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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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अगर ईश्वर है, हम ईश्वर को मानने हैं, तो उसी ने तय किया है कि हमें कहां जन्म लेना है। शायद हमारे पूर्वजन्म के कर्मों के आधार पर या संयोगवश कुछ भी हो सकता है किंतु किसी ने जबरदस्ती हमें उस जाति या समाज में नहीं भेजा है, जहां हम हैं। हम नेचुरली(प्राकृतिक रूप से) वहां है क्योंकि हमें ईश्वर ने वहीं भेजा है अर्थात हमारी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में किसी दूसरे का दोष नहीं। केवल हमीं क्यों! वो सारे मनुष्य जो कष्ट भोग रहे हैं, सभी को ईश्वर ने उसकी जाति व सामाजिक ताना-बाना बुनकर भेजा है। रोने से क्या होगा। अपने भाग्य के भाग्य विधाता हमीं हैं, चाहे कर्म से या भाग्य से!
बहुत सारे ब्राह्मण भी दुर्दशा झेल रहे हैं, वह उसके जिम्मेदार स्वयं है़ं। आखिर ब्राह्मणों को भी सामाजिक हीनता झेलनी पड़ती है, जब वह किसी बड़े सामाजिक समारोह में फटेहाल पहुंच जाते हैं। जब उन्हें लोग भिखारी, लोभी या लुटेरा कहकर बुलाते हैं। जब वह अपने बच्चों को भरपेट भोजन नहीं करा पाते या जब वह किसी बड़े होटल की ओर ललचाई नज़रों से देखते हैं। पर बहुत कम ब्राह्मणों में इस बात का मलाल होता है कि हमें ईश्वर ने निर्धन या अक्षम क्यों बनाया क्योंकि वह ईश्वर पर भरोसा रखते हैं। उन्हें इस बात का बोध है कि वह जो भी है़ अपने ही कर्मों की सजा भोग रहे हैं, इसमें उनके पूर्वजन्म के कर्मों के सिवाय किसी का दोष नहीं। और अगर वह किसी का दोष मानते भी हैं तो यह उनका दोष है।
आरक्षण की समस्या हो व जाति विरोध, दोनों ही मानसिक समस्या हैं। वास्तविकता में बुराई हमारे ही अंदर है, हीनभावना हमें कष्ट देती है। हम अच्छा देखना नहीं चाहते जबकि समाज गले लगाने को तैयार है। समाज में हजारों अच्छे उदाहरण है, लोग समस्याओं से लड़ रहे हैं। कमियों को ठीक करने में लगे हैं किंतु वह हमें नहीं दिखता। हमें केवल बुराई ही दिखती है क्योंकि हमने अपना माइंडसेट बना लिया है कि हमें तो बस दूसरों को गाली देना है या फिर हमें ऐसा पढ़ा दिया गया है कि तुम्हारे साथ बड़े अन्याय हुए हैं। जबकि वास्तविकता में ऐसी ज्यादा बातें हैं नहीं और जो हैं भी वह समाज की अज्ञानता और रूढ़िवादी सोच का प्रतीक है। कमियां ठीक होनी ही चाहिए किन्तु हम कमियां गिनाने में लगे हैं यह ठीक नहीं है, हमें कमियां नहीं अच्छाइयां गिनने की आवश्यकता है।।
जातियां केवल मनुष्य में नहीं हैं, जानवरों और पेड़ पौधों में भी है किंतु हीन-भावना केवल मनुष्यों में दिखती है। गाय की अनेकों जातियां हैं व आम की अनेकों जातियां हैं। कुत्तों की अच्छी अच्छी नश्ले हैं, हम उन्हें अच्छी कीमत पर खरीदकर पालते भी हैं। सबकी अपनी अपनी विशेषताएं हैं पर उनमें कोई ऊंच-नीच का भेद नहीं। अगर यह मनुष्यों में अभी भी बचा है तो उसे ठीक किया जाना है, ठीक होना ही चाहिए किन्तु इस बात को लेकर हमारे अंदर हीन भावना नहीं आनी चाहिए।केवल मनुष्य जाति में यह व्यवस्था है कि अच्छे कर्मों से जाति मिटाई और बदली जा सकती है अतः पुरुषार्थ करते रहना चाहिए।पुरुषार्थ हमारे हांथ है लेकिन जाति को लेकर हीन भावना नहीं लाना चाहिए, उसमें किसी का कोई दोष नहीं। हम चाहें तो जाति न लिखें इसकी छूट भी हमें संविधान देता है, हम चाहें तो जाति बदल सकते हैं। हां आरक्षण का मोह जरूर छोड़ना पड़ सकता है। यद्यपि आरक्षण कमजोर की लाठी है,अगर यह कमजोर को मिले। किंतु समस्या यह है कि कमजोर आदमी से उसकी लाठी ही छुड़ा ली जाती है और उसकी लाठी छुड़ाने में उसके अपनी ही जाति के लोग हैं।
कहने का आशय यह है कि हम जो हैं, जहां हैं इसमें किसी का कोई दोष नहीं समझना चाहिए। अगर कोई ब्राह्मण घर में पैदा हुआ हुआ है तो उसे भी ईश्वर ने भेजा है और आप क्षत्रिय हैं तो आपको भी ईश्वर ने ही उस समाज और परिवार में भेजा है। आपके स्थान पर वह और उसके स्थान पर आप भी हो सकते थे, तो फिर क्या एक दूसरे को गाली देना उचित है। दूसरी बात जन्म के बाद भी अच्छे कर्मों द्वारा आप ब्राह्मणों से भी श्रेष्ठ हो सकते हैं, सो होइए, कौन रोक सकता है। आप संन्यासी बनिए, महात्मा बनिए, ब्राह्मण बनिए, नेता बनिए, कलेक्टर बनिए कौन रोक सकता है । जब आज आपको कोई रोकने वाला नहीं है तो फिर आप किसी को गाली देने में अपना समय और प्रारब्ध दोनों क्यों बिगाड़ रहे हैं। आप अपने आसपास देखेंगे तो पाएंगे लोग आपकी मदद करने को तैयार हैं आप अच्छाइयां देखिए और आगे बढ़िए यही मेरी तरफ से शुभकामनाएं हैं। तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में लिखा भी है -
कोउ न काहु सुख दुख कर दाता।
निज कृत कर्म भोग सब भ्राता।।
सादर
डॉ रजनीश कुमार पाण्डेय
(ओजस्वी) रीवा मध्य प्रदेश
संपर्क -9479647278
टिप्पणियाँ
बहुत सुंदर प्रयास है इस वेबसाइट द्वारा
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