सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

बलि जिसका सामान्य अर्थ क्या है ?

हिन्दू एक ऐसी मतिमूढ़ प्रजाति है कि, "अगर पड़ोसी यह कह दे कि आपके बच्चे की शक्ल तो मुझसे मिलती है, कसम से उनका सम्बन्ध विच्छेद हो जाएगा। भले ही इसमें धेले भर की सत्यता न हो।"
उसी प्रकार
#बलि जिसका सामान्य अर्थ ही,
"सङ्कल्प कृत उन समस्त क्रियाकलापों से जाना जाता है, जो हमारे जीवन में सहज व्यवहार होता है।"
हमारे समस्त कर्म #यज्ञरूप हैं, और समस्त साधन #आहुति रूप।
साधनों का आहुति दे जो प्रयोजन निष्पादित हो, उस प्रयोजन निमित्त आहुति को "बलि" कहते हैं।

अब इतनी सी सामान्य परिभाषा में आप सब देखें, बलि का अर्थ "केवल #जीवहत्या तक सीमित हो गया?
परन्तु क्यों?
इस पर विचार करने मात्र की फुर्सत नहीं, परंतु लान्तरानी का समय बहुत है......

कोई कह रहा जीव हत्या नहीं होनी चाहिए? कोई कह रहा, फला कोई कह रहा ढेका......

अरे विद्वज्जन!
                  जीवहि जीव आहार..... यह सूक्ति बाबा ने मानस में कही है, जिसका सामान्य आशय है कि, आपको जीवन जीना है तो #सापेक्षतावाद को स्वीकारना ही पड़ेगा। एकतरफा बड़के नैतिक बन के, न व्यवहार होगा न जीवन बसर।

भगवान श्री कृष्ण जी भी कहते हैं, "वैसे तो योग में सर्वोत्तम #सांख्य ही है, परन्तु #कर्मयोग के बिना सांख्य की सिद्धि भी सम्भव नहीं।
इसलिए जीवन है तो "कृत्य और कुकृत्य" दोनों का सायुज्य यूँ ही चलता रहेगा।
परन्तु इसका आशय यह नहीं कि आप सब अपराध बोध से ग्रसित हो जायें।
ध्यान रखें,
"हिन्दू संस्कृति में 
"जो सबसे अधिक प्रिय होता है, उसके #त्रिविध कल्याण का प्रबन्ध मनुष्य करता है"
जैसे- स्वजनों के प्रति आसक्ति ही उसे #मृतकर्म के लिए बाध्य करता है, ताकि उसके स्वजन की #पारलौकिक गति कल्याणकारी हो जाये। माँ बाप की सेवा करना, बुजुर्गों की सेवा करना यह #भौतिक हित है, माँ बाप को तीर्थाटन आदि करवाना, उनके निमित्त हमारा यह #अलौकिक कल्याण भावना मात्र है।

जिस हिन्दू के समस्त #भाव में #कल्याण कामना ही निहित हो, उसे मात्र #जानवरों की हत्या तक सीमित कर दिया गया?
और दुर्भाग्य यह है कि लोग इसे डिफेंड ऐसे करते हैं, मानो उनके बाप को किसी ने गाली दे दी हो।
जबकि चाहिए कि, 
बलि के नाम पर "जीवहत्या" जैसे एकांगी भाव का आरोपण करने वाले को तुरंत चमरहिया पनही भिगाकर "सुपुर्द ए मुंह" किया जाना चाहिए। ताकि भविष्य में ऐसी उथली बकवास न फूटे।

यज्ञ और यज्ञ विधान अर्थात कर्म जगत के व्यवहार को इतना अधिक हाइड अगर कहीं किया गया तो वह हमारी ही संस्कृति में। परन्तु क्यों?
कभी तो विचार करें........

टिप्पणियाँ