सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

भेड़ियों की माने तो, जो राक्षस करें वह निश्चय ही गलत है, परन्तु अगर मनुष्य होकर राक्षसों का संहार करने को उद्यत आप हो गए

"भेड़ियों की माने तो, जो राक्षस करें वह निश्चय ही गलत है, परन्तु अगर मनुष्य होकर राक्षसों का संहार करने को उद्यत आप हो गए, तब आप ही गलत हैं। क्योंकि राक्षसों का बोध शून्य था, इसलिए उनके आचरण का जस्टिफिकेशन बनता है, परन्तु क्या आप भी उसी निर्दयता और बोधशुन्यता का आलम्बन लेकर जिस दण्ड नीति का आलम्बन लेते हैं, क्या वह यथार्थ है?"
                 यह आइडियोलॉजी भारतीय जनमानस के वामपंथी धड़े में तब से सुनाई पड़ने लगी है, जब "हिन्दू जनमानस धीरे-धीरे प्रतिक्रियावादी बनना आरम्भ किया ही है, अभी उसकी प्रतिक्रिया धरातल पर मात्र आवाज ही बनी हैं, यथार्थ में परिणत नहीं हुई।
और यह वामपंथी तथाकथित बुद्धिजीवी धड़ा हिन्दुओं को अपराधबोध से ग्रसित करने के अपने #छद्म एजेण्डे में एकबार फिर से संलग्न कर लिया है।

व्यक्ति और सत्ता मनुष्य की वैचारिकी का तब प्रतिनिधित्व करते हैं, जब व्यक्ति अवाम की बहुचर्चित आवाज बन जाता है, और वह बहुचर्चित आवाज ही सत्ता।
ऐसी स्थिति में व्यक्ति जो #प्रतिनिधित्व करता है, उसे एकाकी घोषित करके, उसे अलग-थलग करके समूचे राष्ट्र को नष्ट नहीं किया जा सकता।
क्योंकि राष्ट्र की परिभाषा, #जन और #संस्कृति से आबद्ध होती है, न कि पाश्चात्य विद्वानों के मत अनुकूल भौतिक रेखाओ का समुच्चय ही राष्ट्र का प्रतीक समझा गया है।

राफा में जो हो रहा, जो गाजा पट्टी में देखा जा रहा, उसे यह कहकर एकतरफा अपराधबोध की श्रेणी में नहीं डाला जा सकता कि, 
आम जनमानस का उस बमबारी में विनाश हो रहा, जिनका इस लड़ाई से कोई सम्बन्ध ही नहीं। या कम से कम मरने वालों में ऐसे अवश्य होंगे, जो इजरायल और फिलिस्तीन के टू नेशन थ्योरी को सम्मान देते होंगे।
निश्चय ही ऐसे अनेक होंगे, और होने भी चाहिए। क्योंकि यह एक प्रकृति प्रदत्त नियमन प्रणाली ही है कि, एक सम विचारधारा का कोई अस्तित्व संभव ही नहीं, अगर फिलिस्तीन में टू नेशन थ्योरी को मान्यता देने वाले न होंगे तो इजरायल और फिलिस्तीन की लड़ाई का कोई अस्तित्व होता ही नहीं।

क्योंकि मानवीय विकास क्रम और बुद्धिजीविता इस विषय का प्रमाण करती है कि, 
"मनुष्य की आक्रामकता की परिणति अपने शत्रुओं में अपनी श्रेष्ठता का ख्यापन करने के लिए नहीं, बल्कि अपने लोगों के मत वैभिन्य सिद्धान्त को मिथक सिद्ध करने के लिए ही जानी जाती है।"
अगर लिबरल म्लेच्छ वन्दना बन्द कर दें, तो दूसरे ही दिवस से हिंदुओ की प्रतिक्रिया जनित विचारणा भी स्वतः ही तठस्थ हो जाएगी। क्योंकि हिंदुओं की प्रतिक्रियावादी प्रकृति के सृजक यथार्थ में हमारे #वामपंथी विचारक ही हैं, जो म्लेच्छों की चरण वंदना से हिंदुओं के भीतर नित्य हीनता बोध की स्थापना करते रहते हैं।
इसलिए प्रतिक्रिया स्वरूप हिन्दू भी प्रतिक्रियावादी बन जाता है, वह म्लेच्छों में अपनी स्थिति को स्थापित करने के लिए नहीं, वल्कि इन धूर्त और चाटुकार वामपंथी विचारकों द्वारा सृजित उस विचारणा को ध्वस्त करने के लिए की,
"देख, हम भी दैन्यता को प्राप्त नहीं, प्रतिक्रिया देना हम भी जानते हैं" 

अगर गाजा पट्टी के टू नेशन थ्योरी वाले विचारक और यहूद नेस्तनाबूद देखने की अभिलाषी कौम दोनो तठस्थ होते, या कम से कम टू नेशन थ्योरी वाले तथाकथित #मानवतावादी ही मौन होते, तो उसके अपने कभी भी इजरायल के विरुद्ध 7 अक्टूबर वाली घटना को अंजाम नहीं देते।

इसलिए यह कहना कि, 
"किसी भी नरसंहार में "सिलेक्टिव किलिंग" की जब बात आती है, तब मानवता कम्पित हो जाती है, क्योंकि इससे वे लोग भी सन्तप्त हो रहे, जो ऐसा कभी चाहते ही नहीं थे?
वास्तव में एक कोरी और थोपी हुई बकवास थ्योरी मात्र है।

इसलिए, 
           हमारी नीति कहती है, "शान्ति का उपाय तब तक ढूढें, जब तक कि सबसे निम्न वस्तु का मूल्य भी सबसे अमूल्य वस्तु के बराबर आँकलित होने के बाद भी तुलित न हो सके।"
परन्तु इसके पश्चात जब रणभूमि में उतरना ही पड़े, तब यह विल्कुल भी विचार मन मस्तिष्क से हटाकर उतरें कि,
कौन सत्य के पक्ष में था, और कौन विपक्ष में?
क्योंकि यह चिर सिद्धान्त है कि, प्रकृति में न कोई तठस्थ होता है, और न ही कोई अपने बहुसंख्यकवाद के विरुद्ध ही आचरण करने वाला।
इसलिए बहुसंख्यक आबादी के सृजित परिणाम का प्रतिफल अल्पसंख्यक मत को भी भुगतना ही पड़ता है।

और यह इसलिए नहीं कि, अल्पमत का ऐसे महाविनाश में कोई सार्थक योगदान नहीं होता। बल्कि ऐसे अल्पमत का योगदान तो उस #उत्प्रेरक की भाँति समझा जाता है, जिन्हें नष्ट किये बिना कभी शान्ति की स्थापना सम्भव ही नहीं।

अर्थात, 
          बुरे से बुरा व्यावहारण वाला संगठन या इकाई भी अपने अस्तित्व की रक्षा करने का नैतिक अधिकार रखती है, परन्तु जिस समाज या इकाई में "द्विअर्थक विचारधारा प्रस्फुटित और पल्लवित होने लगे, आपत्तिकाल में ऐसी द्विअर्थक स्थिति का समूल अंत करना ही एकमात्र साधन शेष बचता है।

अब अगर इस तथ्य का विश्लेषण जापान के हिरोशिमा और नागासाकी से लगाया जाए तो,
राजाज्ञा के विरुद्ध एक विशेष जाति को छोड़कर शेष का सैन्य सेवा से पलायन करना ही उनके पतन का मुख्य कारण बना।
हिटलर की पराजय में भी यहूद विचारधारा वाले तठस्थ और रशद सप्लाई चेन को बाधित करके जर्मनी को युद्ध से बाहर निकालने वालों के बाहुल्य का परिणाम ही जर्मनी को भुगतना पड़ा।
जिसके कारण ही मित्र सेनाओं द्वारा जर्मन आम नागरिकों पर रेड फास्फोरस बमवर्षा द्वारा भयंकर विनाश और महाविनाश को अंजाम दिया जा सका।

(वैचारिकी में स्पष्ट मत रखें, या पलायन को स्वीकार करें, तटस्थता प्रकृति को स्वीकार्य नहीं, ये लिजलिजा ज्ञान देने वाले नराधमी टाइप लिबरल और चाण्डाल म्लेच्छों से आप सब यह पूछना न भूलें कि,
"क्यों रे!
           परिवर्तन में समाहित सामग्री ही परिणामी होती है या #उत्प्रेरणा को बढ़ाने वाली सामग्री भी"।
देखना आप सब को किस प्रकार ये दो मुंहे बे बाप की औलादें किस प्रकार चिढ़कर आपको ब्लॉक करती हैं, या अपना यथार्थ रूप ख्यापित करती हैं।)

कु.नमिता आलोक भारद्वाज

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