सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

Bad_Weather_Warning जब से कोरोना आया, मैं एक बात बार बार कह रहा हूं... कॉरोना एक जैविक हथियार हो या ना हो, एक राजनैतिक अवसर अवश्य है.

#Bad_Weather_Warning 
जब से कोरोना आया, मैं एक बात बार बार कह रहा हूं... कॉरोना एक जैविक हथियार हो या ना हो, एक राजनैतिक अवसर अवश्य है. दुनिया में हर बड़ा संकट वामपंथ के लिए एक अवसर होता है. पहले विश्वयुद्ध के बाद रूस का पतन हुआ था, दूसरे विश्व युद्ध के बाद चीन, पूर्वी एशिया और पूर्वी यूरोप में साम्यवाद फैला. हमारे युग का विश्वयुद्ध कोरोना था जिसके निशाने पर दुनिया के चार देशों की लोकतांत्रिक सरकारें थीं जो वामपंथ के लिए प्रतिकूल थीं... अमेरिका, इंग्लैंड, ब्राजील और भारत. 

    इनमें से पहली तीन तो कोरोना और उसके आर्थिक परिणामों की बलि चढ़ गईं. बचे हैं हम, जहां लोकतंत्र को मैनिपुलेट करने की चाल सफल नहीं हो पा रही. 
 
   स्वाभाविक है कि ऐसे में भारत में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बायपास करने का काम किया जाएगा. आखिर डेढ़ अरब माइंड्स को लगातार मैनिपुलेट करना बहुत खर्चे का काम है, कॉस्ट इफेक्टिव नहीं है. इसलिए हमपर वह तरीका अपनाया जाएगा जो अलोकतांत्रिक सिस्टम्स पर अपनाया गया है... अरब स्प्रिंग या फिर हाल फिलहाल में बांग्लादेश वाला... यानि हिंसक भीड़ जुटाकर सत्ता को बेदखल करने का रास्ता. 

  और उसके लिए जमीन बिल्कुल तैयार है. किसान के नाम पर खालिस्तानी शक्तियां तैयार बैठी हैं, एक अटेम्प्ट ले भी चुकी हैं. दूसरा प्रयास असफल रहा क्योंकि उन्हें हरियाणा में रोक लिया गया. और इसीलिए हरियाणा का चुनाव उनके लिए इतना क्रूशियल है. और सिर्फ चुनाव जीतने पर ही नहीं, जाटों के बीच विभाजनकारी भारत विरोधी मानसिकता को कल्टीवेट करने पर भी बहुत निवेश किया गया है और यह वह कड़ी है जो पंजाब की आग को फैलाकर दिल्ली तक पहुंचाने की योजना के लिए क्रूशियल है. 

    अभी लगभग पूरी दुनिया पर वामपंथ का कब्जा है. भारत एक अकेला अपवाद है, समुद्र की इस आग के बीच प्रतिकार का एक अकेला द्वीप है. अभी साल के अंत में अमेरिका में चुनाव हैं और आशंका है कि वहां डोनाल्ड ट्रंप की वापसी हो सकती है. इसलिए वामपंथी तंत्र भारत पर अपने मोहरे वहां के चुनावों से पहले पहले चलना चाहेगा. मेरा आकलन है कि इस वर्ष के अंत से पहले भारत पर अबतक का सबसे बड़ा हमला होने वाला है, और पिछले चुनावों में हमने उन्हें पर्याप्त संसाधन उपलब्ध करा दिए हैं. मैं हमेशा से जिस "एंडगेम" की चेतावनी देता आ रहा हूं वह बिल्कुल सामने दिखाई दे रहा है. 

    हमारा राजनीतिक तंत्र तो पैरालाइज्ड है हो, बौद्धिक तंत्र के नाम पर जो कुछ भी लूला लंगड़ा है वह अभी एपिलेप्सी का शिकार है. उसे मोदी विरोध के मिर्गी के झटके आ रहे हैं. कुछ लोग तो बहुत खुश हैं कि मोदी विरोध की उनकी भविष्यवाणियां सत्य हो रही हैं. यहां मुझे घने काले बादल दिखाई दे रहे हैं...किसी को लग सकता है कि मौसम सुहाना हो गया है.

राजीव मिश्रा जी

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