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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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मूसा यहूदियों के अगुआ थे। एक बार किसी पहाड़ी से उनका गुजर हुआ। वहां देखा कि एक गैर-यहूदी गड़रिया प्रार्थना की मुद्रा में बैठा है। मूसा को कौतूहल हुआ कि ये बद्दू गड़रिया अपनी प्रार्थना में क्या कहता होगा। वो उस गड़रिये के करीब गए तो उसके शरीर से बदबू का वो दुर्गंध उठा कि मूसा के लिए नाक खोले रखना दूभर हो गया। मूसा के पैरों पर कीड़े चढ़ने लगे, हटाने के लिए झुके तो देखा कि ये कीड़े तो उस गड़रिया के शरीर के अनगिनत घावों से निकल कर आ रहे है।
मूसा ऊहापोह में पड़ गए कि इस माहौल में रहें या जाएं पर वो नबी थे तो उनको लगता था कि सबको हिदायत देकर सही रास्ते पर लाना, सही तरीके सिखाना उनका दायित्व है तो वो उसकी प्रार्थना सुनने के लिए वहीं रुक गए।
गड़रिया ईश्वर से कह रहा था -
"मुझे अपने पास बुला ले या मेरे पास आ जाओ तो तेरी ऐसी सेवा करूंगा कि तू खुश हो जायेगा। मैं तेरे पैर दबाऊंगा, तुझे नहलाऊंगा, तेरे घाव साफ कर दूंगा, तेरे बाल से जुएं निकाल दूंगा, बस एक बार आ जा तू"
वो ऐसी ही बातों के साथ प्रार्थना कर रहा था और मूसा आगबबूला हो रहे थे। जब बर्दाश्त न हुआ तो झकझोर कर उससे कहा - दुष्ट इंसान! तू ईश्वर से बात कर रहा है या शैतान से?
वो बेचारा गड़रिया मूसा के इस रूप को देखकर डर गया और कांपते हुए कहा - क्या मैनें कुछ गलत कह दिया ईश्वर से?
मूसा ने गुस्से से कांपते हुए कहा - तू ईश्वर को अपने जैसा समझता है कि उससे कह रहा है कि तू उनके बाल से जुएं निकाल देगा, उनको नहलाकर उनकी गंदगी साफ करेगा, उनके पैर दबाएगा, उनके घाव साफ करेगा। अरे मूर्ख! वो ईश्वर इन बातों का मोहताज नहीं है जो तू उनसे कह रहा है। फौरन उस सर्वशक्तिमान से तौबा तलब कर।
गड़रिये ने सहमे स्वर में कहा - मैं तो ईश्वर को अपने ही जैसा जानता हूं तो ये सब कह दिया। अगर मैं गलत प्रार्थना कर रहा था तो आप खुदा के नबी हैं, आप मुझे सही प्रार्थना सीखा दीजिए, आगे से मैं वही करूंगा।
मूसा ने उसे तोराह से चयनित प्रार्थनाओं का अभ्यास कराया। उस बेचारे ने उसे दोहराया तो उसमें तमाम गलतियां थी। मूसा ने उसे बार-बार उन प्रार्थनाओं का अभ्यास कराया और जब निश्चिंत हो गए कि अब ये सीख चुका है तो वो विजयी भाव से वहां से निकल गए कि आज एक गुमराह को मैनें हिदायत दी। उसे सही से प्रार्थना करना सिखाया।
उधर वो मूसा की बताई रीति से प्रार्थना करने बैठा तो भावहीन था और किसी रिकार्ड किए कैसेट की तरह उसके मुंह से शब्द निकल रहे थे। जो दुआ पहले उस गड़रिये के दिल से निकलती थी अब वो केवल उसके जुबान से थी। वो चाहकर भी अपनी नई प्रार्थना से खुदा को जोड़ न सका।
मूसा विजयी भाव लिए रास्ते में थे तो उन्हें खुदा की वाणी सुनाई थी। खुदा ने उनसे कहा -
मूसा! आज तूने वो काम किया है जो मुझे सख्त नापसंदीदा है।
मूसा ने पूछा - क्या प्रभु?
ईश्वर ने कहा -तूने आज मेरे एक मुहिब को मुझसे दूर कर दिया जो मुझे अपने जैसा मानकर दिल से मेरी इबादत किया करता था। मैने तुझे लोगों को मुझसे जोड़ने के लिए भेजा था और तूने उन्हें मुझसे तोड़ना शुरू कर दिया।
हैरान परेशान मूसा के कहा - लेकिन मैने तो आपके दिए हुकुमनामे वाले तख्ती के अनुरूप ही प्रार्थना करने की तालीम दी उसे; ताकि वो अक्षरश: आपके किताब के ताबेअ रहे और आप मुझसे ही खफा हैं।
ईश्वर ने कहा - तोराह में दिए गए प्रार्थनाओं को शब्दश: कहने वाले तो दुनिया में लाखों बंदे हैं, पर दिल से मेरी इबादत करने वालों में ये चुनिंदा था। मुझे पसंद नहीं आया तेरा ये करना। अब जा और जाकर माफ़ी मांग उससे और उससे कह कि तू पहले जिस तरह से प्रार्थना करता था, वैसे ही आगे भी कर, उसे बदलने की जरूरत नहीं है। मैं लोगों के द्वारा किए प्रार्थनाओं के शब्दों को सुनता हूं ऐसा लगता है तुम्हें?
मूसा ने कहा - तो क्या प्रभु?
ईश्वर - अरे मैं तो उनकी भी सुनता हूं जो बेजुबान हैं, मैं तो उनकी भी सुनता हूं जो मूक हैं, उनकी भी सुनता हूं जो कुछ कह नहीं सकते फिर तू कहां शब्दों पर अटका है ऐ मूसा?
मूसा वापस आए, उस गड़रिये से क्षमा मांगी और समझा कि मनुष्य के अंदर उसी खुदा ने ये खुसूसियत रखी है कि वो अपनी चेतना से, अपने समझ से, अपने बोध से अपने माबूद को पुकार सकता है, इसके लिए उसे किसी आर्टिफिशियल तरीके की जरूरत नहीं पड़ती, न ही उसे ये किसी से सीखना पड़ता है। बेजुबान की जुबान मालिक सबसे पहले सुनता है।
यहूदी दंत कथाओं में आए इस प्रसंग की ऐतिहासिकता मुझे नहीं मालूम पर शायद मूसा के जीवन के इस प्रसंग को आत्मसात कर ही यहूदी लोग "मतांतरण" में बिलीव नहीं करते, कोई ईश्वर को कैसे पुकारता है इसको लेकर वो उसमें नहीं घुसते, किसी को अपने मज़हब में आने का आमंत्रण भी नहीं देते और यही वो चीज है जो हिंदुओं और यहूदियों में सांझी है कि हम किसी को उसकी उपासना पद्धति बदलने पर मजबूर नहीं करते बल्कि हम ये तस्लीम करते हैं कि दुनिया में हरेक का अपने माबूद के साथ एक अलग और आला रिश्ता है, जिसे जीने का बल्कि अपने तरीके से जीने का उसे अधिकार है।
इसी सोच के चलते विश्व में मजहब के नाम पर हुए रक्तपात और हिंसा में हिंदुओं और यहूदियों का नाम कहीं नहीं है, किसी सभ्यता का उच्छेद करने में हम कहीं नहीं रहे, हमने किसी के देवालय को नहीं तोड़ा, किसी की किताबें नहीं जलाई, मज़हब का व्यापार नहीं किया, किसी की भय, लालच और प्रलोभन नहीं दिए कि वो अपना मज़हब तब्दील करे।
रक्तरंजित विश्व के पीछे सबसे बड़ी वजह मजहबी विस्तारवाद है और ये दोनों सगर्व कह सकते हैं कि वो इस गंदे खेल में कभी भी नहीं रहे।
हिन्दुओं को और यहूदियों को जोड़ने वाला योजक बिंदु यही है, इनमें जो एकता दिखती है उसके मूल में हमारे स्वभावों की यही साम्यता है।
✍️ Abhijeet Singh
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