सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

दुनिया का शायद ही कोई ऐसा सनातनी हिन्दू होगा जो पौराणिक काल में हुए समुद्र मंथन कथा से अनभिज्ञ होगा.

दुनिया का शायद ही कोई ऐसा सनातनी हिन्दू होगा जो पौराणिक काल में हुए समुद्र मंथन कथा से अनभिज्ञ होगा.

असल में इस समुद्र मंथन का जिक्र विष्णु पुराण में बड़े ही विस्तार से किया गया है.

विष्णु पुराण के अनुसार, एक बार दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण स्वर्ग श्री हीन (धन, वैभव और ऐश्वर्य से वंचित) हो गया था.

तब इससे परेशान होकर सभी देवतागण श्री हरी भगवान विष्णु के पास गए.
जहाँ, देवताओं की समस्या सुन कर भगवान विष्णु ने असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने का उपाय बताया.
और, उन्होंने देवताओं से कहा कि जब समुद्र मंथन होगा तब उसमें से अमृत निकलेगा, जिसे ग्रहण कर सभी देवता अमर हो जाएंगे.

ये सुनकर सभी देवताओं ने समुद्र मंथन की बात राक्षस राज बलि को बताई और उन्हें भी आधी भागीदारी देने की बात कही... 
जिसके बाद राक्षस राज मंथन के लिए तैयार हो गए.

पुराण के अनुसार, भगवान विष्णु ने वासुकी नाग को नेती (मथनी) बनने का आदेश दिया और कहा कि मंदराचल पर्वत की सहायता से समुद्र मंथन का कार्य सिद्ध होगा.

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि जब समुद्र मंथन हुआ तो उससे अमृत के अलावा भी कई सारे रत्न निकले, जिसमें उच्चैश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, भगवान धन्वन्तरि समेत अन्य 14 रत्न निकले थे.

और, जब समुद्र मंथन हुआ तो सबसे पहले कालकूट विष निकला था, जिसे भगवान शिव ने ग्रहण किया.

ततपश्चात, कामधेनु गाय निकली थी.

जिसे ब्रह्मवादी ऋषियों ने ग्रहण किया था.

विष्णु पुराण के अनुसार, कामधेनु गाय मन की निर्मलता का प्रतीक है.

इसके बाद, तीसरे नंबर पर उच्चैश्रवा घोड़ा निकला जो सफेद रंग का था. माना जाता है कि उच्चैश्रवा घोड़ा को राक्षस राज बलि अपने पास रख लिए.

इसी तरह... अन्त में उससे अमृत निकला था जिसे देवताओं ने ग्रहण किया जिससे देवताओं एवं स्वर्ग का धन, वैभव और ऐश्वर्य लौट आया था.

यहाँ... विष्णु पुराण में वर्णित समुद्र मंथन प्रसंग को अगर हम ध्यान से समझें तो हमें ये स्पष्ट समझ आता है कि... जब किसी शापवश देवतागण श्री हीन हो गए थे तो उस विकट परिस्थिति में श्री हरि ने अपना धन-वैभव और ऐश्वर्य वापस पाने हेतु उन्हें असुरों से युद्ध करने की सलाह नहीं दी थी.

बल्कि, उन्हें "सबका साथ, सबका विकास" का नारा लगाते हुए असुरों से साथ मिलकर समुद्र मंथन करने की सलाह दी थी.

साथ ही साथ... देवताओं ने असुरों को ये आश्वासन भी दिया था कि समुद्र मंथन से जो भी चीज निकलेंगे उसे हम दोनों (देव एवं असुर) आधा-आधा बांट लेंगे.

इन सबके अलावा इसमें एक सबसे महत्वपूर्ण प्रसंग ये भी है कि... जब समुद्र मंथन के पहले चरण में हाहाकारी कालकूट विष निकला था तो उसे देवताओं के पक्ष से भगवान भोलेनाथ ने ग्रहण कर लिया था.

तो, अगर हम इस समुद्र मंथन प्रसंग को आज के समय में लिखें तो शायद हम इसे ऐसे लिखेंगे कि...

1200 वर्षों की शापित गुलामी के कारण देवताओं के वंशज श्री हीन हो चुके थे अर्थात उनका आत्मविश्वास, धन, वैभव और ऐश्वर्य जाता रहा था.

फिर, देवताओं के वंशजों के उस आत्मविश्वास, धन, वैभव एवं ऐश्वर्य को पुनः प्राप्त करने हेतु एक बार फिर से समुद्र मंथन प्रारंभ हुआ.
(यहाँ समुद्र से तात्पर्य ग्लोबल वर्ल्ड से है)

और, पौराणिक समुद्र मंथन से ही प्रेरणा लेकर इस कलयुग के समुद्र मंथन को भी निर्विध्न पूरा करने हेतु असुरों से संधि की बात की जा जाने लगी और उसी तर्ज पर सबका साथ, सबका विकास के तराने गाये जाने लगे.
(ये जानते हुए भी वे देवता और असुर जन्मजात शत्रु हैं)

तथा, इस युग में भी असुरों को आश्वासन दिया जाने लगा कि... हल्ला-हंगामा न करो..

क्योंकि, समुद्र मंथन से जो भी निकलेगा उससे तुम भी लाभान्वित होंगे.

हम तुम्हें एक हाथ में लोढ़ा और एक हाथ में लहसुन तक देंगे.

तुम्हारे हलाला स्थल, अर्थात मधरसों को हाईटेक कर देंगे.

ये कर देंगे , वो कर देंगे आदि-आदि.

इस तरह, सबको कन्विंस कर समुद्र मंथन का ये ऐतिहासिक कार्य प्रारंभ किया गया.

जिससे देवतागण भी खुश थे और असुरगण भी.

और, जैसा कि होता है... समुद्र मंथन के प्रारंभिक चरण में समुद्र से हलाहल कालकूट विष निकला.

अर्थात, जे हादी और वामपंथी ब्रिगेड के साथ-साथ सारे कालिस्तानी एवं डीप स्टेट के लोग बाहर आ गए जो किसी भी बहाने से देश में हाहाकार (गृहयुद्ध) मचा देना चाहते थे.

परन्तु, सतयुग की ही तरह... इस कलयुग में भी देवताओं के प्रतिनिधि ने इस हलाहल विष को पी लिया.

अर्थात, उन्होंने शाहीन बाग, खिसान आंदोलन, मौलाना साद आदि पर चुप्पी साध ली..

भले ही इसके लिए उसे कायर, कमजोर या मौलाना कुछ भी संज्ञा दी जाते रहे.

तत्पश्चात, समुद्र मंथन से कामधेनु गाय एवं उच्चैश्रवा घोड़ा निकला जिसके परिणामस्वरूप पूरे समुद्र (दुनिया) में देवताओं (भारत) का वर्चस्व बढ़ने लगा एवं वैभव (अर्थव्यवस्था) आसमान छूने लगे.

परंतु, सतयुग की तुलना में कलयुग के इस समुद्र मंथन का दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष ये रहा कि...

कलयुग के समुद्र मंथन में देवताओं के वंशज अपने ही प्रतिनिधि को गाली देने लगे कि उन्होंने इस समुद्र मंथन में असुरों को किनारे क्यों नहीं रखा है.

अथवा, समुद्र मंथन से उत्पन्न इस हाहाकारी कालकूट विष को उन्होंने असुरों को ही क्यों नहीं पिला दिया ?

खुद कालकूट विष पी कर वे क्या साबित करना चाहते हैं ?

कुछेक लोग तो यहाँ तक कहने लगे कि शायद भोलेनाथ "ऑस्कर शांति अवार्ड" की लालच में वो कालकूट विष पी गए होंगे.

जबकि, कुछेक लोग ये बताने लगे कि.. अरे, अब भोलेनाथ में उस त्रिपुरासुर राक्षस को मारने का दम नहीं बचा है... 

इसीलिए, वे ये विष आदि पी कर उनका तुष्टिकरण करने में लगे हैं...!

काश कि... देवताओं के वंशजों ने हर साल धूमधाम से दीपावली मनाने एवं धनतेरस को बाइक्स, कार, मोबाइल आदि खरीदने के अलावा यदि कभी अपने धर्मग्रंथों को भी पढ़ा होता तो उन्हें भलीभांति पता होता कि...

स्वर्ग एवं देवताओं का आत्मविश्वास, वैभव एवं ऐश्वर्य लौटाने हेतु उस युग में भी किस तरह समुद्र मंथन किया गया था.

साथ ही उन्हें ये भी समझ आ पाता कि... समुद्र मंथन के पहले चरण में ही न अमृत उस युग में निकला था और न ही इस युग में निकलेगा.

क्योंकि, शुरुआत में ही उस कालकूट नामक हलाहल विष के निकलने पर घबड़ाये देवताओं को भगवान श्री हरि ने समझाते हुए कहा था कि... अगर, आपमें विष झेलने की ताकत है तभी आप अमृत के अधिकारी हो सकते हो.

क्योंकि, अगर अमृत पाना इतना ही सरल होता तो आज सभी लोग अमृत पी कर धन-वैभव और ऐश्वर्य से परिपूर्ण होकर अमर हो चुके होते..!
परंतु , ऐसा नहीं है.

और, इसका कारण भी स्पष्ट है कि... जो प्रारंभिक चरण में ही विष से घबड़ा जाए वो अमृत का अधिकारी भला कैसे हो सकता है ?

हरि ॐ...!!
जय महाकाल...!!!

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