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देवर्षि नारद को श्रीराधा जी दर्शन कब हुआ था?

. 🌸देवर्षि नारद को श्रीराधा-दर्शन🌸

          
नारद जी ने व्रज में ब्रजेश्वर नन्द जी के भवन में नन्दनन्दन श्रीकृष्णचन्द्र के दर्शन किये। तत्पश्चात् विचार किया जब स्वयं गोलोक विहारी श्रीकृष्णचन्द्र भूतल पर अवतरित हुए हैं तो गोलोकेश्वरी श्रीराधा जी भी अवश्य आयी हैं। 
          देवर्षि का दिव्य ज्ञान कुण्ठित हो गया है, सर्वज्ञ नारद को श्रीराधा जी का अनुसन्धान नहीं मिल रहा है; मानो योगमाया देवर्षि को निमित्त बनाकर राधा दर्शन की यह साधना जगत्‌ को बता रही हों–पहले श्रीकृष्णचन्द्र के दर्शन होते हैं, उनके दर्शनों से श्रीराधा के दर्शन की इच्छा जाग्रत् होती है; फिर श्रीराधा के लिये व्याकुल होकर व्रज की गलियों में भटकना पड़ता है। 
          अस्तु, भ्रमण करते हुए देवर्षि वृषभानु-प्रासाद के सामने आकर खड़े हो जाते हैं। वह विशाल मन्दिर देवर्षि को मानो अपनी ओर आकर्षित कर रहा हो। देवर्षि भीतर प्रवेश कर जाते हैं। वृषभानु गोप की दृष्टि उन पर पड़ती है। वे दौड़कर नारदजी के चरणों में लोट जाते हैं।
          विधिवत् पाद्य-अर्घ्य से पूजा करके देवर्षि को प्रसन्न अनुभवकर वृषभानु गोप अपने सुन्दर पुत्र श्रीदामा को गोद में उठा लाते हैं, लाकर मुनि के चरणों में डाल देते हैं। 
          मुनि के नेत्रों में स्नेहाश्रु भर आता है; उत्तरीय से अश्रु पोंछकर उसे उठाकर वे हृदय से लगा लेते हैं, तथा गद्‌गद कण्ठ से बालक का भविष्य बतलाते हैं–‘वृषभानु ! सुनो, तुम्हारा यह पुत्र नन्दनन्दन का, बलराम का प्रिय सखा होगा।’
          
          तो क्या रासेश्वरी श्रीराधा जी यहाँ भी नहीं हैं ? निराश हुए देवर्षि चलने को उद्यत हुए। 
          वृषभानु बोले–‘भगवन् ! मेरी एक पुत्री है; सुन्दर तो वह इतनी है मानो सौन्दर्य की राशि देवलोक से कोई देवांगना उतर आयी हो। पर वह अपनी आँखें सदा निमीलित रखती है; हम लोगों की बातें भी उसके कानों में प्रवेश नहीं करतीं, उन्मादिनी-सी दीखती है; इसलिये हे भगवत्तम! श्रीचरणों में मेरी यह प्रार्थना है कि एक बार अपनी सुप्रसन्न दृष्टि उस बालिका पर भी डालकर उसे प्रकृतिस्थ कर दें।’
          आश्चर्य में भरे नारद वृषभानु के पीछे-पीछे अन्तःपुर में चले जाते हैं। जाकर देखा–स्वर्ण निर्मित सजीव सुन्दरतम प्रतिमा-सी एक बालिका भूमि पर लोट रही है। देखते ही नारद का धैर्य जाता रहा, अपने को वे किसी प्रकार भी संवरण न कर सके; वे दौड़े तथा बालिका को उठाकर उन्होंने अंक में ले लिया। 
          एक परमानन्द सिन्धु की लहरें देवर्षि को लपेट लेती हैं, उनके प्राणों में अननुभूतपूर्व एक अद्भुत प्रेम का संचार हो जाता है, वे बालिका को क्रोड़ में धारण किये अचेतन अवस्था में चले जाते है ।मानो उनका शरीर एक शिलाखण्ड हो। दो घड़ी के पश्चात् बाह्यज्ञान होता है ,बालिका का अप्रतिम सौन्दर्य निहारकर विस्मय की सीमा नहीं रहती। 
          नारद मन-ही-मन सोचने लगे–‘ओह! ऐसे सौन्दर्य के दर्शन मुझे तो कभी नहीं हुए। मेरी अबाध गति है, सभी लोकों में स्वच्छन्द विचरता हूँ; ब्रह्मलोक, रुद्रलोक, इन्द्रलोक–इनमें कहीं भी इस शोभा सागर का एक बिन्दु भी मैंने नहीं देखा; महामाया भगवती शैलेन्द्र नन्दिनी के दर्शन मैंने किये हैं, उनका सौन्दर्य चराचर-मोहन है; किन्तु इतनी सुन्दर तो वे भी नहीं! लक्ष्मी, सरस्वती, कान्ति, विद्या आदि सुन्दरियाँ तो इस सौन्दर्यपुंजकी छाया भी नहीं छू पातीं। 
          विष्णु के हर-विमोहन उस मोहिनी रूप को भी मैंने देखा है, पर इस अतुल रूप की तुलना में वह भी नहीं। बालिका को देखते ही श्रीगोविन्द-चरणाम्बुज में मेरी जैसी प्रीति उमड़ी, वैसी आज तक कभी नहीं हुई। बस, बस, यही श्रीराधा हैं; निश्चय ही यही श्रीरासेश्वरी हैं।’–देवर्षि का अन्तर्हृदय आलोकित हो उठा।
          
          ‘वृषभानु ! कुछ क्षण के लिये तुम बाहर चले जाओ,गद्गद कण्ठ से देवर्षि ने कहा। सरलमति वृषभानु देवर्षि को प्रणाम कर बाहर चले आये। नारद जी ने श्रीराधा जी का स्तवन आरम्भ किया
          श्रीनारद जी बोले–‘देवि ! महायोगमयि! महाप्रभामयि ! मायेश्वरि ! मेरे महान् सौभाग्य से, न जाने किन अनन्त शुभ कर्मों से रचित सौभाग्य का फल देने तुम मेरे दृष्टिपथ में उतर आयी हो। 
          हे देवि! ये तुम्हारे दिव्य अंग अत्यन्त मोहन हैं, ओह! इन मधुर अंगों से माधुर्य का निर्झर झर रहा है; इस मधुरिमा का एक कण ही उस महाद्भुत रसानन्द सिन्धु का सृजन कर रहा है, जिसमें अनन्त भक्त अनन्त काल तक स्नान करते रहेंगे। 
          हे देवि ! तुम्हारे इन निमीलित नेत्रों से भी सुख की वर्षा हो रही है, वह सुख बरस रहा है ?–जो नित्य नवीन है। मैं अनुभव कर रहा हूँ, तुम्हारे अन्तर्देश में सुख का समुद्र लहरा रहा है; उसी की लहरें नेत्रों पर, तुम्हारे इस प्रसन्न, सौम्य, मधुर मुखमण्डल पर नाच रही हैं।
          देवर्षि की वाणी काँप रही है, पर स्तवन करते ही जा रहे हैं–

          तत्त्वं विशुद्धसत्त्वासु शक्तिर्विद्यात्मिका परा।
          परमानन्दसंदोहं दधती वैष्णवं परम्॥ 
          कलयाऽऽश्चर्यविभवे ब्रह्यरुद्रादिदुर्गमे।
          योगीन्द्राणां ध्यानपथं न त्वं स्पृशसि कर्हिचित्॥
          इच्छाशक्तिर्ज्ञानशक्तिः क्रियाशक्तिस्तवेशितुः।
          तवांशमात्रमित्येवं मनीषा मे प्रवर्तते॥
                          × × ×
          आनन्दरूपिणी शक्तिस्त्वमीश्वरि न संशयः।
          त्वया च क्रीडते कृष्णो नूनं वृन्दावने वने॥
          कौमारेणैव रूपेण त्वं विश्वस्य च मोहिनी।
          तारुण्यवयसा स्पृष्टं कीदृक्ते रूपमद्भुतम्॥
                                           (पद्मपुराण पा० ख०)

          ‘देवि ! तुम्हीं ब्रह्म हो; सच्चिदानन्द ब्रह्म के सत्- अंश में स्थित सन्धिनी शक्ति की चरम परिणति-विशुद्ध सत्त्व तुम्हीं हो; विशुद्ध सत्त्वमयी तुममें ही चिदंश की संवित्-शक्ति, संवित् की चरम परिणति विद्यात्मि का परा शक्ति-ज्ञानशक्ति का भी निवास है; तुम्हीं आनन्दांश की ह्लादिनी शक्ति, ह्लादिनी की भी चरम परिणति महाभाव रूपिणी हो; आश्चर्यवैभवमयि ! तुम्हारी एक कला का भी ज्ञान ब्रह्म-स्दतक के लिये कठिन है, फिर योगीन्द्रगण के ध्यान पथ में तो तुम आ ही कैसे सकती हो? मेरी बुद्धि तो यह कह रही है कि इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति–ये सभी तुम ईश्वरी के अंशमात्र हैं
                          × × ×
          श्रीकृष्णचन्द्र की आनन्दरूपिणी शक्ति तुम्हीं हो, तुम्हीं उनकी प्राणेश्वरी हो–इसमें कोई संशय नहीं; तुम्हारे ही साथ निश्चय श्रीकृष्णचन्द्र वृन्दावन में क्रीड़ा करते हैं। ओह देवि! जब तुम्हारा कौमार रूप ही ऐसा विश्वविमोहन है, तब वह तरुण रूप कितना विलक्षण होगा!’
          कहते-कहते नारद का कण्ठ रुद्ध होने लगता है। प्राणों में श्रीराधा के तरुण रूप को देखने की प्रबल उत्कण्ठा भर जाती है। वे मणिपालने पर श्रीराधा को लिटा देते हैं तथा बारंबार प्रणाम कर तरुण रूप से दर्शन देने के लिये प्रार्थना करते हैं। 
          नारद के अन्तहृदय में मानो कोई कह देता है–‘देवर्षे ! श्रीकृष्ण की वन्दना करो, तभी श्रीकृष्ण प्रियतमा के नेत्र तुम्हारी ओर फिरेंगे।’ 
          देवर्षि श्रीकृष्णचन्द्रकी जय-जयकार कर उठते हैं–

          जय कृष्ण मनोहारिन् जय वृन्दावनप्रिय।
          जय भ्रूभंगललित जय वेणुरवाकुल॥
          जय बर्हकृतोत्तंस जय गोपीविमोहन।
          जय कुंकुमलिप्तांग जय रत्नविभूषण॥
                                   (पद्मपुराण, पा० ख०)

          इसी समय दृश्य बदल जाता है। मणि पालने पर विराजित वृषभानु कुमारी अन्तर्हित हो जाती हैं तथा नारद के सामने किशोरी श्रीराधा का आविर्भाव हो जाता है। दिव्य भूषण-वसन से सज्जित अगणित सखियाँ भी वहाँ प्रकट हो जाती हैं, श्रीराधा को घेर लेती हैं। वह रूप ! वह सौन्दर्य !–नारद के नेत्र निमेष शून्य एवं अंग निश्चेष्ट हो जाते हैं, मानो नारद सचमुच अन्तिम अवस्था में जा पहुँचे हों।
          राधाचरणाम्बुकणिका का स्पर्श कराकर एक सखी देवर्षि को चैतन्य करती है है–‘मुनिवर्य ! अनन्त सौभाग्य से श्रीराधा के दर्शन तुम्हें हुए हैं। महाभागवतों को भी इनके दर्शन दुर्लभ हैं।’

🔥⚔️🔥जय श्री राम🔥⚔️🔥

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