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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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अरबों वर्ष पुरानी इस धरती पर मानव भी करोड़ों वर्षों से रहता आ रहा है । हालाँकि मैं चचा डार्विन की तरह ये तो कहूँगा नहीं कि बंदर किसी तरह उछल-कूद करते हुए एक दिन मज़े-मज़े में आदमी बन गया । सच तो यही है कि परम पिता परमेश्वर ने यह सृष्टि रची और तभी सारे प्राणियों की रचना एक साथ ही की । मनुष्य नामक यह प्राणी भी तभी धरती पर उतारा गया । मनुष्यों की यह प्रथम पीढ़ी दैवीय गुणों से सम्पन्न थी और प्रकृति के कण-कण में व्याप्त ईश्वरीय आभा के दर्शन करने में पूर्णतः सक्षम थी । और यह बात मैं मूलतः और विस्तृत रूप से हिंदुस्थानियों के विषय में कह रहा हूँ ।
यह भी एक अजीब ही संयोग है कि हिंदुस्थान के इतिहास में आप जितना पीछे जाते हैं, उतनी ही अधिक 'तेजस्वी दिव्यता' पाते हैं । संसार के जितने भी ज्ञात-अज्ञात विज्ञान या शास्त्र आदि हैं, उन सबका श्रेष्ठतम रूप हमें हिंदुस्थान के प्राचीनतम काल में दिखता है ।
योग, आयुर्वेद, संगीत, अणुविज्ञान, शल्य-चिकित्सा, युद्ध-कला, समुद्र-विज्ञान, शरीर रचना-विज्ञान, भूगोल, खगोल, अंतरिक्ष-विज्ञान, राजनीति, धातुकर्म, वनस्पति विज्ञान, चित्रकला, साहित्य, भाषा-विज्ञान, कृषि-विज्ञान . . . . . . आदि आदि आदि !
यह सूची अनंत है, जैसे ये सृष्टि अनंत है ।
इन या इनके अतिरिक्त सभी तरह के ज्ञान-विज्ञान में भारत अर्थात् हिंदुस्थान अर्थात् हिंदू समाज सदा से नंबर वन पर रहा है । इस विशेषता और योग्यता के साथ-साथ हिंदू-समाज की एक बहुत बड़ी उपलब्धि और विशेषता रही है ---
उत्सवधर्मिता !
सभ्यता के आदिकाल से लेकर आज तक हिंदू इस प्रकृति के पूजक और रक्षक रहे हैं । हालाँकि यह भी एक बात है कि हिंदुओं की इस प्रकृति-रक्षा की भोली-भाली नीति को अन्य हिंदू-द्वेषी लोगों ने अंधविश्वास कहकर ख़ुद को व्यर्थ ही आधुनिक घोषित कर लिया है ।
प्रकृति से सच्चा प्रेम और विज्ञान के निरंतर शोध का ही परिणाम यह रहा है कि हमारे सभी त्योहार किसी न किसी ऋतु या मौसम या प्राकृतिक घटनाक्रम से संबंधित हैं ।
वैसे तो हमारे यहाँ हर दिन एक त्योहार है लेकिन यदि मैं एक सामान्य-सी लिस्ट बनाकर कुछ प्रमुख त्योहारों के नाम लूँ तो होली, दीपावली, और हरतालिका तीज (हरियाली तीज) इनमें प्रमुख रहेंगे । ये ऐसे पर्व हैं जो सारे हिंदुस्थान में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाते हैं । बाक़ी ऐसे हैं जिन्हें हम एक तरह से क्षेत्रीय उत्सव कह सकते हैं । जैसे बैसाखी, हरेथ, दुर्गा-पूजा, बिहू, ओणम, गणेशोत्सव, डांडिया-रास, छठ पूजा, हरेली आदि ।
मैं प्रमुख रूप से होली, दीपावली और तीज की चर्चा करूँगा ।
ये तीनों ही पर्व खेती और ऋतु-परिवर्तन से सीधे संबंधित हैं ।
होली ऐसे समय आती है जब गेहूँ की फ़सल पककर तैयार हो रही होती है इसलिए हम इस ख़ुशी में रंगीला उत्सव मनाते हैं ।
फिर चौमासे यानी बरसात के चार महीनों में खेती के काम कुछ मंद पड़ जाते हैं और हमारे पास ख़ूब समय होता है । इसलिए हम चारों ओर फैली गहरी हरियाली देखकर प्रसन्न होते हैं और झूले में बैठकर झूलते हैं ।
फिर जब बरसात बीत जाती है और धरती अपनी सोंधी सुगंध के साथ खिल जाती है तो उसे जोतकर उसमें गेहूँ के नए बीज बोए जाते हैं । नयी फ़सल की तैयारी की ख़ुशी में हम फिर उत्सव मनाते हैं और ख़ूब दिए जलाते हैं ।
हालाँकि हमारे बड़े देश में ये फ़सल-चक्र अलग-अलग भी हो सकता है लेकिन ये सब मैंने एक औसत के तौर पर लिया है ।
मज़े की बात यह है कि हमारे सभी उत्सवों के मूल में कोई न कोई पौराणिक-ऐतिहासिक कथा अवश्य ही मिल जाती है लेकिन वस्तुतः उन सबके पीछे विज्ञान तथा हमारा प्रकृति-प्रेम है । इसीलिए मैं कहता हूँ कि इस धरती पर पाए जाने वाले सभी मानव-समूहों में एकमात्र हिंदू ही ऐसा समाज है जो प्रकृति के कण-कण में ईश्वर के दर्शन करता है और प्रत्येक दिन उत्सव मनाता है ।
यदि ऐसा नहीं होता तो फिर आप ख़ुद सोचें कि ये प्रथमा, द्वितीया से लेकर पूर्णिमा/अमावस्या तक की तिथियाँ क्या सिर्फ़ कैलेण्डर के पन्ने बदलने के लिए ही बना रखी हैं ?
कृण्वंतो विश्वमार्यम् ॐ 🇮🇳 卐
✍ सागर तोमर
मेरठ, उत्तर प्रदेश
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