सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

बिना हिंदू मनोभाव को समझे स्थाई हिंदू एकता संभव क्यो नही है

हम लोग आब्रहिमक संदर्भ हिंदू एकता की संकल्पना करते लेकिन हिंदू मनोभावों को समझने का प्रयत्न नहीं करते हैं । हमारे विचारक न त्रिगुणात्मक श्रृष्टि के रहस्य को समझने का प्रयत्न करते हैं । इसी कारण हिंदू समाज के मनोभाव को समझे बिना हिंदू चिंतन धारा का ज्ञान नहीं होने के वावजूद अकारण हिंदू धर्म में सुधारों की बात करने लग जाते हैं और इसके आलावा यह मानने लगते हमारे अंदर कुछ कमी इसी कारण हम हजार वर्ष तक गुलाम रहे लेकिन यह भूल जाते हजार वर्ष के तथाकथित गुलामी के कालखंड में कोई ऐसा दिन नहीं गया कि जिस दिन हम समाज के रूप कही कही नहीं आब्रहिमक मतों से संघर्ष ही करते रहे हैं इसी कारण इतने आक्रमणों के बावजूद हमे बचे रह गए हम वही पराजित हुए जहां अपनों नहीं हमे धोखा दिया है। अब बात त्रिगुणात्मक सृष्टि की करते हैं इस विषय पर भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है कि  
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।

तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।

गुण और कर्मों के विभाग से चातुर्वण्य मेरे द्वारा रचा गया है। यद्यपि मैं उसका कर्ता हूँ, तथापि तुम मुझे अकर्ता और अविनाशी जानो।। 
 
 हम लोग त्रिगुणात्मक सृष्टि सत रज तम गुण के महात्म्य को नहीं समझते प्रकृति की व्यवस्था को बिना समझे हम लोग कहने लगते हिंदू अपनी जातिगत पहचान को छोड़ दें अपनी परंपराएं छोड़ दें परन्तु हम यह कभी नहीं कहते कि हिंदू पहचान का आधार सिर्फ वैदिक धर्म और समाजिक जीवन में श्रमण परंपराओं बहुत महत्वपूर्ण भूमिका दोनों परंपराओं के बीच संतुलन साधें बिना स्थाई एकता संभव नहीं है । 

इस देश का हिंदू सिर्फ वैदिक धर्म के नाम पर एक हो सकता समाजिक जीवन में श्रमण परंपराओं के आधार पर हो सकता तीसरा कोई विकल्प नहीं है वैदिक दर्शन सनातन हिंदू धर्म की आत्मा है शरीर श्रमण परंपरा दोनों के बिना सनातन धर्म का अस्तित्व कल्पना भी नहीं की जा सकती है । जाति वर्ण हिंदू एकता के लिए सबसे उपयुक्त स्थाई कारक है ,हमारी समाजिक व्यवस्था सबसे मजबूत स्तंभ जिस दिन जाति वर्ण कुल वंश परम्परा का लोप हो जाएगा उस दिन सनातन हिन्दू धर्म का भी लोप हो जाएगा इसलिए हमारे शास्त्रों में कहा गया कि कुल धर्म की रक्षा करना ही धर्म रक्षा है। 

सनातन धर्म के लिए पिछले हजार वर्ष में 25% हिंदू संघर्षरत बाकी सबको अपने निजी हित स्वार्थ से मतलब यहां तक राष्ट्र से भी उन्हें मतलब नहीं है । मोदी बीजेपी संघ का समर्थक वर्ग भी वही हिंदू जिसके पूर्वजों ने पिछले हजार वर्ष से आब्रहिमक मतों से संघर्ष किया है।राजनीतिक संदर्भ में पूर्ण रूप हिंदू एकता कभी संभव नहीं हो सकती है क्योंकि 25% हिंदू पूर्ण रूप से वैचारिक रूप स्पष्ट और धर्म और राष्ट्र रक्षार्थ अपना जीवन भी अर्पित कर सकता है उसके लिए धर्म और राष्ट्र बढ़कर कुछ नहीं है ,बाकी 75% में 30% तो अधर्मनिष्ठ हिंदू है , कम्युनिस्ट कांग्रेसी समाजवादी सेकुलर यह सब त्रेतायुग द्वापरयुग के असुर दैत्य दानव और राक्षस है ,बाकी 50% जिनकी सोच यह कि कोउ नृप होई हमै का हानि इस माइंडसेट का है।

समाजिक, आध्यत्मिक, आर्थिक, संदर्भ में हिंदू एकता पूरी तरह संभव क्योंकि हिन्दू समाज के बड़े वर्ग के विचार पूरी तरह खुले बाजार व्यवस्था एवं व्यवसायीकरण का समर्थक रहा है । कुटुंब कुल वंश गोत्र परम्परा से एक दुसरे जुड़े हुए हैं चाहे वैदिक परंपरा हो या श्रमण परंपरा दोनों के विचार मत अलग फिर भी मत अलग होते हुए एक दूसरे के पूरक हैं। इसलिए जब राम , कृष्ण, शिव , माता जगदंबा वेदो की बात आती है हिंदू धर्म की रक्षार्थ की बात आती अपने कुटुम्ब जाति के अस्मिता की बात आती तब हिंदू समाज के रूप में पूर्णरूपेण संगठित होकर शत्रुओं का प्रतिकार करता है। 

हिंदू समाज समाजिक रूप में बहुत संगठित आध्यात्मिक दार्शिनिक रूप बहुत समृद्ध समाज है आर्थिक रूप से हमसे अच्छा व्यवसाय प्रबंधन इस दुनिया में कोई नहीं कर सकता है हम दुनिया के सबसे बड़े बनिए है। इसलिए मैं कहता हूं हिंदू समाज का वोटिंग पैटर्न आब्रहिमक मतों की तरह कभी नहीं हो सकता लेकिन हिंदू समाज को समाजिक आर्थिक आध्यात्मिक रूप से हम संगठित कर सकते हैं। 

हम लोग हिन्दू समाज को वोट देने की मशीन नहीं बना सकते हैं न समस्त हिन्दू समाज आब्रहिमक मतों की तरह बिना बुद्वि प्रयोग किए किसी पार्टी को वोट दे सकता है। लेकिन एक काम जरूर कर सकते हिंदू समाज को राजनीतिक समाजिक आर्थिक धार्मिक रूप से इतना मजबूत बना सकते कि सरकार किसी का रहे सिस्टम किसी का रहे लेकिन हिंदू समाज के विरूद्ध को कार्य करने के बारे में सौ बार सोचे यह तभी संभव जब हिंदू समाज के अंदर जितने मत पंथ विचार दर्शन सभी को सम दृष्टि देखेंगे सनातन हिन्दू धर्म के मत पंथ दर्शन संप्रदायों के साथ अनावश्यक छेड़खानी नहीं करेंगे और उन्हें फलने फूलने का अवसर देंगे और एक संप्रदाय के उपर दूसरे संप्रदाय का विचार को थोपने का प्रयास नहीं करेंगे और हिंदू धर्म से जुड़ी जितनी लोक परंपराएं हैं, उन्हें समाज के रूप संरक्षित रखेंगे तो अपने आप ही कुछ वर्षों में हिंदू एकता स्थाई रूप में संभव हो जाएंगी लेकिन सुधारवाद के नाम पर हिन्दू धर्म पर सुधार करने का प्रयास करेंगे हिंदू धर्म में इतने मत पंथ विचारधारा संप्रदाय खड़े हो जाएंगे जिन्हें गिनना भी संभव नहीं हो पाएगा। 

दीपक कुमार द्विवेदी

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