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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
पता नहीं क्यों साहित्यकारों और विचारकों के घोर पतन को देखकर ऐसा प्रतीत होने लगा है कि मेरा सारा उद्यम किसी बलुआ खेत के परिष्करण सा सिद्ध होने वाला है।जिसके कारण न मैं साहित्य सृजन पर फोकस कर पा रही, और न ही अन्य विषयों पर।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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पता नहीं क्यों साहित्यकारों और विचारकों के घोर पतन को देखकर ऐसा प्रतीत होने लगा है कि मेरा सारा उद्यम किसी बलुआ खेत के परिष्करण सा सिद्ध होने वाला है।
जिसके कारण न मैं साहित्य सृजन पर फोकस कर पा रही, और न ही अन्य विषयों पर।
सारे सोशल प्लेटफॉर्म पर मोदिया की लोकप्रियता में आयी भयङ्कर गिरावट को देखकर यह समझ आने लगा है कि वह दिवस अब दूर नहीं, जब भारतीयों की स्थिति एक ऐसी भेड़ सम देखी जाएगी, जिसे किसी भी प्रकार के साधन से भलीविधि यथेष्ट दिशा में हाँका जा सकता है।
ट्वीटर पर राष्ट्रवादी पहले ही अल्पसंख्यक सिद्ध होने लगे थे। जबकि ट्वीटर इण्डिया की मानें तो कुल ट्वीटर पर सक्रिय id लगभग 2 करोड़ हैं। और इन दो करोड़ लोगों के मध्य होने वाले किसी भी सर्वे की रिपोर्ट उठाकर देखें यह कॉमन रूप से समझ आ जायेगा कि इस प्लेटफॉर्म पर 70%से अधिक राजमाता और टुकड़े गैंग का प्रभुत्व स्थापित है।
समस्या ट्वीटर पर बढ़ी भीड़ का नहीं, समस्या है जब इतने अधिक राजमाता और टुकड़े गैंग के सिपहसालार मात्र एक प्लेटफॉर्म पर हों, तो हमारे मध्य उनकी स्थिति कितनी ज्यादा होगी?
वैचारिकी में उनसे ट्विटर पर पिछड़ रहे, तो क्या ग्राउण्ड पर उनसे हमारी स्थिति मजबूत है?
यह कैसे समझा जाये?
वही अगर मैं बात करूँ सोशल मीडिया के फेकबुकिया प्लेटफॉर्म की तो, इस प्लेटफॉर्म पर लगभग 15.7 करोड़ भारतीयों की id है, जिनमें से लगभग 9 करोड़ एक्टिव id, और एक्टिव id में सर्वाधिक ग्रामीण और घरेलू परिवारीजन कि id हैं। जो किसी भी प्रकार से विचारक नहीं ही समझे जा सकते। वही विचारकों की बात करूँ तो ट्वीटर के समान ही इस प्लेटफॉर्म पर भी लगभग ट्वीटर से अधिक ही विचारकों की उपस्थिति सहज देखी जा सकती है।
यह अवश्य है कि इनमें कुछ विशिष्ट विचारधाराओं की उपस्थिति भी देखी जाती है। परन्तु उनकी संख्या भी नगण्य ही है।
परन्तु यह स्थिति खतरनाक नहीं, बल्कि यथार्थ खतरा की बात तो यह है कि, इस प्लेटफॉर्म पर भी राष्ट्रवादी पक्ष अत्यन्त पिछड़ा हुआ सा देखा जा रहा।
न उसके पास फंडिंग है, और न ही उसके पास कोई रणनीति, जिसके माध्यम से अपनी उपस्थिति को वह बहुआयामी रूपसे ख्यापित कर पाए।
और सबसे बुरी स्थिति अगर देखी जाए तो वह है #यूट्यूब की।
इस प्लेटफॉर्म पर राष्ट्रवादी ही नहीं हमारी परम्परा के रक्षकों की स्थिति भी #अल्पसंख्यक से भी गयी गुजरी है। राजमाता और टुकड़े गैंग के काउंटर की बात छोड़ दें, केवल वाजिब प्रश्नों का उत्तर ही उपलब्ध करवा सकें, इतनी भी हमारी स्थिति यूट्यूब पर नहीं।
कोरा, विकिपीडिया और अन्य साइट्स पर तो ऐसे पिछड़ गए हैं, मानो ये सब हैं क्या? इसका नाम बोध तक नहीं।
परन्तु इतना सब कुछ होने के बाद भी राष्ट्रवादियों और शास्त्रवादियों का घमण्ड देखें तो समझ आता है कि,
इनसे बड़ा तो स्वयं प्रजापति ब्रह्मा भी नहीं, वे तो #पनिभर हैं, इन महान मूढ़मतियों के।
कैसे लड़ाई जीतोगे आदरणीय जन?
मुझे अमित्र और ब्लॉक करके? शुतुरमुर्गा बनकर समस्याओं से अगर निजात मिल जाये तो अवश्य ही शुतुरमुर्गा बन जायें, परन्तु अगर निजात की अपेक्षा फिर भी न दिखे, तो बस एक ही बात बोलूँगी,
अपने इस कापुरुषों वाले आचरण अर्थात एक दूसरे को ब्लॉक करने, अहङ्कार से परिपूरित रहने जैसी #गंवार_औरतों वाले चरित्र से बाहर आकर विचार करें।
अब और आप सब से लड़ने का मेरा कोई विचार नहीं,
क्योंकि जो संकल्पित हो पतन की ओर जाने के लिए उसे और लग्गे से धक्का दे देना ही सिखाया गया है, ताकि वह धारा ही पकड़ ले।
तो मित्र बांधव जन, क्या करते हैं विचार?
कोई रणनीतिक परिवर्तन करना है या तुष्टिकरण अब हम सब भी अपना ही लूँ?
जय श्री कृष्ण
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