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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
एक उद्योग पूरे गांव शहर की अर्थव्यवस्था को कैसे बदल देता है, जानने के लिए पढ़ें मध्यप्रदेश के विदिशा के छोटे शहर बीना के विकास यात्रा की कहानी
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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लगभग 40-45 वर्ष पुरानी बात है जब मैं अपने गांव में स्कूली छात्र हुआ करता था...
मैं एक छोटे से कस्बे, कुरवाई, का मूल निवासी हूँ जो कि बीना जंक्शन (मध्यप्रदेश) से लगभग 20 किमी दूर स्थित है. नजदीकी रेल्वे स्टेशन (मंडी बामौरा) लगभग 8 किमी दूर स्थित है जहाँ दिन भर में 4-5 जोड़ी पैसेंजर ट्रेन और 2-3 जोड़ी (नाम की) एक्सप्रेस ट्रेन ठहरा करती थी...
बीना से जोड़ने वाली सड़क इतनी खराब थी कि 20 किमी की दूरी तय करने में एक घंटे से भी ज्यादा समय लगता था. भोपाल, जो लगभग 120 किमी दूर है, जाने में 4 घंटे से अधिक लगते थे, इसलिए बहुत ही कम बसें चलती थी और ट्रेन से जाना हम सब की मजबूरी हुआ करती थी...
रोजगार के अवसर न होने के कारण बच्चे युवा होते ही भोपाल की राह पकड़ लेते थे, अपने बुजुर्ग मां बाप को बेसहारा छोड़कर...
सड़कों के गड्डे भरने और ट्रेनों का स्टॉपेज करवाने के लिए बड़े पैमाने पर आन्दोलन हुआ करते थे (नई और अच्छी सड़क की तो कल्पना भी नहीं करते थे हम लोग). लाठी-गोली, धरना-प्रदर्शन नियमित घटना हुआ करती थी. एक ट्रेन का स्टॉपेज करवाकर नेतागण उसे 5 साल तक चुनावों में भुनाते थे. लंबे संघर्ष के बाद कुछ ट्रेनें तो मिलीं पर प्रगति कोसों दूर रही. 1947 में कस्बे की आबादी लगभग 25,000 थी जो 2011 की जनगणना में 35,000 हो गई. नगर पालिका, अवनत होकर नगर पंचायत बन गई...
1992 में श्री पी व्ही नरसिंहराव ने बीना के नजदीक (मेरे गांव से 15 किमी दूर) एक पेट्रोलियम रिफाइनरी का शिलान्यास किया. फिर क्या था गरीबों और किसानों के सारे हितैषी (तथाकथित हितैषी) सक्रिय हो गए, छातीकूट होने लगा, हम अपनी जमीन नहीं देंगे, रिफाइनरी लग जाएगी तो पर्यावरण बर्बाद हो जाएगा, के नारे गुंजायमान होने लगे, सरकार झुक गई, काम लगभग बंद हो गया...
फिर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार आई, काम दोबारा शुरू हुआ, इस बार छातीकूटों की एक न चली और काम पूरा हो गया. काम पूरा होते-होते चारों ओर विकास के संकेत दिखाई देने लगे. जहां गड्डे भरने के लिए बरसों आन्दोलन करने पड़ते थे, अब बिना मांगे चौड़ी सड़कें बन रही थीं, भोपाल की दूरी दो-ढाई घंटे में तय होने लगी, सड़कों के गड्डे और ट्रेनों के स्टॉपेज के जैसे मुद्दे बेमानी हो गए...
जहां अस्पताल में एक लेडी डॉक्टर की पोस्टिंग या X-Ray मशीन के लिए नेताओं, अफसरों के हाथ-पैर जोड़ने पड़ते थे वहां अब बिना मांगे मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल बन गया. जब मैं स्कूल में था तब अपने स्कूल में एक कमरे की भीख मिलने की उम्मीद मेंं सांसद या कलेक्टर साहब के काफिले के इंतजार मेंं हम बच्चों को सड़क के किनारे लाइन से खड़ा कर दिया जाता था कि साहब लोग की नजरे इनायत हो गई तो स्कूल को एक कमरा, एक टॉयलेट मिल जाएगा या फिर टपकती हुई छत की मरम्मत करवा दी जाएगी. घंटों धूप में तपते बच्चे जो न पा सके वह एक उद्योग ने दे दिया, मेरे गांव के बच्चों को कई कमरों वाले सर्व सुविधा युक्त ढेरों स्कूल मिल गए...
इस उद्योग के साथ और भी सहयोगी उद्योग आ गए हैं, पूरे क्षेत्र में जमीन की कीमतें अच्छी खासी बढ़ चुकी हैं, युवाओं को अब रोजगार के अधिक अवसर अपने गांव और उसके आसपास ही उपलब्ध हैं...
कहने का तात्पर्य यह है कि 50 सालों के धरना-प्रदर्शन ने मेरे गांव को लाठी-गोली, बेरोजगारी, गरीबी और पलायन के अलावा कुछ न दिया परन्तु एक INDUSTRY ने बिना मांगे सारी तश्वीर बदल दी...
आज यदि उद्योग विरोधी छातीकूट करने वाले नेता, बुद्धिजीवी, NGO वहां आयेंगे तो मुझे पक्का विश्वास है कि गांव के लोग उन्हे दौड़ा-दौड़ाकर पीटेंगे...
साभार
अखिलेश साहू
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