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दलित समाज से आने वाले देश के अगले CJI जस्टिस बी.आर. गवई ने SC ST आरक्षण में उपवर्गीकरण का फैसला करते हुए क्या कहा जानने के लिए पढ़ें पूरी खबर
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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सुप्रीम कोर्ट द्वारा SC/ST के उपवर्गीकरण का आदेश दिए जाने के फैसले को अब 'न्यायपालिका में दलितों का प्रतिनिधित्व नहीं है' कह कर गलत ठहराया जा रहा है।
उन्हें बताइए कि जिन जस्टिस BR गवई ने ये फैसला सुनाया है, वो स्वयं दलित समाज से आते हैं और अगले वर्ष सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश (CJI) भी बनने वाले हैं।
जस्टिस गवई ने कहा, "अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के भीतर केवल एक वर्ग ही आरक्षण का लाभ उठा रहा है। इस जमीनी हकीकत से इनकार नहीं किया जा सकता कि SC/ST समुदायों के भीतर ऐसे वर्ग हैं जिनके उत्पीड़न किया जा रहा है। एक बड़ा वर्ग भेदभाव का सामना कर रहा है।"
कौन हैं ये भेदभाव करने वाले? कौन हैं ये उत्पीड़क? ये वही हैं, जो आज चाहते हैं कि SC/ST में जो अधिक गरीब हैं उन तक फायदे न पहुँचे और जो पैसे वाले बन गए हैं वही आरक्षण का लाभ उठाते रहें हमेशा।
भारत में OBC की 2600 जातियाँ हैं, लेकिन 95% सरकारी नौकरियों पर केवल 25% जातियों का ही कब्ज़ा है। और तो और, 2600 में से केवल 10 जातियाँ एक चौथाई सरकारी नौकरियाँ लेकर बैठी हुई हैं। बाकी का क्या?
इसीलिए, अब आवश्यक है कि OBC में भी ठोस उपवर्गीकरण किया जाए। इनमें जो पिछड़े हैं उनका शोषण किया जा रहा है। अयोध्या में सपा सांसद अवधेश पासी का खास मोईद खान अपने नौकर राजू खाँ के साथ मिल कर एक निषाद समाज की बच्ची का बार-बार सामूहिक बलात्कार करता है। बस, यही तो दिया है इनका हक़ मार कर खाने वाली जातियों ने। और हाँ, उसी मोईद खान के घर में यूपी पुलिस का थाना भी चलता था, अखिलेश यादव के मुख्यमंत्रित्व काल से ही।
अब समय आ गया है जब रोहिणी कमीशन की रिपोर्ट को लागू किया जाए। यूपी में रिटायर्ड जज राघवेंद्र कुमार के नेतृत्व में समिति का गठन किया था, उसमें सुझाव दिया गया कि OBC समाज को तीन हिस्सों में बाँटा जाए। यादव, कुर्मी और जाट को इसमें सबसे ऊपर रखने का सुझाव दिया गया था। अगर आप यूपी में देखेंगे तो इन तीन समूहों को शायद ही आरक्षण की आवश्यकता है। कभी अपने देखा है किसी को इन तीन समूहों के साथ भेदभाव करते हुए?
राजनाथ सिंह जब CM थे तब हुकुम सिंह आयोग बनाया गया था, जिसमें दलितों को जाटव और गैर-जाटव में विभाजित करने का सुझाव दिया गया था। सारे के सारे रिपोर्ट्स ठंडे बास्ते में चले जाते रहे।
दलित समाज में कोरी समाज से सरपंच , मुसहर समाज से सरपंच ,निषाद समाज से सरपंच ,मल्लाह समाज से सरपंच और दुसाध समाज समेत बहुसंख्यक दलित जातियों में कोई भी सरपंच नही बनता भले ही वह सीट "दलित" कोटे में आई हो ।
SC/ST में आरक्षण के लिए उपवर्गीकरण के निर्णय से सबसे अधिक राहत वाल्मीकि समाज ने ली है। दलितों में सबसे अधिक दयनीय स्थिति इसी समाज की है। इसका कारण यही है कि एकाध खास समूह इनका हक़ मार रहे थे।
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में मातादीन वाल्मीकि ने फाँसी के फंदे को गले लगाया। इसके 100 वर्ष बाद जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री बक्शी ग़ुलाम मुहम्मद ने पंजाब से वाल्मीकि समुदाय के लोगों को कश्मीर में बसाया, लेकिन अनुच्छेद-370 के कारण उन्हें एक तो वहाँ की स्थायी नागरिकता नहीं मिली, ऊपर से इस समाज में किसी बच्चे का जन्म होते ही उसके माथे पर 'सफाईकर्मी' लिख दिया जाता था।
खुद को दलितों का ठेकेदार बताने वाले कितने लोग आज वाल्मीकि समाज के लिए 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी' की बातें करते हैं? Valmiki समाज के लोग क्या सिर्फ सफाईकर्मी बनने के लिए पैदा हुए हैं? कोई भी जाटव ठेकेदार आपको इनके लिए आवाज़ उठाता हुआ नहीं दिखेगा। खासकर उत्तर प्रदेश, पंजाब और दिल्ली में तो इस समाज को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
ऐसे ही आदिवासी समाज में कोल समाज से सरपंच, भील समाज से सरपंच, बहेलिया समाज से सरपंच और बंजरा समाज समेत बहुसंख्यक आदिवासी जातियों में कोई भी सरपंच नही बनता भले ही सीट "आदिवासी " समाज के लिए आरक्षित हो ।
दलित और आदिवासी समाज की बहुसंख्यक जातियों से आज तक कोई भी सरकारी चपरासी तक नही बना है कलेक्टर,कमिश्नर, विधायक,मंत्री ,मुख्यमंत्री बनना तो इनके लिए सपने जैसा है।
दलित समाज के आरक्षण का लाभ सिर्फ 3 से 4 जातियों को अधिकतर मिलता है जैसे महाराष्ट्र में महार,राजस्थान में मेघवाल, उत्तरप्रदेश में जाटव और मध्यप्रदेश में चर्मकार । जाटव और चर्मकार समाज एक ही है और सबसे अधिक लाभ इन्हें ही मिलता है।
ऐसे ही आदिवासी समाज के आरक्षण का सबसे अधिक लाभ मीणा समुदाय को मिलता है। कोई भी सरकारी नोकरी हो उसमें आदिवासी कोटे से 90 प्रतिसत से ज्यादा सीट मीणा ले जाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने दलितों और आदिवासियों में उपवर्ग बनाने का आदेश देकर बहुसंख्यक दलित और आदिवासी जातियों के लिए दरवाजा खोल दिया है। ताकि सरकार दलित और आदिवासी कोटे के आरक्षण का अधिक लाभ इन वंचित जातियों को दे, ताकि दलित और आदिवासी कोटे की सीट इन वंचित जातियों को मिले ताकि यह सरपंच, विधायक आदि बन सकें ।
इस फैसले का विरोध वही कर रहा है जिसका समाज सबसे अधिक लाभ ले रहा है ।
जस्टिस मिश्रा ने साफ साफ कहा है कि दलित और आदिवासी आरक्षण का लाभ किसी एक जाति को 100 प्रतिसत न मिले और जो दलितों और आदिवासियों में वंचित जातियाँ हैं उन्हें आरक्षण से लेकर सरकारी सुविधा का अधिक लाभ दिया जाए।
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