सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

रतन टाटा जी के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए बहुत से लोग उनके द्वारा किए हुए चैरिटी के कामों में उनकी अच्छाई देख रहे हैं.


रतन टाटा जी के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए बहुत से लोग उनके द्वारा किए हुए चैरिटी के कामों में उनकी अच्छाई देख रहे हैं. 
मैं किसी भी उद्योगपति को उनके द्वारा किए हुए चैरिटी के कामों से नहीं, उनकी उद्यमिता (entrepreneurship) से ही जज करना चाहूंगा.

रतन टाटा 1991 में टाटा ग्रुप के चेयरमैन बने थे. तब भारत की इकोनॉमी के दरवाजे नरसिम्हा राव जी ने नए नए खोले थे. उसके पहले सरकारी संरक्षण में पाले पोसे गए औद्योगिक घरानों को कंपटीशन का सामना नहीं करना पड़ा था. वे एक समाजवादी गरीब देश में एक समाजवादी अमीर आदमी बन कर खुश थे. पहली बार वैश्विक कंपटीशन से पाला पड़ा और चीन और कोरिया से सस्ता स्टील आने लगा तो टाटा स्टील (उन दिनों की टिस्को) चरमराने लगी थी.

   तब टिस्को के एमडी रूसी मोदी हुआ करते थे और वे जमशेदपुर की एक बहुत लोकप्रिय हस्ती हुआ करते थे. उनको एक सहृदय और उदार व्यक्तित्व के रूप में जाना जाता था. कहते हैं, उनके सामने टाटा का कोई भी एंप्लॉयी हाथ जोड़ कर खड़ा हो जाता था तो इसके एक बेटे को कोई न कोई नौकरी पर लगा देते थे. तब टाटा एम्प्लॉयी के एक बेटे को टाटा में नौकरी तय थी. नतीजा यह था कि जमशेदपुर में बड़ी होने वाली उस पीढ़ी में कोई एंबीशन नहीं हुआ करता था... सब को सिर्फ टाटा की एक नौकरी चाहिए होती थी. वहीं दूसरी ओर टाटा कम्पनी शहर भर के टाटा एंप्लॉयीज के सबसे निकम्मे बेटों की कम्पनी बनती जा रही थी जिनको और कहीं काम नहीं मिलना था. बाप भी अपने सबसे काबिल बेटे को कहता था कि तुम्हें तो कहीं न कहीं जॉब मिल जायेगा... यह सबसे निकम्मा है, इसी को टाटा में ज्वाइन करने दो. 

    तब टाटा का एक विज्ञापन आया करता था... इस्पात "भी" हम बनाते हैं... उसमें कंपनी बताती थी कि वे पब्लिक के भले के लिए क्या क्या करते हैं, साथ में इस्पात "भी" बनाते थे. यानि टाटा कम्पनी एक समाजवादी लोक-कल्याणकारी लोकतांत्रिक गणराज्य बन गया था.

   तब रतन टाटा आए और उनके और रूसी मोदी के बीच एक बड़ा शो डाउन हुआ था. रतन टाटा ने कहा, आज से हम इस्पात "भी" नहीं बनाएंगे, इस्पात "ही" बनाएंगे. फिर टाटा ने अपने बेकार के एम्प्लॉयीज की छंटनी की, अपने प्लांट्स को मॉडर्नाइज किया, अपना उत्पादन का कॉस्ट घटाया और अपने आप को वैश्विक कंपटीशन के लिए तैयार किया. नतीजा यह रहा कि टूटती चरमराती टाटा कंपनी फिर से दुनिया की लीडिंग इस्पात उत्पादक कंपनियों में एक बन गई. आज मेरा जमशेदपुर जिंदा है तो उसके पीछे रतन टाटा जी की उद्यमिता और कॉरपोरेट लीडरशिप है. अन्यथा मैंने अपने जन्मस्थान सिंदरी को समाजवादी परमगति को प्राप्त करते देखा है... वही हाल जमशेदपुर का भी होना था. 

   चैरिटी करना एक उद्यमी का प्राथमिक काम नहीं है. बल्कि वह जो भी चैरिटी करता है वह किसी मजबूरी में, किसी वामपंथी दबाव में करता है. उसकी की हुई "चैरिटी" किसी लाल झंडे वाले की दुकान चलाती है, किसी कोने में देशद्रोहियों को प्रश्रय ही देती है. और यह चैरिटी वह अपने शेयर होल्डर्स और कस्टमर्स के कॉस्ट पर ही करता है. अगर टाटा चैरिटी करने के बजाय उतने संसाधनों को अपने प्रॉफिट को मैक्सिमाइज करने, नई फैक्ट्रीज लगाने में और हमें और सस्ता स्टील उपलब्ध कराने में लगाए तो उससे हमारा अधिक भला होगा. 
    
     एक उद्यमी जब खूब प्रॉफिट कमाता है तो वह सबका सबसे अधिक भला करता है. वह अपने निवेशकों को, अपने ग्राहकों को, पूरी अर्थव्यवस्था को संपन्न बनाता है. उसके विपरीत जब वह चैरिटी करता है तो वह किसी न किसी कोने में किसी परजीवी को समाज पर थोपता है, विषैले वामपंथी सांपों को पालता है. किसी भी दिन दुनिया के लिए फोर्ड मोटर्स जितना बड़ा वरदान रहा है, फोर्ड फाउंडेशन उतना ही बड़ा शाप रहा है. टाटा स्टील अगर देश की उद्यमिता और अर्थव्यवस्था का रत्न है तो टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) जहर की फैक्ट्री है.

     भारत में उद्यमिता के रतन, रतन नवल टाटा जी को उनकी उद्यमिता के लिए एक कृतज्ञ श्रद्धांजलि 


डॉ राजीव मिश्रा जी 

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