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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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भारत वैदिक काल से ही नगरों का राष्ट्र है।
पुर , पुरी और नगरों की विस्तृत चर्चा वेदों में है और उसके बाद पुराणों में है। यूरोप में हमारे छोटे कस्बों की सी आबादी को ही 19वीं शताब्दी ईस्वी के पूर्वार्ध तक नगर कहते रहे और वे भी अत्यल्प थे।
अतः भारत संसार का सबसे प्राचीन नागर सभ्यता का राष्ट्र है और यहां नगर और गांव में परस्पर पूरकता और आत्मीयता रही है ,ना कि टकराव रहा है।
इसी प्रकार भारत प्राचीनतम काल से कृषि के साथ ही व्यापार वानिकी वाणिज्य और शिल्प का राष्ट्र है और यहां अत्यंत उन्नत शिल्प तथा उद्योग व्यवस्था ,व्यापार वाणिज्य और उतनी ही उन्नत कृषि तथा कृषि उपज और बनोपज से संबंधित उद्योग बहुत बड़े स्तर पर स्वदेशी ढंग के रहे हैं । यह बात प्रो कुसुमलता केडिया जी ने सप्रमाण अनेक बार लिखी और कही है।
इससे विपरीत इंग्लैंड और संपूर्ण यूरोप 18वीं शताब्दी तक मुख्यतः पशुपालकों के और कहीं-कहीं कृषि के समाज रहे हैं। वहां का समाज खेतीहर तो कहीं-कहीं रहा है और अधिकांश वह भेड़ों , सुअर,गदहों और घोड़े आदि का पशु पालक समाज रहा। मुख्यत: वह पशुपालक रहा है . सड़कें भी वहां बहुत कम थीं। नहीं के बराबर। पगडंडियों पर मानव सिर तथा जानवरों की पीठ पर और नावों पर थोड़ा थोड़ा माल ही ढोया जाता रहा। भारत जैसा व्यापार वहां बीसवीं शताब्दी ईस्वी में ही फैल सका है।
सबसे पहले अंग्रेजों ने यह झूठ फैलाया कि भारत एक कृषि प्रधान देश है।
उसके बाद उनके चेलों ने उसे रटना शुरू किया ।
लेकिन भारत को कृषि प्रधान और ग्राम प्रधान समाज और सभ्यता के रूप में सबसे ज्यादा प्रचारित करने का काम गांधी जी ने किया और इस अर्थ में उन्होंने अंग्रेजों के प्रोपेगेंडा को सत्य के रूप में प्रतिष्ठित करने का बहुत ही गलत काम किया।
जिस विषय में नहीं जाने,
उस विषय में बोलने की नेताओं की आदत गांधी जी के समय से ही शुरू हुई है और इस समय प्रायः सभी नेताओं में यह आदत व्यापक रूप में फैल गई है।
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