सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

RSS विचारकों द्वारा सावरकर आइडियोलॉजी अर्थात हिन्दू नामधारी म्लेच्छ बनाने की प्रक्रिया में यहबात प्रमुख स्तर पर देखने को मिलती है

आरएसएस विचारकों द्वारा सावरकर आइडियोलॉजी अर्थात #हिन्दू_नामधारी_म्लेच्छ बनाने की प्रक्रिया में यह बात प्रमुख स्तर पर देखने को मिलती है कि,
"गाँधी हिन्दुओं को प्रकृतिय रूप से कायर और मुस्लिमों को एक गुंडा के रूप में देखता था" वही इसी प्रकार की भावना में सावरकर का विचार भी देखा जाता है।
जिसके कारण, 
भारत में गांधी और सावरकर दोनों अंग्रेजों की गुलाम परस्ती इसलिए स्वीकार कर लेते हैं, ताकि हिन्दुओं की रक्षा मुस्लिमों से की जा सके। जहाँ अंग्रेज एक मजबूत दीवार की तरह थे इन हिन्दुओं और मुस्लिमों के मध्य।
                      ऐसी कल्पित आइडियोलॉजी समझ ही नहीं आता कि ये आरएसएस वाले या तथाकथित सावरकर वाले क्या समझकर प्रसारित करते हैं? जिन्हें न भारत की वर्त्तमान जनसांख्यिकी आंकड़ों का ज्ञान रहता है, और न ही भारतीय राजतन्त्र का ही सटीक ज्ञान रहता है।
इसी कल्पित आइडियोलॉजी के तहत, 1903 के पश्चात भारत में अंग्रेजों के बने रहने को और कांग्रेसी म्लेच्छों सहित तथाकथित संघ के राष्ट्र पर उपकारों का गुणगान किया जाना देखा जाता है। जो भारत में स्वार्थ और सत्तालोलुपता के गंदे खेल के रूप में लगभग 45 वर्ष तक चला। और उसे आज हमारी पीढ़ी को गर्व से #भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के रूप में पढ़ाया जाता है।
                      जब भारत आजाद हुआ उस समय भारत की संयुक्त आबादी 34 करोड़ थी।
जहां 565 रियासते थी। जिनकी कुल संयुक्त सेना की बात की जाए तो वह सेना लगभग 3 लाख से अधिक थी।
इन कुल रियासतों में 400 से अधिक रियासतें हिन्दू शासकों की जानी जाती हैं।
सैनिकों के आँकड़े विश्वस्त नहीं, क्योंकि, जिस देश में आजादी के समय अंग्रेजी सेना लगभग 7 लाख हो, वहाँ देशी रियासतों की सेना जो अब तक अंग्रेजों से भारतीय जनमानस की सुरक्षा करती आई थी, वह उनके आधी के बराबर भी न होगी? यह असत्यता को ख्यापित करती है।
फिर भी।

जिस देश में 400 से अधिक रियासतें हिन्दू राजाओं और हिन्दू मनसबदार से पटी पड़ी पृरी भारत भूमि हो, वहाँ मुस्लिमों से खतरा किसी गृहयुद्ध के रूप में भला किस प्रकार देखा गया?
जबकि 1857 की क्रान्ति में भी ऐसी किसी प्रवृत्ति का ज्ञान नहीं मिलता।
1903 के पश्चात, भारतीय संघ को तहस नहस करने के लिए a o ह्यूम की बनाई गई कांग्रेस जिसकी नींव 1885 में रखी गयी थी, उसके नीतियों के द्वारा भारतीय रियासतों को अलग-थलग करने और उनके नेतृत्व को नष्ट करके काल्पनिक #योद्धाओं और नेताओं के नेतृत्व में भारतीय संस्कृति को सौंपने के लिए जो खेल खेला गया, उसी के मोहरे आज भी भारतीय संस्कृति को #दीमक की तरह बर्बाद कर रहे।
20 वीं सदी का आरम्भ और इटली जर्मनी सहित रशिया और जापान का #साम्राज्यवाद में प्रवेश फ्रांस और यूरोपीय देशों की साम्राज्यवादी नीतियों और अपने साम्राज्य की रक्षा के लिए एक विकट संकट खड़ा कर चुका था। ऐसे में सुदूर में बसा भारत तत्कालीन ब्रिटेन के लिए एक टेढ़ी खीर सिद्ध होने लगा। जिसका मूलभूत कारण भारत से कम्पनी का शासन खत्म करके सीधे ब्रिटिश अंपायर का उपनिवेश घोषित कर देने से देखा जाता है।
                   भारतीय साम्राज्य की इकाई शक्तियों के प्रभाव को शून्य करना और शक्तियों का पुनः नवीन हाथों में सौंपना जो अंग्रेजों की कठपुतली हों, इसी उद्देश्य से जहाँ कांग्रेस की नींव रखी गयी, उसी नींव का किला बनकर आगे 1903 के बाद का कालक्रम जाना जाता है। 
                      और यही वह मुख्य कारण भी है जो, भारतीय साम्राज्य की इकाई शक्तियों को हटाकर कांग्रेसी कुक्कुर जमात को प्रमुखता प्रदान की गयी और उसी श्रेणी में एक गांधी नामक एजेंट भारत में #लॉन्च किया गया।
जिसके बाद के सिपहसालार के रूप में संघ और सावरकर आदि को जाना जाता है।
                     एक ऐसी घटिया किस्म की राजनीति और उस राजनीति को जस्टिफाई करने के लिए नई नई गढ़ी हुई मनोकल्पित कहानियों का यह तिलिस्म है कि आज गूगल पर भी 565 रियासतों के नाम और उनके राजाओं की सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं होती।
सिवाय उन तेरह रियासतों के जिन्हें अलग करके #पाकिस्तान बनाया गया।
                  अगर पब्लिक डोमेन में भारतीय रियासतों और उनकी सैन्य सहित क्षेत्रीय प्राधिकरण की जानकारियाँ उपलब्ध हो जायें, तब न संघ की आइडियोलॉजी का अस्तित्व सुरक्षित रह पाएगा और न ही सावरकर साहित्य सहित कांग्रेसी विचारधारा का।
इसलिए यह अत्यावश्यक है कि, भारत के आम जन को ऐसी ही मनोहर कहानियों से लबरेज रखा जाए, और यूँ ही राजनीतिक रोटियाँ सेंकी जाती रहे।
           नई नई उपमाओं और नई नई थ्योरी के माध्यम से भारतीय संस्कृति को सम्पूर्ण रूप से #म्लेच्छ बनाने तक।

जय श्री कृष्ण

टिप्पणियाँ