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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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1- आरम्भ काल से ही सनातन भारतीय शिक्षा प्राणली ..राजा व राज्य के हस्तक्षेप से मुक्त थी..पूर्णतः मुक्त ...। समाजिक सहयोग से चलने वाली प्रणाली ...ऐसी प्रणाली जो व्यक्तिगत प्रयासों से चलती थी !
चाहे रामायण कालीन वाल्मीकि आश्रम हो ...विशिष्ट आश्रम हो या ...द्वापर का संदीपन गुरु का आश्रम हो ...सब राजा व राज्य सत्ता के हस्तक्षेप से मुक्त !
इसका केवल एक अपवाद मिलता हैं ..गुरु द्रोण का शिक्षा केंद्र सरकारी खर्चे पर चलता था ...अर्थात गुरु द्रोणाचार्य ही ऐसे व्यक्ति थे जो तत्कालीन सरकार से सैलरी लेकर पढ़ाते थे....और इसका परिणाम क्या हुआ ???
गुरु द्रोण को भी अपने मनमाफिक अपने शिक्षा केंद्र में किसी बाहरी को एडमीशन देने का अधिकार नहीं था ।
कर्ण व एकलव्य इसी सरकारी नियंत्रण वाली प्रणाली का शिकार बने !
लेकिन कर्ण तो प्राइवेट इंस्टिट्यूट से कुछ सीख भी लिया था ?
2- प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली में राजा व राज्य को शिक्षा का विषय या सिलेबस निर्धारित करने का अधिकार नहीं था...और न ही पाठ्यक्रमो को मान्यता देने का अधिकार था ...वर्ना भारत भूमि पर विभिन्न दर्शनो का विकास ही न हो पाता !
3- प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली में ...कोई वेतन भोगी शिक्षक नहीं था !
ये समाज की जिम्मेदारी थी कि ...वो शिक्षक को उसकी योग्यता के अनुसार सम्मान व पोषण करे वो अपनी इच्छा व सामर्थ्य के अनुसार !
राजा व सरकार द्वारा थोपा गया सरकारी शिक्षक समाज में नहीं होते थे ...। व्यक्ति अपने अपने शिक्षक चुनने के लिये स्वतंत्र थे ! गुरुकुल राज्य की मान्यता पर निर्भर न हो कर अपने ..परफारमेंस पर निर्भर थे !
4- प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली..मे सैद्धांतिक शिक्षा के अतिरिक्त जिस बात पर जोर दिया जाता था... वो था ..छात्र का समाज से संव्यवहार !
अब छात्र के सामाजिक संव्यवहार को विकसित करने के लिये एक अद्भुत प्रक्रिया थी....छात्र...चाहे राजपुत्र हो या ब्राह्मण पुत्र ...या किसी भी वर्ग का ...उसे गुरुकुल में रहते हुए ...समाज मे जाकर कम से कम पांच घरो से भिक्षा मांग कर लाना पड़ता था !
अब इस भिक्षा माँगने की प्रक्रिया के कई उद्देश्य थे ..
पहला तो ये कि छात्र में सामाजिक संव्यवहार मे नम्रता के गुण को विकसित करना ...क्योंकि कोई भिक्षा तभी देगा जब आप नम्रता से मांगेगे !
दूसरे उद्देश्य था.....समाज के लोगो की स्थित से छात्र को अवगत कराना ...क्योंकि शिक्षा अंततः समाजिक परिपेक्ष्य में ही होती हैं ! आप चिकित्सक बनते हैं या इंजीनियर बनते हैं काम तो समाज में ही करना है ...???
5-- प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली में ज्ञान किसी के भी पास हो लेकिन उसके लाभ पर समाज के प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार था ..कारण ये कि समाज ही शिक्षा संचालन में योगदान कर रहा है ..तो लाभ भी उसी को होना चाहिए ?
इसी कारण ..समाज मे ज्ञान पर आधारित व्यवसाय जैसे शिक्षा , चिकित्सा , पुरोहित आदि कार्य के लिये शिक्षक , चिकित्सक व पुरोहित को अपने मनमर्जी से शुल्क या पारिश्रमिक वसूलने का अधिकार न था ...। बस लाभार्थी द्वारा अपनी सामर्थ्य व इच्छा से दिये गये " दक्षिणा " से ही संतोष करना होता था !
ये राज्य व राजा द्वारा नियंत्रित शिक्षा केंद्र की संकल्पना उन समाजो मे विकसित हुई जहाँ राजा का उद्देश्य था कि छात्र विशेष प्रकार की शिक्षा के अतिरिक्त और कुछ न ग्रहण करे ...कोई स्वतंत्रत सोंच. न विकसित कर पाये ..वर्ना मजहब व रिलिजन को चुनौती देने लगेंगे ?
परंतु भारत में ऐसा न था ..जिसका परिणाम विभिन्न प्रकार के दर्शन व गणित आदि की विभिन्न प्रणालियों का विकास हुआ ...जो राज्य की मान्यता पर निर्भर नहीं थी !
राज्य हस्तक्षेप से मुक्त हेतु ही शिक्षा नगर से दूर जंगल में होती थी......चाहे कृष्ण हो या सुदामा ...जाना जंगल में ही होता था ..शिक्षा के लिए !
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नोट :- आज भी गुरुकुल शिक्षा पद्धिति की वापसी हो सकती है अगर सनातन land मैनेजमेंट system के आधार पर अधिकतम जमीन रखने की सीमा निर्धारित हो जाये या सनातन कर व्यवस्था land revenue की वापसी हो जाये ।
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