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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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इस नाम का इतना माहात्म्य है कि स्वयं श्रीनारायण, श्रीकृष्ण, बाबा भैरवनाथ आदि ने दुर्गा कवच की रचना की है।
द, र्, उ, ग, आ ये पाँचों वर्ण अग्नि तत्त्व के हैं। सभी वर्णों की भिन्न भिन्न व्याख्या है। दुर्गा नाम की सबसे सरल व्याख्या यही है कि दुर्+गा यानि दुर् से दुःख, दुर्गति, दुरति, दोष, दुराचार, दुराशा आदि से गा यानि गमन कराती हैं, पार करा देती हैं।
दुर्गा ब्रह्म विद्या हैं। गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि अर्जुन मेरी महामाया मुझे आच्छादित करके रखती है जिससे भक्त मेरा मूल स्वरूप नहीं देख पाते। जो ब्रह्म को भी आच्छादित कर ले वो महामाया दुर्गा हैं। किसी वस्तु को आच्छादित करने के लिये दूसरी वस्तु को उससे बड़ा होना चाहिए। कुरुक्षेत्र में युद्ध आरम्भ होने से पहले ही भगवान कृष्ण अर्जुन से दुर्गा की स्तुति करवाते हैं और बलि प्रदान करवाते हैं।
दुर्गा महात्म्य में जितना भी लिखा जाय अल्प ही होगा। दुर्गा नाम ही अपने में द्वाक्षरीय मंत्र है जिसे जपने से सारे कष्ट दूर होते हैं। निर्गुण स्वरूप के लिये जो महत्त्व गायत्री मंत्र का है वही महत्त्व सगुण स्वरूप के लिये नवार्ण मंत्र का है ऐसा कथन चण्डी धाम के परम साधक प्रातः स्मरणीय देवीदत्त शुक्ल महाराज जी का था।
जपेत् दुर्गा, स्मरेत् दुर्गा, यजेत् दुर्गा भवनाशिनी।
🏵️ जय मां दुर्गा 🏵️
जय महादेव
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