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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
क्या योगी आदित्यनाथ जी उतर प्रदेश को अगले ढाई वर्ष में हिन्दुत्त्व ,विकास ,गरीब कल्याण के स्वर्णिम मॉडल के रूप मे दुनिया के सामने प्रस्तुत कर पाएंगे ?
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
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उत्तर प्रदेश मे योगी आदित्यनाथ जी ऐतिहासिक विजय के बाद कई सवाल उठ रहे हैं कि क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी उत्तर प्रदेश सर्व समावेशी विकास मॉडल के रूप में प्रस्तुत कर पाएंगे क्योंकि पहले कार्यकाल उन्हें जिम्मेदारी मिली उन्होंने उत्तर प्रदेश को बीमारू राज्य श्रेणी से निकलाकर विकास ओर अग्रसर किया उत्तर प्रदेश की जनता उनके कार्य सराह भी हैं उन्हें प्रचंड बहुमत भी दिया अब योगी आदित्यनाथ जी सामने कई चुनौतियां सामने खड़ी है उन चुनौतियों निपटनें का बाद योगी जी राष्ट्रीय नेता बन पाएंगे उत्तर प्रदेश 25 करोड़ आबादी वाला राज्य हैं उत्तर प्रदेश मे संभावना भी है फिर उत्तर प्रदेश जितना तेजी विकास करना चाहिए वो नहीं कर पाया उसका सबसे बड़ा कारण जातिवाद संप्रदाय बाद की राजनीति जिसके वजह उत्तर प्रदेश गुंडागर्दी माफिया वाद अवैध करोबार गढ़ के रूप में पहचाना जाने लगा था योगी जी आने के बाद नियंत्रण जरूर लगा फिर भी संपूर्ण नियंत्रण सख्त जरूरत है इसके लिए सरकार सख्त कदम उठाने होंगे उत्तर प्रदेश मे विकास गांव गरीब तक कैसे पहुंचे सरकार बहुत ध्यान देना होगा उत्तर प्रदेश जेहादी मानसिकता रखने वालों लोगों पर नियंत्रण भी करना होगा वो कैसे होगा उस पर विस्तार इस लेख पर बात करेंगे !
(1 )शिक्षा स्वास्थ्य सड़क आवास बिजली पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं गरीब तक कैसे पहुंचाया जाए वामपंथी विचारधारा को मानने हमेशा नारा लगाते हैं कि जब तक लोगो शिक्षा स्वास्थ्य आवास जैसी मूलभूत सुविधाएं गरीब को नहीं मिलती तो देश भला हो सकता है इसके लिए वामपंथी प्रोपेगैंडा भी फैलाते हैं कुछ करते हैं शिक्षा स्वास्थ्य आवास पानी जैसी मूलभूत सुविधा गरीब को कैसे मिले इस पर कभी ध्यान नहीं देते हैं इस देश नरेंद्र मोदी जी सरकार आने के बाद शिक्षा स्वास्थ्य शौचालय आवास और पानी जैसी मूलभूत सुविधा गरीब कैसे मिले इस पर काम भी सफलता पूर्वक लागू भी किया फिर सरकारी सिस्टम सड़े होने की वजह जितनी सफलता मिलना चाहिए वैसे नही मिल पाई अब योगी आदित्यनाथ जी के सामने जन आकांक्षाएं सामने खड़ी हुई है जिन्हें आवास मिल गया है उन्हें आगे बढ़ने अवसर चाहिए जिन्हे नहीं मिला उन्हें जल्द से जल्द चाहिए इसलिए सरकारी योजनाओं लागू करने तेजी करनी होगी अगले दो वर्ष उत्तर प्रदेश 100% गरीबों आवास जैसी मूलभूत सुविधा देनी होगी फिर घर मे नल पानी पहुंचाना होगा फिर उन गरीबों आगे बढ़ने अवसर देने के लिए काम करना होगा गरीबों आगे बढ़ने अवसर देने सबसे बड़ा रोल शिक्षा का होता है बिना शिक्षा राष्ट्र भला नहीं हो सकता है इसलिए शिक्षा क्षेत्र उत्तर प्रदेश में बड़े क्रांतिकारी सुधार करने होंगे गरीबों सस्ती शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए प्रयास करने होंगे उस पर मेरे कुछ सुझाव हैं हर गांव मे विश्वस्तरीय विद्यालय जिससे गरीब बच्चे विश्व स्तर की शिक्षा लाभ उठा सके उसके लिए सरकारी शिक्षकों ट्रेनिंग ध्यान देना होंगा नई शिक्षा नीति को अच्छे लागू करना होगा रोजगार परख शिक्षा पर काम करना होगा और हर विकासखंड मे महाविद्यालय होना जरूरी है हर जिले मेडिकल कालेज इंजीनियरिंग कालेज आईटीआई कालेज होना जरूरी है उच्च स्तर की शिक्षा के लिए IIT IIM AIIMS जैसे संस्थान संख्या बढ़ानी होगी कम से उत्तर प्रदेश इनकी संख्या 15 होनी चाहिए जिससे उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए उत्तर प्रदेश के युवाओं को बाहर नहीं जाना पड़े अब स्वास्थ्य सुविधाओं सुधार के लिए निम्नलिखित सुझाव उत्तर प्रदेश में मेडिकल सीट बढ़ाना जिससे अगले 5 साल डाक्टरो संख्या बढ़ाई जा सके हर गांव सुविधा युक्त अस्पताल होना चाहिए जिससे गांव के गरीब गांव मे स्वास्थ्य जैसी सुविधा मिल जाए हर जिले में विश्वस्तरीय अस्पताल होना चाहिए स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ाने के साथ आर्युवैदिक पद्धति पर शोध काम के लिए उत्तर प्रदेश शोध संस्थान की स्थापना करना चाहिए कम से कम ,उत्तर प्रदेश 10 आर्युवैदिक मेडिकल कॉलेज होने चाहिए जहां पर आर्युवेद पर पढ़ाई के साथ शोध भी होना चाहिए इसके अलावा आर्युवैदिक पद्धति कैसे बढ़ावा दिया जाए उसके लिए एक बोर्ड का गठन करना चाहिए स्वास्थ्य क्षेत्र मे योगी सरकार क्रांतिकारी बदलाव कर पाई तो उत्तर प्रदेश एक मॉडल स्टेट रूप प्रस्तुत हो जाएगा अब योगी सरकार सबसे बड़ी परीक्षा शुरू होती है कैसे अगले 5 साल मे शिक्षा स्वास्थ्य आवास पानी जैसी बेसिक मूलभूत सुविधाएं कैसे पहुंचाने का प्रयास करती है !
(2 )योगी सरकार बेरोजगारी समस्या निदान कैसे कर सकती हैं उतर प्रदेश के युवाओं संभावनाएं बहुत है उस युवा शक्ति उत्तर प्रदेश की योगी सरकार कैसे इस्तेमाल करती उससे तय होगा उत्तर प्रदेश भारत का ग्रोथ इंजन बना सकता है कि नहीं इसके लिए योगी सरकार को नीतिगत कठोर फैसले लेने होंगे युवाओं मानसिकता मे बदलाव लाना होगा स्वरोजगार के लिए प्रेरित करना होगा उतर प्रदेश युवाओं स्टार्टअप कल्चर लाना होगा साथ साथ उत्तर प्रदेश मे इंडस्ट्री और निवेश आए उसके लिए बड़े स्तर आर्थिक सुधार करने होंगे मेरे एक सुझाव योगी सरकार को हैं कृषि आधारित उद्योगों बढ़ावा देने के सुधार करना चाहिए जिससे 60% युवाओं उन्हें स्थानीय स्तर पर रोजगार मिल सके उत्तर प्रदेश नदियों का प्रदेश के रूप मे जाना जाता है यहां की बहुत बड़ी भूमि सिंचित हैं और उत्तर प्रदेश मे बड़े स्तर पशुपालन भी होता है उस के लिए सरकार को नीति बनानी चाहिए और उत्तर प्रदेश मे मस्य पालन डेयरी उद्योग मुर्गी पालन और बायोगैस उद्योग फूड प्रोसेसिंग उद्योग बहुत बड़ी संभावना है इस पर योगी सरकार काम करना चाहिए कृषि आधरित ग्रामीण अर्थव्यवस्था बढ़ावा देने के योगी सरकार प्रभावी नीति बनाना चाहिए इसके साथ योगी सरकार ने कुटीर उद्योगों बढ़ावा देने के लिए एक जिला एक उत्पाद योजना शुरू की थीं उस योजना विस्तृत करनी होगी उसके साथ इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं मे 25 लाख करोड़ का निवेश अगले 5 वर्ष मे करना होगा क्योंकि इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र सबसे अधिक रोजगार पैदा करता और बाजार मे निजी निवेश भी लाता हैं इसलिए उत्तर प्रदेश बड़े पैमाने इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट निवेश करने की आवश्यकता तभी उत्तर प्रदेश की बेरोजगारी समस्या संपूर्ण निदान हो पाएगा और उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था 1 ट्रिलियन डॉलर की बन पाएगी !
उतर प्रदेश मे योगी_युग-2.0 में आप क्या नया चाहेंगे.... मै 10 सुधार देखना चाहूंगा
1. जनता को बाबा अपना ऑनलाइन सिपाही बनाएं डायल 112 की ही तरह एक सीधा एप्प हो जिसपर लोग शिकायत नहीं सबूत दाखिल कर सकें.... वीडियो, फोटो या कोई और डॉक्यूमेंट..... इनकी जांच का अलग सिस्टम हो और सख्त त्वरित कार्यवाही हो....
सरकारी कर्मियों को कर्मठ बनाने में फायदा होगा इससे
2. पुलिस थाने, 112 की गाड़ियां पूरी तरह कैमरे की नज़र में हों.......
3. सरकारी विभागों को जिम्मेदारी ज्यादा व्यापक कर तय हो
4. VVIP ट्रीटमेंट बिल्कुल बंद हो....
5. सभी अवैध निर्माण फिर वो किसी का कोई बड़ा होटल हो, कोई मज़हबी स्थल, या कुछ भी और अभियान चला गिराए जाएं...
मुख्य सड़क से मोहल्ले की गली तक सब अतिक्रमण से मुक्त हो
6. अवैध हथियार सख्ती से खत्म किये जायें.... रखने वालों पर गैंगेस्टर एक्ट और रासुका जैसे कानूनों में कार्यवाही हो...... लाइसेंस प्रक्रिया को आसान कर .22 कैलिबर रिवॉल्वर, पिस्टल को उपलब्ध करवाया जाए
7. प्रदेश में जमीन अब तैयार है ऐसे में उद्योगीकरण की प्रक्रिया तेज की जाए...... अधिकतम रोजगार श्रजन हो
8. जन प्रतिनिधि अपने अपने जिलों में गांव-गांव घूम कर साप्ताहिक पंचायत करें ग्रामसभा स्तर पर लोगों से सीधे उनकी दिक्कतों को खुद जाकर समझें
9. सिंचाई पर मिशन मोड़ में काम कर हर खेत तक पानी सुनिश्चित किया जाए..... जल संरक्षण को इससे जोड़ा जाए
10. डिस्ट्रिक कैबिनेट का गठन हो..... यानी हर जिले में हर मंत्रालय का भाजपा संगठन का एक प्रतिनिधि हो जो सीधे उस मंत्री और विभाग से जुड़ा हो..... लोगों की लखनऊ तक सीधी पहुंच बन जाएगी वो भी विभागीय कर्मियों के नखरे झेले बगैर... !
(3 )सनातन पुनर्जागरण और जेहादियों शक्तियों नियंत्रण के लिए योगी सरकार को उत्तर प्रदेश में क्या करना होगा
उत्तर प्रदेश मे योगी सरकार आने के साथ सनातन धर्म के पुनः जागरण प्रक्रिया शुरू हुई वो अविश्वसनीय हैं उसे आगे ले जाने की जरूरत योगी सरकार को हैं उस पर मै ज्यादा विस्तार बात करेंगे लेख लम्बा हो जाएग सरकार इस पर काम कर रही इसलिए ज्यादा लिखने भी जरूरत नहीं है योगी सरकार कैसे गजवा ए हिंद सपना पाले हुए लोगों सपना कैसे तोड़ सकती हैं उस पर सरकार को मेरे कुछ सुझाव निम्नलिखित हैं 1 कठोर जनसंख्या नियंत्रण कानून 2 उत्तर प्रदेश मे समान नागरिक संहिता लागू करना 3 समान शिक्षा कानून इन तीनों कानून सरकार लागू कर पाई तो राष्ट्र क्रांतिकारी परिवर्तन आएगा इन तीनों कानून से जेहादी शक्तियों पर संपूर्ण नियंत्रण स्थापित किया जा सकता !
वर्तमान समय में लगभग 137 करोड़ भारतीयों के पास आधार है, लगभग 20% अर्थात 25 करोड़ नागरिक (विशेष रूप से बच्चे) बिना आधार के हैं तथा लगभग चार करोड़ बंगलादेशी और एक करोड़ रोहिंग्या घुसपैठिये अवैध रूप से भारत में रहते हैं. इससे स्पष्ट है कि हमारे देश की कुल जनसँख्या 130 करोड़ नहीं बल्कि लगभग 152 करोड़ है और हम चीन से बहुत आगे निकल चुके हैं. यदि संसाधनों की बात करें तो हमारे पास कृषि योग्य भूमि दुनिया की लगभग 2% है, पीने योग्य पानी लगभग 4% है, और जनसँख्या दुनिया की 20% है. यदि चीन से तुलना करें तो हमारा क्षेत्रफल चीन का लगभग एक तिहाई है और जनसँख्या वृद्धि की दर चीन की तीन गुना है. चीन में प्रति मिनट 11 बच्चे और भारत में प्रति मिनट 33 बच्चे पैदा होते हैं.
जल-जंगल और जमीन की समस्या, रोटी-कपड़ा और मकान की समस्या, गरीबी और बेरोजगारी की समस्या, भुखमरी और कुपोषण की समस्या तथा वायु प्रदूषण,जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण की समस्या का मूल कारण जनसँख्या विस्फोट है. टेम्पो-बस और रेल में भीड़, थाना-तहसील और जेल में भीड़ तथा हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में भीड़ का मूल कारण जनसँख्या विस्फोट है. चोरी-डकैती और झपटमारी, घरेलू हिंसा और महिलाओं पर शारीरिक-मानसिक अत्याचार तथा अलगाववाद कट्टरवाद और पत्थरबाजी का मूल कारण भी जनसँख्या विस्फोट है. चोर-लुटेरे, झपटमार, जहरखुरानी करने वालों, बलात्कारियों और भाड़े के हत्यारों पर सर्वे करने से पता चलता है कि 80% से अधिक अपराधी ऐसे हैं जिनके माँ-बाप ने "हम दो- हमारे दो" नियम का पालन नहीं किया. इन तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत की 50% से अधिक समस्याओं का मूल कारण जनसँख्या विस्फोट ही है.
अंतराष्ट्रीय रैंकिंग में भारत की दयनीय स्थिति का मुख्य कारण भी जनसँख्या विस्फोट है. ग्लोबल हंगर इंडेक्स में हम 103वें स्थान पर, साक्षरता दर में 168वें स्थान पर, वर्ल्ड हैपिनेस इंडेक्स में 133वें स्थान पर, ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में 130वें स्थान पर, सोशल प्रोग्रेस इंडेक्स में 53वें स्थान पर, यूथ डेवलपमेंट इंडेक्स में 134वें स्थान पर, होमलेस इंडेक्स में 8वें स्थान पर, लिंग असमानता में 76वें स्थान पर, न्यूनतम वेतन में 64वें स्थान पर, रोजगार दर में 42वें स्थान पर, क्वालिटी ऑफ़ लाइफ इंडेक्स में 43वें स्थान पर, फाइनेंसियल डेवलपमेंट इंडेक्स में 51वें स्थान पर, करप्शन परसेप्शन इंडेक्स में 78वें स्थान पर, रूल ऑफ़ लॉ इंडेक्स में 66वें स्थान पर, एनवायरनमेंट परफॉरमेंस इंडेक्स में 177वें स्थान पर तथा पर कैपिटा जीडीपी में 139वें स्थान पर हैं लेकिन जमीन से पानी निकालने के मामले में हम दुनिया में पहले स्थान पर हैं, जबकि हमारे पास कृषि योग्य भूमि दुनिया की 2 % तथा पीने योग्य पानी 4% है. प्रत्येक वर्ष हम लोग 2 दिसंबर को राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस मनाते हैं और प्रदूषण नियंत्रण को लेकर पिछले 5 साल में बहुत से प्रयास भी किये गये हैं लेकिन जनसँख्या विस्फोट के कारण वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण बढ़ता जा रहा है और इसका मूल कारण भी जनसँख्या विस्फोट है इसलिए चीन की तर्ज पर एक कठोर जनसँख्या नियंत्रण कानून के बिना स्वच्छ भारत और स्वस्थ भारत अभियान का 100% सफल होना मुश्किल है.
संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्देशानुसार हम लोग प्रत्येक वर्ष 25 नवंबर को महिला हिंसा उन्मूलन दिवस मनाते हैं लेकिन महिलाओं पर हिंसा बढ़ती जा रही है और इसका मुख्य कारण भी जनसँख्या विस्फोट है. बेटी पैदा होने के बाद महिलाओं पर शारीरिक और मानसिक अत्याचार किया जाता है, जबकि बेटी पैदा होगी या बेटा, यह महिला नहीं बल्कि पुरुष पर निर्भर करता है. कुछ लोग तो 3-4 बेटियां पैदा होने के बाद पहली पत्नी को छोड़ देते हैं और बेटे की चाह में दूसरा विवाह कर लेते हैं. बेटियों को बराबरी का दर्जा मिले, बेटियों का स्वास्थ्य ठीक रहे, बेटियां सम्मान सहित जिंदगी जीयें तथा बेटियां खूब पढ़ें और बेटियां भी आगे बढ़ें, इसके लिए चीन की तर्ज पर एक प्रभावी और कठोर जनसँख्या नियंत्रण कानून बनाना बहुत जरूरी है.
एक कठोर और प्रभावी जनसँख्या नियंत्रण कानून के बिना बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ अभियान तो सफल हो सकता है लेकिन विवाह के बाद बेटियों पर होने वाले अत्याचार को नहीं रोका जा सकता है. 3-4 बेटियां पैदा होने के बाद महिलाओं पर शारीरीक और मानसिक अत्याचार किया जाता है, जबकि बेटी पैदा होगी या बेटा, यह महिला नहीं बल्कि पुरुष पर निर्भर है. बहुत से लोग बेटे की चाह में बहुविवाह भी करते हैं, बेटे-बेटियों में गैर-बराबरी बंद हो, बेटे-बेटियों को बराबर सम्मान मिले, बेटियां पढ़ें, बेटियां आगे बढ़ें और बेटियां सुरक्षित रहे इसलिए जनसंख्या नियंत्रण कानून लाने की कृपा करें
(1 )जनसंख्या नियंत्रण कानून क्यों जरूरी है
वर्तमान समय में लगभग 135 करोड़ भारतीयों के पास आधार है,उत्तर प्रदेश मे 25 करोड़ हैं लगभग 20% अर्थात 25 करोड़ नागरिक (विशेष रूप से बच्चे) बिना आधार के हैं तथा लगभग चार करोड़ बंगलादेशी और एक करोड़ रोहिंग्या घुसपैठिये अवैध रूप से भारत में रहते हैं. इससे स्पष्ट है कि हमारे देश की कुल जनसँख्या 137 करोड़ नहीं बल्कि लगभग 152 करोड़ है और हम चीन से बहुत आगे निकल चुके हैं. यदि संसाधनों की बात करें तो हमारे पास कृषि योग्य भूमि दुनिया की लगभग 2% है, पीने योग्य पानी लगभग 4% है, और जनसँख्या दुनिया की 20% है. यदि चीन से तुलना करें तो हमारा क्षेत्रफल चीन का लगभग एक तिहाई है और जनसँख्या वृद्धि की दर चीन की तीन गुना है. चीन में प्रति मिनट 11 बच्चे और भारत में प्रति मिनट 33 बच्चे पैदा होते हैं.
जल-जंगल और जमीन की समस्या, रोटी-कपड़ा और मकान की समस्या, गरीबी और बेरोजगारी की समस्या, भुखमरी और कुपोषण की समस्या तथा वायु प्रदूषण,जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण की समस्या का मूल कारण जनसँख्या विस्फोट है. टेम्पो-बस और रेल में भीड़, थाना-तहसील और जेल में भीड़ तथा हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में भीड़ का मूल कारण जनसँख्या विस्फोट है. चोरी-डकैती और झपटमारी, घरेलू हिंसा और महिलाओं पर शारीरिक-मानसिक अत्याचार तथा अलगाववाद कट्टरवाद और पत्थरबाजी का मूल कारण भी जनसँख्या विस्फोट है. चोर-लुटेरे, झपटमार, जहरखुरानी करने वालों, बलात्कारियों और भाड़े के हत्यारों पर सर्वे करने से पता चलता है कि 80% से अधिक अपराधी ऐसे हैं जिनके माँ-बाप ने "हम दो- हमारे दो" नियम का पालन नहीं किया. इन तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत की 50% से अधिक समस्याओं का मूल कारण जनसँख्या विस्फोट ही है.
अंतराष्ट्रीय रैंकिंग में भारत की दयनीय स्थिति का मुख्य कारण भी जनसँख्या विस्फोट है. ग्लोबल हंगर इंडेक्स में हम 103वें स्थान पर, साक्षरता दर में 168वें स्थान पर, वर्ल्ड हैपिनेस इंडेक्स में 133वें स्थान पर, ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में 130वें स्थान पर, सोशल प्रोग्रेस इंडेक्स में 53वें स्थान पर, यूथ डेवलपमेंट इंडेक्स में 134वें स्थान पर, होमलेस इंडेक्स में 8वें स्थान पर, लिंग असमानता में 76वें स्थान पर, न्यूनतम वेतन में 64वें स्थान पर, रोजगार दर में 42वें स्थान पर, क्वालिटी ऑफ़ लाइफ इंडेक्स में 43वें स्थान पर, फाइनेंसियल डेवलपमेंट इंडेक्स में 51वें स्थान पर, करप्शन परसेप्शन इंडेक्स में 78वें स्थान पर, रूल ऑफ़ लॉ इंडेक्स में 66वें स्थान पर, एनवायरनमेंट परफॉरमेंस इंडेक्स में 177वें स्थान पर तथा पर कैपिटा जीडीपी में 139वें स्थान पर हैं लेकिन जमीन से पानी निकालने के मामले में हम दुनिया में पहले स्थान पर हैं, जबकि हमारे पास कृषि योग्य भूमि दुनिया की 2 % तथा पीने योग्य पानी 4% है. प्रत्येक वर्ष हम लोग 2 दिसंबर को राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस मनाते हैं और प्रदूषण नियंत्रण को लेकर पिछले 5 साल में बहुत से प्रयास भी किये गये हैं लेकिन जनसँख्या विस्फोट के कारण वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण बढ़ता जा रहा है और इसका मूल कारण भी जनसँख्या विस्फोट है इसलिए चीन की तर्ज पर एक कठोर जनसँख्या नियंत्रण कानून के बिना स्वच्छ भारत और स्वस्थ भारत अभियान का 100% सफल होना मुश्किल है.
संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्देशानुसार हम लोग प्रत्येक वर्ष 25 नवंबर को महिला हिंसा उन्मूलन दिवस मनाते हैं लेकिन महिलाओं पर हिंसा बढ़ती जा रही है और इसका मुख्य कारण भी जनसँख्या विस्फोट है. बेटी पैदा होने के बाद महिलाओं पर शारीरिक और मानसिक अत्याचार किया जाता है, जबकि बेटी पैदा होगी या बेटा, यह महिला नहीं बल्कि पुरुष पर निर्भर करता है. कुछ लोग तो 3-4 बेटियां पैदा होने के बाद पहली पत्नी को छोड़ देते हैं और बेटे की चाह में दूसरा विवाह कर लेते हैं. बेटियों को बराबरी का दर्जा मिले, बेटियों का स्वास्थ्य ठीक रहे, बेटियां सम्मान सहित जिंदगी जीयें तथा बेटियां खूब पढ़ें और बेटियां भी आगे बढ़ें, इसके लिए चीन की तर्ज पर एक प्रभावी और कठोर जनसँख्या नियंत्रण कानून बनाना बहुत जरूरी है.
एक कठोर और प्रभावी जनसँख्या नियंत्रण कानून के बिना बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ अभियान तो सफल हो सकता है लेकिन विवाह के बाद बेटियों पर होने वाले अत्याचार को नहीं रोका जा सकता है. 3-4 बेटियां पैदा होने के बाद महिलाओं पर शारीरीक और मानसिक अत्याचार किया जाता है, जबकि बेटी पैदा होगी या बेटा, यह महिला नहीं बल्कि पुरुष पर निर्भर है. बहुत से लोग बेटे की चाह में बहुविवाह भी करते हैं, बेटे-बेटियों में गैर-बराबरी बंद हो, बेटे-बेटियों को बराबर सम्मान मिले, बेटियां पढ़ें, बेटियां आगे बढ़ें और बेटियां सुरक्षित भी रहें, इसके लिए इसी संसद सत्र में जनसँख्या नियंत्रण कानून बनाना चाहिए.
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टैक्स देने वाले लोग हम दो-हमारे दो नियम का पालन करते हैं लेकिन मुफ्त में रोटी कपड़ा मकान लेने वाले जनसँख्या विस्फोट कर रहे हैं. हजारो साल पहले भगवान राम ने हम दो-हमारे दो नियम की शुरुआत किया था और आम जनता को संदेश देने के लिए लक्षमण, भरत और शत्रुघन सहित स्वयं "हम दो-हमारे दो" नियम का पालन किया था, जबकि उस समय जनसँख्या की समस्या इतनी खतरनाक नहीं थी. सभी राजनीतिक दल स्वीकार करते हैं कि जनसँख्या विस्फोट वर्तमान समय में बम विस्फोट से भी अधिक खतरनाक है. इसलिए चीन की तर्ज पर एक प्रभावी जनसँख्या नियंत्रण कानून लागू किये बिना रामराज्य अर्थात स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत, साक्षर भारत, संपन्न भारत, समृद्ध भारत, सबल भारत, सशक्त भारत, सुरक्षित भारत, समावेशी भारत, स्वावलंबी भारत, स्वाभिमानी भारत, संवेदनशील भारत तथा भ्रष्टाचार और अपराध-मुक्त भारत का निर्माण मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है.
उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए ही अटल जी द्वारा बनाये गए 11 सदस्यीय संविधान समीक्षा आयोग (वेंकटचलैया आयोग) ने 2 वर्ष तक अथक परिश्रम और विस्तृत विचार-विमर्श के बाद संविधान में आर्टिकल 47A जोड़ने और जनसँख्या नियंत्रण कानून बनाने का सुझाव दिया था जिसे आजतक लागू नहीं किया गया. अब तक 125 बार संविधान में संशोधन हो चुका है, 3 बार सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी बदला जा चुका है, सैकड़ों नए कानून बनाये गए लेकिन देश के लिए सबसे ज्यादा जरुरी जनसँख्या नियंत्रण कानून नहीं बनाया गया, जबकि "हम दो - हमारे दो" कानून से देश की 50% समस्याओं का समाधान हो जाएगा.
अटल जी द्वारा 20 फरवरी 2000 को बनाया गया संविधान समीक्षा आयोग भारत का सबसे प्रतिष्ठित आयोग है. सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस वेंकटचलैया इसके अध्यक्ष तथा जस्टिस सरकारिया, जस्टिस जीवन रेड्डी और जस्टिस पुन्नैया इसके सदस्य थे. भारत के पूर्व अटॉर्नी जनरल और संविधान विशेषज्ञ केशव परासरन तथा सोली सोराब जी और लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप इसके सदस्य थे. पूर्व लोकसभा अध्यक्ष संगमा जी इसके सदस्य थे. सांसद सुमित्रा जी भी इस आयोग की सदस्य थी. वरिष्ठ पत्रकार सीआर ईरानी और अमेरिका में भारत के राजदूत रहे वरिष्ट नौकरशाह आबिद हुसैन भी इस आयोग के सदस्य थे.
वेंकटचलैया आयोग ने 2 वर्ष तक कड़ी मेहनत और सभी सम्बंधित पक्षों से विस्तृत विचार-विमर्श के बाद 31 मार्च 2002 को अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी था. इसी आयोग की शिफारिस पर मनरेगा, राईट टू एजुकेशन, राईट टू इनफार्मेशन और राईट टू फूड जैसे महत्वपूर्ण कानून बनाये गए लेकिन जनसँख्या नियंत्रण कानून पर संसद में चर्चा भी नहीं हुयी. इस आयोग ने मौलिक कर्तव्यों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए भी महत्वपूर्ण सुझाव दिया था जिसे आजतक लागू नहीं किया गया. वेंकटचलैया आयोग द्वारा चुनाव सुधार प्रशासनिक सुधार और न्यायिक सुधार के लिए दिए गए सुझाव भी आजतक पेंडिंग हैं.
यदि 2004 में भाजपा की सरकार बनती तो अटल जी द्वारा बनाये गए संविधान समीक्षा आयोग की शिफारिसों पर संसद में जरुर बहस होती और जनसँख्या नियंत्रण कानून भी बनाया जाता लेकिन भाजपा हार गयी और वोटबैंक राजनीति के कारण कांग्रेस ने वेंकटचलैया आयोग के सभी सुझावों पर संसद में चर्चा करने की बजाय चुनिंदा लोकलुभावन सुझावों को ही लागू किया, इसलिए युग दृष्टा अटल जी और करोड़ों भारतीयों की भावनाओं का सम्मान करते हुए संविधान समीक्षा आयोग के सुझावों को संसद के पटल पर रखना चाहिए और आयोग के सभी सुझावों पर विशेषरूप से चुनाव सुधार, न्यायिक सुधार, प्रशासनिक सुधार और जनसँख्या नियंत्रण कानून पर विस्तृत चर्चा करना चाहिए.
लगभग सभी राजनीतिक दलों के नेता सांसद और विधायक, बुद्धिजीवी, समाजशास्त्री, पर्यावारणविद, शिक्षाविद, न्यायविद, विचारक और पत्रकार इस बात से सहमत हैं कि देश की 50% से ज्यादा समस्याओं का मूल कारण जनसँख्या विस्फोट है. जब तक 2 करोड़ बेघरों को घर दिया जायेगा तब तक 10 करोड़ बेघर और पैदा हो जायेंगे इसलिए एक नया कानून ड्राफ्ट करने में समय खराब करने की बजाय चीन के जनसँख्या नियंत्रण कानून में ही आवश्यक संशोधन कर उसे लोकसभा में पेश करना चाहिए. कानून मजबूत और प्रभावी होना चाहिये और जो व्यक्ति इस कानून का उल्लंघन करे उसका राशन कार्ड, वोटर कार्ड, आधार कार्ड, बैंक खाता, बिजली कनेक्शन और मोबाइल कनेक्शन बंद करना चाहिए. इसके साथ ही कानून तोड़ने वालों पर सरकारी नौकरी और चुनाव लड़ने तथा पार्टी पदाधिकारी बनने पर आजीवन प्रतिबंध लगाना चाहिए. ऐसे लोगों को सरकारी स्कूल हॉस्पिटल सहित अन्य सरकारी सुविधाओं से वंचित करना चाहिये और 10 साल के लिए जेल भेजना चाहिए.
युग दृष्टा अटल जी के अधूरे सपने को साकार करना ही उन्हें सबसे अच्छी श्रद्धांजलि होगी इसलिए उनके द्वारा बनाये गए वेंकटचलैया आयोग के सुझावों पर विस्तृत चर्चा करना चाहिए. एक प्रभावी जनसँख्या नियंत्रण कानून के बिना रामराज्य नामुमकिन है, इसलिए मंत्रालय को इसी संसद सत्र में संविधान संशोधन करने और जनसँख्या नियंत्रण कानून बनाने के लिए बिल पेश करना चाहिए. 11 सदस्यीय वेंकटचलैया आयोग (4 जज, 3 संविधान विशेषज्ञ, 2 सांसद, 1 पत्रकार और 1 नौकरशाह) ने 2 साल विस्तृत विचार-विमर्श करने के बाद संविधान संशोधन करने और जनसँख्या नियंत्रण कानून बनाने का सुझाव दिया था इससे स्पष्ट है कि यह कानून किसी भी अंतराष्ट्रीय संधि या मानवाधिकार के खिलाफ नहीं है. वेंकटचलैया आयोग के सुझाव को लागू करने की मांग वाली जनहित याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से 29 मई को जबाब मांगा है इससे भी स्पष्ट है कि जनसंख्या नियंत्रण कानून किसी भी मौलिक अधिकार का उल्लघंन नहीं करता है. समान नागरिक संहिता क्यों जरूरी है
मुस्लिम पर्सनल लॉ में बहु-विवाह करने की छूट है लेकिन अन्य धर्मो में 'एक पति-एक पत्नी' का नियम बहुत कड़ाई से लागू है. बाझपन या नपुंसकता जैसा उचित कारण होने पर भी हिंदू ईसाई पारसी के लिए दूसरा विवाह अपराध है और IPC की धारा 494 में 7 वर्ष की सजा का प्रावधान है, इसीलिए कई लोग दूसरा विवाह करने के लिए मुस्लिम धर्म अपना लेते हैं. भारत जैसे सेक्युलर देश में चार निकाह जायज है जबकि इस्लामिक देश पाकिस्तान में पहली बीवी की इजाजत के बिना शौहर दूसरा निकाह नहीं कर सकता हैं. 'एक पति - एक पत्नी' किसी भी प्रकार से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं है बल्कि "सिविल राइट, ह्यूमन राइट और राइट टू डिग्निटी" का मामला है, इसलिए यह जेंडर न्यूट्रल और रिलिजन न्यूट्रल होना चाहिए.2. विवाह की न्यूनतम उम्र सबके लिए समान नहीं है. मुस्लिम लड़कियों की वयस्कता की उम्र निर्धारित नहीं है और माहवारी शुरू होने पर लड़की को निकाह योग्य मान लिया जाता है, इसलिए 9 वर्ष की उम्र में लड़कियों का निकाह कर दिया जाता है जबकि अन्य धर्मो मे लड़कियों की विवाह की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष और लड़कों की विवाह की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष है. विश्व स्वास्थ्य संगठन कई बार कह चुका कि 20 वर्ष से पहले लड़की शारीरिक और मानसिक रूप से परिपक्व नहीं होती है और 20 वर्ष से पहले गर्भधारण करना जच्चा-बच्चा दोनों के लिए अत्यधिक हानिकारक है, लड़का हो या लड़की, 21 वर्ष से पहले दोनों ही मानसिक रूप से परिपक्व नहीं होते हैं, 21 वर्ष से पहले तो बच्चे ग्रेजुएशन भी नहीं कर पाते हैं और 21 वर्ष से पहले बच्चे आर्थिक रूप से भी आत्मनिर्भर भी नहीं होते हैं इसलिए विवाह की न्यूनतम उम्र सबके लिए एक समान 21 वर्ष करना नितांत आवश्यक है. 'विवाह की न्यूनतम उम्र' किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं है बल्कि सिविल राइट और ह्यूमन राइट का मामला है इसलिए यह भी जेंडर न्यूट्रल और रिलिजन न्यूट्रल होना चाहिए.
3. तीन तलाक अवैध घोषित होने के बावजूद अन्य प्रकार के मौखिक तलाक (तलाक-ए-हसन एवं तलाक-ए-अहसन) आज भी मान्य है और इसमें भी तलाक का आधार बताने की बाध्यता नहीं है और केवल 3 महीने प्रतीक्षा करना है जबकि अन्य धर्मों में केवल न्यायालय के माध्यम से ही विवाह-विच्छेद हो सकता है. हिंदू ईसाई पारसी दंपति आपसी सहमति से भी मौखिक विवाह-विच्छेद की सुविधा से वंचित है. मुसलमानों में प्रचलित तलाक का न्यायपालिका के प्रति जवाबदेही नहीं होने के कारण मुस्लिम बेटियों को हमेशा भय के वातावरण में रहना पड़ता है. तुर्की जैसे मुस्लिम बाहुल्य देश में भी किसी तरह का मौखिक तलाक मान्य नहीं है इसलिए तलाक का आधार भी जेंडर न्यूट्रल रिलिजन न्यूट्रल और सबके लिए यूनिफार्म होना चाहिए.
4. मुस्लिम कानून में मौखिक वसीयत एवं दान मान्य है लेकिन अन्य धर्मों में केवल पंजीकृत वसीयत एवं दान ही मान्य है. मुस्लिम कानून मे एक-तिहाई से अधिक संपत्ति का वसीयत नहीं किया जा सकता है जबकि अन्य धर्मों में शत-प्रतिशत संपत्ति का वसीयत किया जा सकता है. वसीयत और दान किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं है बल्कि सिविल राइट और ह्यूमन राइट का मामला है इसलिए यह भी जेंडर न्यूट्रल रिलिजन न्यूट्रल और सबके लिए यूनिफार्म होना चाहिए.
5. मुस्लिम कानून में 'उत्तराधिकार' की व्यवस्था अत्यधिक जटिल है, पैतृक संपत्ति में पुत्र एवं पुत्रियों के मध्य अत्यधिक भेदभाव है, अन्य धर्मों में भी विवाहोपरान्त अर्जित संपत्ति में पत्नी के अधिकार अपरिभाषित हैं और उत्तराधिकार के कानून बहुत जटिल है, विवाह के बाद पुत्रियों के पैतृक संपत्ति में अधिकार सुरक्षित रखने की व्यवस्था नहीं है और विवाहोपरान्त अर्जित संपत्ति में पत्नी के अधिकार अपरिभाषित हैं. 'उत्तराधिकार' किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं है बल्कि सिविल राइट और ह्यूमन राइट का मामला है इसलिए यह भी जेंडर न्यूट्रल रिलिजन न्यूट्रल और सबके लिए यूनिफार्म होना चाहिए.
6. विवाह विच्छेद (तलाक) का आधार भी सबके लिए एक समान नहीं है. व्याभिचार के आधार पर मुस्लिम अपनी बीबी को तलाक दे सकता है लेकिन बीवी अपने शौहर को तलाक नहीं दे सकती है. हिंदू पारसी और ईसाई धर्म में तो व्याभिचार तलाक का ग्राउंड ही नहीं है. कोढ़ जैसी लाइलाज बीमारी के आधार पर हिंदू और ईसाई धर्म में तलाक हो सकता है लेकिन पारसी और मुस्लिम धर्म में नहीं. कम उम्र में विवाह के आधार पर हिंदू धर्म में विवाह विच्छेद हो सकता है लेकिन पारसी ईसाई मुस्लिम में यह संभव नहीं है. 'विवाह विच्छेद' किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं है बल्कि सिविल राइट और ह्यूमन राइट का मामला है इसलिए यह भी पूर्णतः जेंडर न्यूट्रल रिलिजन न्यूट्रल और सबके लिए यूनिफार्म होना चाहिए.
7. गोद लेने और भरण-पोषण करने का नियम भी हिंदू मुस्लिम पारसी ईसाई के लिए अलग-अलग हैं. मुस्लिम महिला गोद नहीं ले सकती है और अन्य धर्मों में भी पुरुष प्रधानता के साथ गोद लेने की व्यवस्था लागू है. 'गोद लेने का अधिकार' किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं है बल्कि सिविल राइट और ह्यूमन राइट का मामला है इसलिए यह भी पूर्णतः जेंडर न्यूट्रल रिलिजन न्यूट्रल और सबके लिए यूनिफार्म होना चाहिए.
8. विवाह-विच्छेद के बाद हिंदू बेटियों को तो गुजारा-भत्ता मिलता है लेकिन तलाक के बाद मुस्लिम बेटियों को गुजारा भत्ता नहीं मिलता है. गुजारा-भत्ता किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं है बल्कि सिविल राइट और ह्यूमन राइट का मामला है इसलिए यह भी पूर्णतः जेंडर न्यूट्रल रिलिजन न्यूट्रल और सबके लिए यूनिफार्म होना चाहिए. "भारतीय दंड संहिता" की तर्ज पर सभी नागरिकों के लिए एक समग्र समावेशी और एकीकृत "भारतीय नागरिक संहिता" लागू होने से विवाह विच्छेद के बाद सभी बहन बेटियों को गुजारा भत्ता मिलेगा, चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान, पारसी हो या ईसाई और धर्म जाति क्षेत्र लिंग आधारित विसंगति समाप्त होगी.
9. पैतृक संपत्ति में पुत्र-पुत्री तथा बेटा-बहू को समान अधिकार प्राप्त नहीं है और धर्म क्षेत्र और लिंग आधारित विसंगतियां है। विरासत और संपत्ति का अधिकार किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं बल्कि सिविल राइट और ह्यूमन राइट का मामला है इसलिए यह भी पूर्णतः जेंडर न्यूट्रल रिलिजन न्यूट्रल और सबके लिए यूनिफार्म होना चाहिए. "भारतीय दंड संहिता" की तर्ज पर सभी नागरिकों के लिए एक समग्र समावेशी और एकीकृत "भारतीय नागरिक संहिता" लागू होने से धर्म क्षेत्र लिंग आधारित विसंगतियां समाप्त होगी और विरासत तथा संपत्ति का अधिकार सबके लिए एक समान होगा चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान, पारसी हो या ईसाई .
10. पर्सनल लॉ लागू होने के कारण विवाह-विच्छेद की स्थिति में विवाहोपरांत अर्जित संपत्ति में पति-पत्नी को समान अधिकार नहीं है जबकि यह किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं बल्कि सिविल राइट और ह्यूमन राइट का मामला है इसलिए यह भी पूर्णतः जेंडर न्यूट्रल रिलिजन न्यूट्रल और सबके लिए यूनिफार्म होना चाहिए. "भारतीय दंड संहिता" की तर्ज पर सभी नागरिकों के लिए एक समग्र समावेशी और एकीकृत "भारतीय नागरिक संहिता" लागू होने से धर्म क्षेत्र लिंग आधारित विसंगतियां समाप्त होगी और विवाहोपरांत अर्जित संपत्ति का अधिकार सबके लिए एक समान होगा चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान, पारसी हो या ईसाई .
11. अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ लागू होने के कारण मुकदमों की सुनवाई में अत्यधिक समय लगता है. भारतीय दंड संहिता की तरह सभी नागरिकों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक समग्र समावेशी एवं एकीकृत भारतीय नागरिक संहिता लागू होने से न्यायालय का बहुमूल्य समय बचेगा.
12. अलग-अलग संप्रदाय के लिए लागू अलग-अलग ब्रिटिश कानूनों से नागरिकों के मन में हीन भावना व्याप्त है. भारतीय दंड संहिता की तर्ज पर देश के सभी नागरिकों के लिए एक समग्र समावेशी और एकीकृत "भारतीय नागरिक संहिता" लागू होने से समाज को सैकड़ों जटिल, बेकार और पुराने कानूनों ही नहीं बल्कि हीन भावना से भी मुक्ति मिलेगी.
13. अलग-अलग पर्सनल लॉ लागू होने के कारण अलगाववादी मानसिकता बढ़ रही है और हम एक अखण्ड राष्ट्र के निर्माण की दिशा में त्वरित गति से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं.भारतीय दंड संहिता की तरह सभी नागरिकों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक समग्र समावेशी एवं एकीकृत भारतीय नागरिक संहिता लागू एक भारत श्रेष्ठ भारत का सपना साकार होगा.
14. हिंदू मैरिज एक्ट में तो महिला-पुरुष को लगभग एक समान अधिकार प्राप्त है लेकिन मुस्लिम और पारसी पर्सनल लॉ में बेटियों के अधिकारों में अत्यधिक भेदभाव है. भारतीय दंड संहिता की तरह सभी नागरिकों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक समग्र समावेशी एवं एकीकृत भारतीय नागरिक संहिता का सबसे ज्यादा फायदा मुस्लिम और पारसी बेटियों को मिलेगा क्योंकि उन्हें पुरुषों के बराबर नहीं माना जाता है.
15. अलग-अलग पर्सनल लॉ के कारण रूढ़िवाद कट्टरवाद सम्प्रदायवाद क्षेत्रवाद भाषावाद बढ़ रहा है. देश के सभी नागरिकों के लिए एक समग्र और एकीकृत "भारतीय नागरिक संहिता" लागू होने से रूढ़िवाद कट्टरवाद सम्प्रदायवाद क्षेत्रवाद भाषावाद ही समाप्त नहीं होगा बल्कि वैज्ञानिक और तार्किक सोच भी विकसित होगी.
आर्टिकल 14 के अनुसार देश के सभी नागरिक एक समान हैं, आर्टिकल 15 जाति धर्म भाषा क्षेत्र और जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है, आर्टिकल 16 सबको समान अवसर उपलब्ध कराता है, आर्टिकल 19 देश मे कहीं पर भी जाकर पढ़ने रहने बसने रोजगार करने का अधिकार देता और आर्टिकल 21 सबको सम्मान पूर्वक जीवन जीने का अधिकार देता है. आर्टिकल 25 धर्म पालन का अधिकार देता है अधर्म का नहीं, रीतियों को पालन करने का अधिकार देता है कुरीतियों का नहीं, प्रथाओं को पालन करने का अधिकार देता है कुप्रथाओं का नहीं. देश के सभी नागरिकों के लिए एक समग्र समावेशी और एकीकृत "भारतीय नागरिक संहिता" लागू होने से आर्टिकल 25 के अंतर्गत प्राप्त मूलभूत धार्मिक अधिकार जैसे पूजा, नमाज या प्रार्थना करने, व्रत या रोजा रखने तथा मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा का प्रबंधन करने या धार्मिक स्कूल खोलने, धार्मिक शिक्षा का प्रचार प्रसार करने या विवाह-निकाह की कोई भी पद्धति अपनाने या मृत्यु पश्चात अंतिम संस्कार के लिए कोई भी तरीका अपनाने में किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं होगा.
विवाह की न्यूनतम उम्र, विवाह विच्छेद (तलाक) का आधार, गुजारा भत्ता, गोद लेने का नियम, विरासत का नियम और संपत्ति का अधिकार सहित उपरोक्त सभी विषय सिविल राइट और ह्यूमन राइट से सम्बन्धित हैं जिनका न तो मजहब से किसी तरह का संबंध है और न तो इन्हें धार्मिक या मजहबी व्यवहार कहा जा सकता है लेकिन आजादी के 75 साल बाद भी धर्म या मजहब के नाम पर महिला-पुरुष में भेदभाव जारी है. हमारे संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 44 के माध्यम से 'समान नागरिक संहिता' की कल्पना किया था ताकि सबको समान अधिकार और समान अवसर मिले और देश की एकता अखंडता मजबूत हो लेकिन वोट बैंक राजनीति के कारण 'समान नागरिक संहिता या भारतीय नागरिक संहिता' का एक ड्राफ्ट भी नहीं बनाया गया. जिस दिन 'भारतीय नागरिक संहिता' का एक ड्राफ्ट बनाकर सार्वजनिक कर दिया जाएगा और आम जनता विशेषकर बहन बेटियों को इसके लाभ के बारे में पता चल जाएगा, उस दिन कोई भी इसका विरोध नहीं करेगा. सच तो यह है कि जो लोग समान नागरिक संहिता के बारे में कुछ नहीं जानते हैं वे ही इसका विरोध कर रहे हैं.
आर्टिकल 37 में स्पष्ट रूप से लिखा है कि नीति निर्देशक सिद्धांतों को लागू करना सरकार की फंडामेंटल ड्यूटी है. जिस प्रकार संविधान का पालन करना सभी नागरिकों की फंडामेंटल ड्यूटी है उसी प्रकार संविधान को शत प्रतिशत लागू करना सरकार की फंडामेंटल ड्यूटी है. किसी भी सेक्युलर देश में धार्मिक आधार पर अलग-अलग कानून नहीं होता है लेकिन हमारे यहाँ आज भी हिंदू मैरिज एक्ट, पारसी मैरिज एक्ट और ईसाई मैरिज एक्ट लागू है, जब तक भारतीय नागरिक संहिता लागू नहीं होगी तब तक भारत को सेक्युलर कहना सेक्युलर शब्द को गाली देना है. यदि गोवा के सभी नागरिकों के लिए एक 'समान नागरिक संहिता' लागू हो सकती है तो देश के सभी नागरिकों के लिए एक 'भारतीय नागरिक संहिता' क्यों नहीं लागू हो सकती है
जाति-धर्म, भाषा-क्षेत्र और लिंग आधारित अलग-अलग कानून 1947 के विभाजन की बुझ चुकी आग में सुलगते हुए धुएं की तरह हैं जो विस्फोटक होकर देश की एकता को कभी भी खण्डित कर सकते हैं इसलिए इन्हें समाप्त कर एक 'भारतीय नागरिक संहिता' लागू करना न केवल धर्मनिरपेक्षता को बनाए रखने के लिए बल्कि देश की एकता-अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए भी अति आवश्यक है. दुर्भाग्य से 'भारतीय नागरिक संहिता' को हमेशा तुष्टीकरण के चश्मे से देखा जाता रहा है. जब तक भारतीय नागरिक संहिता का ड्राफ्ट प्रकाशित नहीं होगा तब तक केवल हवा में ही चर्चा होगी और समान नागरिक संहिता के बारे में सब लोग अपने अपने तरीके से व्याख्या करेंगे और भ्रम फैलाएंगे इसलिए विकसित देशों में लागू "समान नागरिक संहिता" और गोवा में लागू "गोवा नागरिक संहिता" का अध्ययन करने और "भारतीय नागरिक संहिता" का ड्राफ्ट बनाने के लिए तत्काल एक ज्यूडिशियल कमीशन या कमेटी बनाना चाहिए
समान शिक्षा कानून क्यों जरूरी है
उत्तर प्रदेश समेत पूरे देश मे हिंदू के लिए अलग शिक्षा बोर्ड मुस्लिमो के लिए अलग मदरसा बोर्ड जिसके कारण भारत इस्लामिक जेहाद बढ़ रहा हैं इसलिए सबके लिए समान शिक्षा कानून चाहिए जैसे असम मे अभी बना है इस कानून से मजहबी शिक्षा लगाम लगेगी और सभी को गुणवत्ता युक्त शिक्षा उपलब्ध होगी
योगी सरकार हिन्दुत्व + विकास +गरीब कल्याण मॉडल के रूप में उत्तर प्रदेश को प्रस्तुत कर पाई तो भारत का भविष्य सुरक्षित हो जाएगा भारत अगले 30 वर्ष दुनिया विश्व महाशक्ति बनने ओर अग्रसर होगा मेरी हार्दिक इच्छा हैं योगी सरकार इस जनादेश का सद उपयोग करते हुए उत्तर प्रदेश को दुनिया के सामने एक मॉडल राज्य के रूप में प्रस्तुत करेगी
दीपक कुमार द्विवेदी
संपर्क सूत्र 7974814641.
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