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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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आम हिंदू की सोच आज इस तरह हो चुकी है कि सब कुछ मोदी, शाह, संघ, योगी करें, बिना कुछ किए ही सब कुछ मिल जाए। आज मेरी प्रबुद्ध वर्ग के एक सज्जन से बात हो रही थी, वैचारिक विषयों पर चर्चा हो रही थी। इस चर्चा में कुछ विषय आए, जिसमें प्रमुख था कि हिंदू समाज को संगठित कैसे किया जाए, भविष्य में हिंदुओं की स्थिति क्या हो सकती है, वैश्विक शक्तियों का भारत की राजनीति में क्या प्रभाव चल रहा है, और लोकतांत्रिक व्यवस्था धर्म-संस्कृति के हित में है कि नहीं है। इन विषयों पर चर्चा कर रहे थे। मैंने एक विषय उठाया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था भारतवर्ष के हित में नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था रहेगी तो धर्म-संस्कृति नहीं बच पाएगी क्योंकि जब लोकतांत्रिक व्यवस्था ने क्रिश्चियन देशों की बैंड बजा दी है तो भारत में तो हिंदू समाज असंगठित भी है। इसलिए भारत की स्थिति यह हो सकती है कि कुछ वर्षों में अल्पसंख्यक आबादी बहुसंख्यक आबादी को रिप्लेस करके सत्ता में काबिज हो जाएगी और बहुसंख्यक आबादी सत्ता से बाहर हो जाएगी। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यही होता है कि धीरे-धीरे बहुसंख्यक आबादी अल्पसंख्यक हो जाती है। ज्यादातर लोकतांत्रिक देशों में बहुसंख्यक आबादी नास्तिक हो जाती है और यह बहुसंख्यक आबादी लगातार घटने लगती है, जबकि जिन अल्पसंख्यकों की पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था मजबूत होती है, वे बहुत तेजी से बहुसंख्यक आबादी को रिप्लेस कर देते हैं।
तो मैंने कहा कि अगर भारत में लंबे समय तक लोकतंत्र रहा तो भारत से धर्म-संस्कृति बहुत जल्द खत्म हो जाएगी। इसलिए भारत को बचाने और महान सनातन धर्म की रक्षा के लिए हमें लोकतांत्रिक व्यवस्था का विकल्प समाज के रूप में देना होगा, जिसे समाज का बड़ा वर्ग स्वीकार कर सके। नई व्यवस्था दिए बिना दूसरी व्यवस्था को रिप्लेस नहीं कर सकते। अगर हम लोकतांत्रिक व्यवस्था का विकल्प समाज के रूप में प्रस्तुत कर पाए और सनातन धर्म के अनुरूप राज्य व्यवस्था स्थापित कर पाए, तो सनातन धर्म का उत्थान शुरू हो जाएगा।
उन्होंने कहा कि समाज कुछ नहीं करता, लीडरशिप ही कुछ कर सकती है। मैंने प्राचीन व्यवस्था का उदाहरण दिया कि पहले प्रत्येक परिवार में एक मुखिया होता था, जो परिवार से जुड़े सभी निर्णय करता था। मुखिया द्वारा किए गए निर्णय को परिवार का कोई सदस्य टाल नहीं सकता था। उसी तरह प्रत्येक गांव में एक मुखिया होता था, जो गांव से जुड़े विषयों पर हर निर्णय लेता था। गांव के सभी निवासियों को गांव के मुखिया द्वारा किए गए निर्णय मान्य होते थे। प्रत्येक परिवार, प्रत्येक गांव की एक आर्थिक, सामाजिक, और राजनीतिक संरचना होती थी, जो पूरी तरह स्वायत्त होती थी, जिसमें राजसत्ता का कोई हस्तक्षेप नहीं होता था। इस कारण दिल्ली की गद्दी पर कोई भी बैठा हो, समाज पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। इसी व्यवस्था के कारण हजारों वर्षों के बावजूद यह देश हिंदू बहुसंख्यक रहा। इतने हमले हुए, फिर भी बहुसंख्यक आबादी का केवल 12% ही मतांतरित हुआ। इससे स्पष्ट होता है कि हिंदू किस तरह विधर्मियों का प्रतिकार करते रहे। इतने आक्रमणों के बावजूद आज हिंदू भारत में बहुसंख्यक हैं।
पिछले 200 वर्षों में बड़े सुनियोजित तरीके से हिंदू समाज की सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक, और शैक्षिक व्यवस्था को ध्वस्त करने का प्रयास हुआ, जिसके परिणामस्वरूप हिंदू समाज के अंदर इतनी हीनताबोध भर दी गई कि वह सही-गलत का अंतर नहीं कर पा रहा है। तथाकथित स्वतंत्रता और संविधान लागू होने के बाद स्थितियाँ और भी ज्यादा गंभीर होती जा रही हैं। अगर यह चलता रहा तो कुछ वर्षों में हिंदू समाज इस देश में अल्पसंख्यक हो जाएगा और कुछ वर्षों में हिंदू धर्म का लोप हो जाएगा। इसलिए, यदि हिंदू धर्म की रक्षा करनी है तो हमें लोकतांत्रिक व्यवस्था का विकल्प खोजना होगा और नई व्यवस्था खड़ी करनी होगी।
उन्होंने कहा, "यह सब कैसे होगा?" मैंने कहा कि प्राचीनकाल की सामाजिक व्यवस्था को एक अपडेटेड वर्जन के साथ विकसित किया जाए। इसके लिए नए स्तर पर प्रयास करने होंगे और समाज के स्तर पर काम करना होगा। उन्होंने कहा, "समाज कुछ नहीं कर सकता, संगठन या सरकार की आवश्यकता है। समाज तो भीड़ के पीछे चलता है, उसके पास एक लीडर चाहिए, तभी समाज कुछ कर सकता है। बिना नेतृत्व के समाज कुछ नहीं कर सकता है।"
मैंने एक उदाहरण दिया कि कोई व्यक्ति अकेले कार्य करेगा तो वह अकेले नहीं कर पाएगा, लेकिन यदि वही कार्य वह 10 लोगों के साथ मिलकर करेगा तो वह कार्य आसानी से और समय से पहले पूरा हो जाएगा। उसी तरह सामाजिक स्तर पर छोटे-छोटे समूह जैसे मोहल्ले, गांव, कस्बे में साप्ताहिक हनुमान चालीसा टोली का निर्माण किया जा सकता है। जैसे 10 लोगों की टोली बनती है, तो उस टोली में 10 लोग मिलकर एक अध्यक्ष चुन लेंगे। अध्यक्ष 10 लोगों की टोली का नेतृत्व करेगा और कार्यों का विभाजन करेगा। सभी 10 लोग साप्ताहिक मिलन की तैयारियों में लगेंगे, तो साप्ताहिक मिलन का कार्य शुरू हो जाएगा। वही 10 लोगों का समूह का मुखिया छोटे समूह का नेतृत्व करेगा और समूह के कार्यकर्ताओं को कार्य योजना के संबंध में दिशा व निर्देश जारी करेगा।
छोटे-छोटे समूह स्थानीय स्तर पर राष्ट्र निर्माण एवं धर्म रक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यदि प्रत्येक गांव, कस्बे, शहर और मोहल्ले में ऐसे छोटे समूह बन जाएं, तो धीरे-धीरे एक सनातनी इको-सिस्टम विकसित हो जाएगा और प्राचीन व्यवस्थाएं पुनः स्थापित हो जाएंगी। फिर उन्होंने कहा, "क्या यह बिना संगठन और सरकार के सहयोग से संभव है? आम आदमी के पास इतना समय और संसाधन कहाँ है कि वह यह सब कर सके? इसलिए यह संभव नहीं है। आप बहुत आदर्श व्यवस्था की बात कर रहे हैं। सब कुछ सरकार और संगठन ही कर सकते हैं। समाज कुछ नहीं कर सकता है। जब समाज को सब करना है तो सरकार और संगठन की क्या आवश्यकता है?"
मैंने कहा कि सरकार और संगठन की एक सीमा होती है। संगठन की कई मजबूरियाँ होती हैं, विशेष रूप से सत्ता में बैठे संगठनों और सरकारों को कई चीजों का ध्यान रखना पड़ता है। इसलिए यह संभव नहीं है कि सरकार और संगठन सब कुछ कर सकें। ऐसे में परिवार और समाज के छोटे-छोटे समूहों का महत्व बढ़ जाता है, क्योंकि उनके पास स्थानीय स्तर पर अपनी नेतृत्व क्षमता होती है और वे किसी संगठन या विचारधारा के लिए बंधे नहीं होते हैं। इसलिए जब धर्म, संस्कृति या राष्ट्र को कोई चुनौती आती है, या स्थानीय स्तर पर कोई घटना घटती है, तो स्थानीय छोटे समूह समय पर प्रतिक्रिया दे सकते हैं और त्वरित कार्यवाही भी कर सकते हैं।
इसलिए छोटे-छोटे समूहों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जो कार्य बड़े संगठन नहीं कर सकते, वह कार्य मोहल्ले की एक छोटी सी हनुमान चालीसा टोली कर सकती है और हिंदू परिवार व्यवस्था को पुनर्स्थापित कर सकती है, जिससे हिंदू समाज भविष्य के खतरों के लिए तैयार हो पाएगा।
इसलिए आज के समय में बड़े संगठनों की अपेक्षा छोटे सामूहिक मिलन समूह अधिक प्रभावी होंगे। हिंदू समाज को संगठित करने और उसके भीतर स्वधर्म और शत्रुबोध जगाने में ये समूह बहुत बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।
✍️ दीपक कुमार द्विवेदी
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