सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

भारत में प्राचीन नगर किस प्रकार के थे?


(१) उरु = बड़ा। शरीर में सबसे बड़ी हड्डी जंघा को भी उरु कहते है। विस्तृत होने के कारण पृथ्वी को उर्वी (स्त्रीलिङ्ग रूप) कहते हैं। क्रम = डिजाइन, विशेष क्रम में स्थापित करना। शिल्प शास्त्र के अनुसार विष्णु ने नगरों का निर्माण किया जिनको उरु कहते थे। बाद में वरुण ने इराक में भी वैसा ही उरु नगर बनाया। ऊर नगर इराक का सबसे पुराना नगर कहा जाता है, जहां के अब्राहम थे (बाइबिल जेनेसिस. अध्याय ११, १५, १६, १७, २१, २५)। 
शं नो विष्णुरुरुक्रमः (ऋग्वेद, १/९०/१)
उरुं हि राजा वरुण श्चकार (ऋग्वेद, १/२४/८)। 
उरु नगर की गोल रचना है जिसका केन्द्र भाग सबसे ऊंचा होगा तथा परिधि की तरफ जल का निकास होगा। उरु नगर दक्षिण भारत के पर्वतीय भागों में हैं-चित्तूर, नेल्लोर, बंगलूरु, मंगलूरु, तंजाउर आदि। 
(२) मेरु-पिरामिड को मेरु कहते हैं, चतुष्कोण आधार पर ३ त्रिभुज शीर्ष विन्दु पर मिलते हैं। इसे त्रिशिरा भी कहते हैं, जिसे पूर्व सीमा का चिह्न देने के लिये इन्द्र ने बनवाया था।
त्रिशिराः काञ्चनः केतुस्तालस्तस्य महात्मनः। स्थापितः पर्वतस्याग्रे विराजति सवेदिकः॥५३॥
पूर्वस्यां दिशि निर्माणं कृतं तत्त्रिदशेश्वरैः। ततः परं हेममयः श्रीमानुदय पर्वतः॥५४॥
तत्र पूर्वपदं कृत्वापुरा विष्णुस्त्रिविक्रमे॥५८॥ (त्रिशिरा = पिरामिड, सवेदिकः = आधार या नींव सहित)
(वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धा काण्ड, अध्याय ४०)
बर्मा में सी आकार के पैगोडा (प्रकोष्ठ) बनते हैं। मेरु को चपटा जमीन पर फैलाने से मेरु नगर होगा। इसका अपभ्रंश मेर या मीर हो गया है, अजयमेरु (अजमेर), जैसलमेर, कमलमीर।
(३) श्री नगर-ऊरु का विशिष्ट श्रीनगर है जो श्रीयन्त्र के ९ चक्रों जैसा होगा। अष्टा चक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या (अथर्व, १०/२/३१)। यह मनुष्य शरीर, आकाश के विश्व तथा नगर के लिए भी है। श्रीयन्त्र के केन्द्रीय विन्दु के बाहर ८ चक्रों में नगर का निर्माण होता था, जो अयोध्या का स्वरूप थे। भारत मे ३ प्रसिद्ध नगर इस प्रकार के बने-कश्मीर, गढ़वाल के श्रीनगर, विजयनगर की राजधानी श्रीविद्यानगर। श्रीविद्यानगर का प्रारूप विद्यारण्य स्वामी ने बनाया था। इसका विजयनगर नाम बदलने पर कहा कि यह नगर ५०० वर्षों में नष्ट हो जायेगा। यह अपने समय विश्व का सबसे बड़ा नगर था जिसका घेरा ६० मील का था। इसे म्लेच्छों ने नष्ट कर दिया तथा आज भी इसे विजयनगर कहने में डरते हैं, और हम्पी खहते हैं।
(४) पुर-इन्द्र ने पुरों का निर्माण किया। यह चौकोर नगर था जो समतल के लिए उपयोगी था, अतः उत्तर भारत में पुर अधिक हैं, दक्षिण में उरु। इस आयताकार क्षेत्र में महापथ और लघु पथ समानान्तर थे और समकोण पर काटते थे-ग्राफ की रेखाओं की तरह। इस आयत की ढलान एक भुजा की तरफ होती थी जिस मार्ग से जल का निष्कासन हो। चीन का पेकिंग (बीजिंग) नग पुर है। पुरी प्रायः राजधानी को कहते थे जिसमें बाहरी सुरक्षा आवरण तथा रक्षा और आक्रमण के यन्त्र और साधन थे। द्वारका पुरी का वर्णन महाभारत, वन पर्व, अध्याय १५ में है। इसका अन्य अर्थ है कि वहां पेयजल के भीतरी तथा बाहरी स्रोत हों। इनके विकास का विस्तृत वर्णन वायु पुराण, अध्याय ८, मत्स्य पुराण अध्याय २१७ आदि में वर्णन है।

रामेश्वर मिश्र पंकज जी 

टिप्पणियाँ