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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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नारी इस देश में सर्वोच्च शक्ति है दिव्य है ।आज भी पुस्तकों में नारी का जो प्रतिबिंब हैं वह शरीर सापेक्ष हैं ।नारी सापेक्ष नहीं है ।नारी इस शरीर के भीतर रहती है वह भी अर्धनारीश्वर है ।भीतर अग्नि है भले ही वह बाहर सौम्य दिखाई देती है। अतः उसका संकल्प पुरुष से अधिक दृढ़ होता है ।पुरुष बौद्धिक प्राणी है उसे परिवार का पालन ,रक्षण करना है अगली पीढ़ी को तैयार करना है। स्त्री मनस्वी है मन ही जीवन है सपने हैं, सुख-दुख हैं ,स्मृति है प्रेम है ,यह स्त्री की विरासत है। नारी देश की सांस्कृतिक निर्माता होती है।
आज की शिक्षा ने नारी को लील लिया ,स्त्री की भूमिका भी मनोरंजन मात्र रह गई ।नारी का गुरुत्व समाप्त होता जा रहा है। शरीर का पशु भाव ही शेष रहता जान पड़ता है । यही कारण है कि आज की नारी का जीवन बारूद के ढेर पर है । शिक्षित नारी इस बात से कुंठित है कि वह पुरुष की तरह स्वतंत्र नहीं है घर में बंधी है कामकाजी इस बात से दुखी है कि उसे आगे बढ़ाने के लिए इस पुरुष का सहारा लेना पड़ रहा है, जिससे उसका संघर्ष है आप ही शक्ति दो ताकि आपको टक्कर दे सकूं भस्मासुर की कथा हो गई सशक्तिकरण की पुकार।
विश्व पटेल पर खेल लगभग पांच दशक से प्रभावि रहा है ,और वहां की नारी आज जिस भी स्थिति में है, क्या भारत की नारी को वह स्थिति स्वीकार्य होगी? शिक्षा ने उसे एक नया आकाश दिखा दिया है किंतु भीतर का व्यक्ति कभी नहीं बदलेगा ।
हमारा जन्म पिछले कर्मों के फल भोगने के लिए होता है जिनको ऋणनुबंध कहते हैं। होनी को टाला नहीं जा सकता इसका यही अर्थ है। जब तक हम अपने स्वरूप में है, जैसा जहां ईश्वर ने बनाया तब तक हम प्राकृतिक रूप से जी सकते हैं। जहां अपनी मर्जी थोपी या नकल करने की कोशिश की वही मार खाई ।यही आज का सबसे बड़ा सच है कि भारतीय युवा नारी भारतीय होने में शर्म महसूस करने लगी है। भले ही परंपराएं बनी रहे त्यौहार बने रहे किंतु बच्चों को हिंदी स्कूल में भेजना उसका सपना नहीं है। ।वहीं दूसरी और युवा पुरुष ने भी जीवन के सपने करियर पर ही लाकर छोड़ दिया।
मोबाइल टीवी सिनेमा आदि ने जीवन को भोग प्रधान भी बनाया और उपभोग का साधन भी बना दिया जो समय पर सामने आया वह ही जीवनसाथी बनता गया।
दूसरी ओर माता-पिता को बेटी की यह स्थिति अनुचित नहीं लगती ना उनको समय पर शादी करने की कोई चिंता होती। मां भी उसे बिना वैवाहिक जीवन की जानकारी दिए अनजान घर को विदा कर देती है। पिता पुत्र का संवाद भी शून्य सा है। माता-पिता इस बात पर गर्वित आवश्य होते हैं कि उन्होंने बेटी को भी बेटे की तरह ही पढ़ाया भेदभाव नहीं था । उन्होंने एक ही चिंता दर्शाई की कठिन समय आ पढ़ने पर उनकी बेटी पराश्रित ना हो जाए अपने ही पांव पर खड़ी रह सके यही सीख आज जीवन में उल्टी पड़ती दिखाई देती है।
लड़की वालों को सुरसा बना दिया है पश्चिम की नकल ने। दहेज के स्थान पर बोलियां लगने लगी है कौन लड़का कितना पढ़ा है उतना ही दहेज चाहिए भले घर में हो या उधर लाना पड़े दोनों घर समधी के नहीं व्यापारियों के हो गए संतान का क्रय विक्रय करते हैं अपनी संतान को सोना मानते हैं सामने वाले पर अहसान करते हैं। बहू किसको चाहिए लड़के वालों को तो धन चाहिए शादी तो दिल से होती है। खरीद फरोक्त तो सौदा है। दोनों अपनी-अपनी मर्जी और आवश्यकता के अनुसार जिएंगे यही टकराव का बड़ा कारण बनेगा। शारीरिक आकर्षण सामाजिक दायित्व बोध गौण हो जायेंगे। अकेली महिला पूरे विश्व में सुरक्षित नहीं है। ससुराल से बाहर निकलना दोनों पक्षों को उजाड़ देता है । सुसंस्कृत बहू के बिना लड़के का खंडन विकसित ही नहीं होगा पहले पति के बाद कितने भी पति मिले सबको वह नहीं मिल सकता जो लड़की शादी से पूर्व वर के लिए संजोती है ईश्वर से जो प्रार्थना करती है आत्मा को जिस प्रकार आहूत करके पति में समा जाना चाहती है ।
आज स्त्री पुरुष देव मंत्र रह गए ।शादी भी देहो की होती है ।
प्राणों का आदान-प्रदान ही नहीं हो पता। लड़की का शरीर बुद्धि ससुराल आते हैं मन पीहर में ही छूट जाता है प्राण भी पिता में ही रह जाते हैं अतः शरीर वस्तु जैसा रहा है। विक्रय मूल्य हो गए। सुख, वात्सल्य, करुणा, दांपत्य भाव के स्वरूप बदल गए। मन शरीर आत्मा तीनों का स्थान बुद्धि ने ले लिया। चारों अंगों के कार्य एक के कंधों पर! सबका जीवन धधकने लगा है ।पूरा पश्चिम इसका उदाहरण है। हर व्यक्ति स्वच्छंद है ।यही जीवन का बिखराव है। व्यक्ति ही ईश्वर सत्ता बना जी रहा है । नारी अपनी माया में से मकड़ी की तरह अपनी ही जल में बंद, संघर्ष के बीच सुरक्षा ढूंढती रहेंगी ।
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