सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

पौराणिक कथाओं के कपोल कल्पना कहना कहां तक उचित है?

जब मैंने कक्षा 11वीं में पहली बार सत्यार्थ प्रकाश पढ़ा, तो मेरे विचार भगवान श्री कृष्ण और पुराणों के विषय में आर्य समाजियों जैसे ही थे। फिर धीरे-धीरे मैंने पुराणों की कथाओं का महात्म्य समझने का प्रयास किया और सनातन धर्म के जानकार मित्रों से मार्गदर्शन मिला। इससे मुझे स्पष्ट हुआ कि जो हम लोग सोचते हैं, उसका संदर्भ हम अक्सर नहीं समझ पाते हैं।

इसी कारण से, हम पुराणों की कथाओं को समझे बिना उनमें मिलावट और भगवान की लीलाओं के उद्देश्य को समझे बिना मानसिक सृष्टि और मैथुनिक सृष्टि के बीच के अंतर को समझे बिना उन्हें कपोल कल्पित कहने लगते हैं और अपनी महान सनातन हिन्दू परंपरा के ग्रंथों पर प्रश्न चिन्ह खड़े कर देते हैं।

राधा कृष्ण की लीलाओं का संदर्भ मानव सभ्यता को प्रेम के अनूठे महत्व और आनंद को लोक परंपरा के रूप में स्थापित करना है। भगवान कृष्ण ने बाल लीलाएं मानव सभ्यता को प्रेममय बनाने के लिए कीं। जिससे साधारण मनुष्य सुखपूर्वक जीवन यापन कर सकते हैं।

11 वर्ष के बाद भगवान ने यह सिद्ध किया कि वे एक आदर्श पुरुष, आदर्श गृहस्थ, आदर्श योद्धा, और आदर्श राजनीतिज्ञ हैं। उन्होंने बताया कि प्रेम से कर्मयोग तक व्यक्ति को वह करना चाहिए जो धर्म की स्थापना के लिए जरूरी है।

हम आब्रह्मिक मतों की तरह नहीं हो सकते हैं जो एक किताब लिख दिया गया वहीं अंतिम सत्य है। इसलिए भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं का महत्व समाज के अलग-अलग वर्गों के लिए है। भक्ति मार्ग पर चलने वाला उन्हें अपना भाई, सखा, पति, पिता, भगवान, सब कुछ मानता है। ज्ञान मार्गी उनमें योगेश्वर कृष्ण रूप में परब्रह्म को देखता है। एक कर्म मार्गी उन्हें कर्मयोगी की भांति एक योद्धा के रूप में देखता है, एक आदर्श राजनीतिज्ञ के रूप में देखता है। एक गृहस्थ उन्हें आदर्श गृहस्थ के रूप में देखता है।

इसलिए भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं और पुराणों की कथाओं के अंदर दुर्लभ रहस्यों को समझने के लिए त्रिगुणात्मक सृष्टि और आधिदैविक, अधिभौतिक, आध्यात्मिक सृष्टि को समझना आवश्यक है। पुराणों की कथाओं को समझे बिना यह कहना कि पुराणों में मिलावट है या कथाएं काल्पनिक है, पूरी तरह अनुचित है।

रूक्मणी के प्रेम को समाज ने तिरस्कृत नहीं किया है, उसका संदर्भ अलग था। भगवान श्री कृष्ण ने बाल्यकाल में जो कुछ लीलाएं की थीं, वह निश्च्छल प्रेम का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण था, जिसमें काम की भावना नहीं थी। इसलिए 11 वर्ष तक आयु के कृष्ण की लीलाओं को एक भक्त के रूप में स्वीकार कर सकते हैं। कोई भक्त उसमें राधारानी में माता लक्ष्मी देखता है, वह उस भक्त की दृष्टि है।

हिंदू धर्म आब्रह्मिक मतों से पूरी तरह से भिन्न है। हिंदू धर्म में ब्रह्म को प्राप्त करने के लिए तीन मार्ग हैं: ज्ञान मार्ग, भक्ति मार्ग और कर्म मार्ग। अन्य मतों में ईश्वर सातवें आसमान पर बैठता है, जजमेंट डे या कयामत के दिन स्वर्ग और नर्क का निर्णय करता है। हमारे यहां व्यवस्था नहीं है, हमारे यहां तो सशरीर ब्रह्म को प्राप्त कर सकते हैं। हमारे धर्म नौ दर्शन हैं - छः वैदिक दर्शन और तीन अवैदिक दर्शन, जैसे कि जैन, बौद्ध और चार्वाक जैसा नास्तिक दर्शन।

इसलिए हमें यह समझना चाहिए कि भगवान श्री कृष्ण के भक्त जिस रूप में देखते हैं, उसका सम्मान करना चाहिए। इसमें हमें तर्क नहीं करना चाहिए। हमें भगवान श्री कृष्ण के जीवन मूल्यों को सीखकर उनका अनुसरण करना चाहिए। हर व्यक्ति का स्वभाव, गुण और विचार अलग होता है, इसलिए हर व्यक्ति के ऊपर अपने विचार को नहीं थोपना चाहिए।

हिंदू समाज दुनिया की सबसे वीर जाति रही है। कुछ ऐसे कारण होते हैं जो समय, काल और परिस्थिति के कारण हमारे नियंत्रण में नहीं होते हैं। इसलिए उन चीजों का समाधान ढूंढने के प्रयास करना चाहिए। आज हमें सम्राट विक्रमादित्य जैसी लीडरशिप मिल जाए, तो हम दुनिया से म्लेच्छों को खत्म कर देंगे। हमारे में वह क्षमता है। हजार वर्षों की गुलामी के बाद 10 से 15% आबादी कन्वर्ट हुई है, यह हमारी वीरता का प्रमाण है।

इस्लाम, ईसाईयत और वामपंथ जब अपने चरम पर थे, तब उन्हें भारत में पराजय झेलनी पड़ी है। इसलिए यह नहीं कह सकते कि हिंदू समाज भगवान श्री कृष्ण के आदर्शों पर नहीं चलता है। लेकिन हिंदू समाज का बड़ा वर्ग भक्ति मार्गी है, जो अपने अराध्य को सर्वस्व अर्पित कर देता है। उस वर्ग की आस्था हम लोगों से ज्यादा स्थिर है। धर्म और अपने अराध्य के लिए वह वर्ग कुछ कर सकता है, जैसा कि बाबरी विध्वंस का उदाहरण है।

इसलिए भक्त भगवान को जिस रूप में देखना चाहता है, उसे उस पर छोड़ देना है। भगवान को हम जिस रूप में देखना चाहते हैं, उस रूप में भगवान मिल जाएंगे। लेकिन हम आदर्शवाद की अपेक्षा नहीं कर सकते हैं, क्योंकि हर व्यक्ति आदर्शवादी नहीं हो सकता है। यदि ऐसा होता, तो पूरी सृष्टि व्यवस्था चरमराने लगेगी।

सृष्टि की व्यवस्था को चलाने के लिए त्रिगुणात्मक सृष्टि महत्वपूर्ण है, जिसमें सत्व, रजस और तमस के तीन गुण हैं। इन तीनों गुणों के कारण सृष्टि व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रहती है और जीवन में रस बना रहता है।

धर्म और अधर्म के बीच युद्ध रुक जाएगा और इस जगत में सबकुछ स्थिर हो जाएगा, लेकिन ऐसा होना संभव नहीं है। इसलिए सृष्टि में सबकुछ ज़रूरी है। इस जगत में जो कुछ हो रहा है, उसका कोई न कोई कारण है। बिना कारण के कुछ नहीं होता है।

आर्य समाज, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अन्य संगठनों की महात्म्य धार्मिक पक्ष के लिए है, लेकिन विधर्मियों के संगठन का भी महत्व है। युद्ध दोनों पक्षों में अनवरत चलता रहेगा, चाहे वह इस्लाम, ईसाईयत और वामपंथ के रूप में हो या किसी और रूप में।

कुछ वर्षों में इस्लाम, ईसाईयत और वामपंथ के बीच अंतिम युद्ध होगा और यह सबकुछ समाप्त हो जाएगा। लेकिन धर्म की मूल भावना शाश्वत रहेगी। कुछ हजार वर्ष में असुर किसी अन्य रूप में आ जाएंगे और फिर युद्ध होगा। फिर नई नई घटनाएं घटेगी, सृष्टि व्यवस्था में नव सृजन होगा और पुरानी व्यवस्था खत्म हो जाएगी। शाश्वत सिर्फ धर्म है।

दीपक कुमार द्विवेदी 

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