सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था का विकल्प तलाशने का वक्त आ चुका इस पर विचार मंथन करने की क्यो आवश्यकता है?

हम कल से विचार कर रहे हैं कि भारत में लोकतंत्र आया कहां से। लोकतंत्र कोई भारत का तो है नहीं लोकतंत्र हमने विदेश से लिया विदेश में भी लोकतंत्र किसी गंभीर विचार मंथन का परिणाम नहीं था बल्कि तानाशाही में एक नया प्रयोग हुआ और ग्रीस में तानाशाही की अपेक्षा लोकतंत्र को अच्छा माना गया वही धीरे-धीरे दुनिया भर में फैला। भारत गुलाम था इसलिए स्वतंत्रता के समय आंख बंद करके लोकतंत्र को स्वीकार करना हमारी मजबूरी थी। वास्तव में लोकतंत्र को तानाशाही का विकल्प नहीं माना गया था बल्कि तानाशाही की तुलना में कम बुरी व्यवस्था के रूप में स्वीकार किया गया था। यह कैसा लोकतंत्र है कि जिसकी परिभाषा ही गलत है ।फॉर द पीपल ऑफ द पीपल बाय द पीपल कभी दुनिया के समझ में ही नहीं आया। लोकतंत्र ने तानाशाही की जो परिभाषा थी उसको बदलकर लोक नियुक्त तंत्र कर दिया जबकि तानाशाही परिवार नियुक्त तंत्र थी या शक्ति नियुक्त तंत्र लेकिन वास्तव में आदर्श लोकतंत्र तो लोक स्वराज हो सकता था जिसका अर्थ होता है लोक नियंत्रित तंत्र । लोक नियुक्त तंत्र कोई अच्छी परिभाषा नहीं है लेकिन हम लोगों ने गुलाम मानसिकता के कारण पश्चिम की आंख बंद करके नकल की और आज तक हम उसी को ढो रहे हैं। हम लोकतंत्र का अच्छा विकल्प ही नहीं खोज पा रहे हैं अब भारत स्वतंत्र है अब भारत को चिंतन मंथन की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। अब भारत को वैचारिक धरातल पर दुनिया का नेतृत्व करना चाहिए अब भारत को इस बात की शुरुआत करनी चाहिए कि हम तानाशाही का नया विकल्प लोक स्वराज के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं ।मेरे विचार से लोकतंत्र को पूरी तरह नकार देना चाहिए अस्वीकार कर देना चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में हमेशा अराजकता ही होती है लोकतंत्र तो अराजकता का जनक माना जाता है दुनिया में जहां भी लोकतंत्र है वहां अराजकता बढ़ना स्वाभाविक है। आइए हम आप सब मिलकर अराजकता का समाधान खोजें तानाशाही का समाधान खोजें तानाशाही का विकल्प तैयार करें। दुनिया को यह बता दें कि हम भारत के लोग वैचारिक धरातल पर दुनिया का मार्गदर्शन करने की क्षमता रखते हैं

 विचारक बजरंग मुनि के पटल से।

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