और डीजे बजवा दिया। जिस खटिक परिवार के व्यक्ति से इनका झगड़ा चल रहा था, वह घर आ गया और कहने लगा कि ये तो हमारे भगवान हैं, आप क्यों इतना तामझाम किए हैं? ब्राह्मण व्यक्ति ने उत्तर दिया कि क्या हम आप बटें हैं? जो आपके भगवान वह हमारे भगवान और जो हमारे भगवान वो आपके भगवान। लंबे समय से चली आ रही मुक़दमेबाज़ी और अमुक परिवार द्वारा विरोध समाप्त हो गया और समझौता हो गया। 
कुछ चीजों को गहराई से समझने की ज़रूरत है। चीजों को देखने का हर समाज का अपना अपना नज़रिया है। लेकिन समान मानव मूल्य मानने वाले समूहों को एक दूसरे के साथ समन्वय और आदर का भाव स्थापित करना चाहिए और अनावश्यक विवाद खड़ा करने और सामने वाले को नीचा दिखाने के बजाय उसे अपनाने पर विचार करना चाहिए।

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