- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
राजा परीक्षित को शुकदेवजी श्रीमद्भागवत सुना रहे थे।
.
छः दिन हो चुके थे और अगले ही दिन राजा परीक्षित को तक्षक नाग डसने वाला था।
.
छः दिन तक श्रीमद्भागवत सुनने के बाद भी राजा का शोक और भय दूर नहीं हुआ।
.
राजा का विचलित मन देख शुकदेवजी ने एक कथा सुनानी आरम्भ की ।
.
राजन ! प्राचीन समय की बात है, एक राजा एक बार आखेट के लिए वन में गया।
.
वन में वह राजा अपने साथियों से बिछड़ गया। वन बहुत घना था और वर्षा भी होने लगी थी।
.
बहुत भटकने के बाद भी उसे मार्ग नहीं मिला।
.
रात्रि हो गई चारों तरफ घना अँधेरा छा चूका था।
.
वह रात्रि बिताने के लिए किसी सुरक्षित स्थान की तलाश कर रहा था।
.
तभी घने अन्धकार में उसे प्रकाश दिखाई दिया। एक बहेलिये की झोपड़ी में दीपक जल रहा था।
.
जब वह राजा उस झोपड़ी के निकट गया तो देखा कि झोपड़ी से बड़ी दुर्गन्ध आ रही थी।
.
उसमें एक बहेलिया रहता था, जो ज्यादा चल फिर नहीं सकता था इसलिए उसने झोपडी में ही एक तरफ मल – मूत्र का स्थान बना रखा था।
.
नरक तुल्य स्थान था। किंतु और कोई उपाय न देख राजा ने बहेलिये से एक रात्रि उस झोपड़ी में बिताने की विनती की।
.
बहेलिया बोला – लोग यहाँ आ जाते है, परंतु जाने में झगड़ा करते है। सबको मेरी झोपड़ी परमप्रिय हो जाती है।
.
इसलिए मैंने लोगों को ठहरने की अनुमति देना बंद कर दिया। कृपा करके कहीं और जाइये
.
राजा बोला – मैं वचन देता हूँ, सूरज की पहली किरण के साथ ही मैं आपकी झोपड़ी छोड़ दूंगा।
.
मुझे मात्र एक रात्रि के लिए आश्रय प्रदान करे।
.
बहेलिया बोला – ठीक है, राजा को आश्रय मिल गया।
.
रातभर झोपड़ी की दुर्गन्ध राजा के मन – मस्तिष्क में ऐसे रस – बस गई कि ही राजा को झोपडी परमप्रिय लगने लगी।
.
प्रातः बहेलिये ने महाराज से कहा महाराज ! उठिए और प्रस्थान किजिए
.
राजा बहेलिये से और अधिक रहने के लिए बोलने लगा। बहेलिया बोला.. मैंने कहा था ना, महाराज ! कृपा करके आप चले जाइये।
.
इतनी कथा सुनाकर शुकदेवजी ने राजा परीक्षित से पूछा – अब राजन ! आप ही बताओ ?..
.
उस राजा का अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर उस झोपड़ी में रहने के लिए झगड़ा करना कहाँ तक उचित था ?
.
परीक्षित बोला – प्रभु ! ये कौन मुर्ख राजा था। जो गन्दी झोपड़ी में रहने के लिए हठ कर रहा था ?
.इस पर शुकदेवजी मुस्कुराते हुए बोले – राजन ! वो आप है। जो अब भी मल- मूत्र और मांस की गठरी देह से मोह रखे हुए है।
.
राजन ! आपका इस देह रूपी गठरी में रहने का काल कल समाप्त हो रहा है तो फिर शोक किसलिए करना !
.
अब राजा परीक्षित को बोध हो चूका था। वह देह के सत्य से अवगत हो चुके थे। अब वह मृत्यु से निर्भय हो मुक्ति के लिए तैयार थे।
.
.
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें