सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

स्वामीनारायण के बनते हुए मंदिर किस बात के प्रमाण दे रहे हैं

स्वामीनारायण के बनते हुए मंदिर इस बात के प्रमाण हैं कि इन्होंने लेश मात्रा में ही सही पर अपने पुराने व मूल अनुयायीयों(पाटीदारों) का कुछ तो भला अवश्य किया रहा होगा । तभी तो शताब्दियों से स्वामीनारायण को यह समाज पूज रहा है । वास्तविकता में जाएं तो ऐसा भी नही है कि निलकंठवर्णी उर्फ स्वामीनारायण में कोई विशेषता न रही हो , निलकंठवर्णी योगसिद्ध थें । हिंसक से हिंसक पशु भी इनके समकक्ष आकर हिंसा का भाव त्याग देते थें । इनके प्रारंम्भिक जीवन के विषय में जो बताया जाता है वह शतप्रतिशत सत्य है अतिशयोक्ति की श्रेणी में तो यह है कि स्वामीनारायण ब्रम्हा,विष्णु, महेश से बड़े हैं , यह अक्षर_ब्रम्ह हैं आदि । वर्तमान में इनके अनुयायीयों के कृत्यों के कारण इनमें प्रश्न नही कर सकते हैं । इन्होंने अपने जीवन का बड़ा भाग गुजरात में बिताया है और इनके अनुयायियों के सामाजिक ,आर्थीक उन्नति व पारिवारिक जीवन में इनका योगदान शतप्रतिशत है और यह योगदान कोई आज का नही है अपितु शताब्दियों वर्ष पुराना है । मतभेद रहना अलग बात है पर इसके लिए किसी के योग्यता में प्रश्न नही उठा सकते हैं । प्रश्न व विरोध उनका कीजिये जो इनकी योग्यता का दुरुपयोग कर रहे हैं । 



मैं स्वामीनारायण सम्प्रदाय के अनैतिक कृत्यों का और इसके वर्तमान मानबिन्दुओं से सहमत नही हूँ पर इसके लिए मैं निलकंठवर्णी उर्फ घनश्याम पाण्डेय जी को भला बुरा नही कह सकता । । 
बाकी जो इनका निजी रूप से विरोध करते हैं वह इनके जैसे बनकर दिखाए समाज के किसी तबके को मुख्यधारा में लाएं तब बात करें । जिसके कारण गुजरात का बड़ा क्षेत्र सूफियों के प्रभाव से बाहर निकला उसे गाली देकर क्या लाभ , हाँ इनके में जो सनातन मानबिन्दुओं व भगवानों का अपराध होता है वह स्वीकार नही किया जा सकता और न ही यह त्रिदेवों के व अन्य देवी देवताओं के समकक्ष ही हैं ।

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