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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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भारत के उत्तराखंड राज्य, जनपद उधम सिंह नगर का शहर रुद्रपुर, रविवार 4 दिसंबर 2022 की वह रात, हड़बड़ाया घबराया सा मैं, 4 डिग्री ठंड में भी पसीने से तरबतर अपने बिस्तर पर उठ बैठा । मेरे मानस पटल पर तीन शब्द अनवरत चोट कर रहे थे, पेशावर.... 300 मील.... हिंदू राजा । थोड़ा संयत होने पर मस्तिष्क ने जब सोचना समझना आरंभ किया, तो एक चलचित्र सा मानस पटल पर प्रगटीभूत होता चला गया ।
एक सुसज्जित राजमहल में राज्य की उच्चस्तरीय राष्ट्र रक्षातंत्र मंत्रणा परिषद के साथ महाराज का गहन चिंतन मनन विचार-विमर्श चल रहा है । मैं भी कुछ कहने को तत्पर और आतुर कुछ कहने का सतत् प्रयास कर रहा हूँ और कुछ कह भी रहा हूँ । मगर लग रहा है मुझे कोई देख सुन नहीं पा रहा है, जबकि मैं भली-भाँति सब कुछ देख सुन रहा हूँ । मैं स्वयं को जड़वत् स्तंभित सा स्थिर अनुभव कर रहा हूँ । मानो किसी खंबे के आँख कान मुँह हों। पार्षद गण कह रहे हैं, महाराज आसन्न युद्ध का संकट एक बार पुनः यमदूत सा सम्मुख आ खड़ा हुआ है । हमें प्राणप्रण से राष्ट्र रक्षार्थ सन्नद्ध रहना होगा । मगर इस बार हमें शत्रु को जीवित नहीं जाने देना है । शत्रु का समूल उन्मूलन ही बार-बार की इस समस्या का एकमात्र समुचित समाधान है ।महाराज भी पार्षदों के परामर्श से पूर्ण सहमति व्यक्त करते हुए उठ खड़े होते हैं और उनके संकेत पर सभी 'हर हर महादेव', 'जय भवानी' और 'महाराज की जय' के जयघोष करते हुए यथा स्थान प्रस्थान कर जाते हैं ।
रणभेरियाँ और युद्ध के नगाड़े बजने लगे हैं । महाराज चिंतन मगन एवं तनाव ग्रस्त हैं । उनके हाथों में एक सुंदर पात्र में भरे पेय पदार्थ को महाराज पीने जा रहे हैं । मैं पूरे जोर से चिल्ला रहा हूँ-- 'राजन! इसे मत पिएँ, मत पिएँ राजन! यह विषाक्त है' । किंतु लगता है वह सुन नहीं पा रहे हैं और पिए जा रहे हैं । मैं जड़वत् सा स्थिर, चाहकर भी उन्हें रोक नहीं पा रहा । पेय पदार्थ को पीते ही महाराज पर क्षणिक मूर्छा सी छाने लगी है और महाराज सामान्य रहने का यत्न करते से लग रहे हैं । रणभेरियों और नक्कारों का शोर पूरे शुमार पर है। महाराज स्वयं को संभालते हुए युद्ध के लिए प्रस्थित हो गए हैं ।
धीमा पड़ता नगाड़ों और रणभेरियों का शोर सेना के रणभूमि की ओर कूच करने का आभास करा रहा है । कुछ ही देर में भागते हुए, हाँफते, काँपते, घबराते रणभूमि से आए हरकारे से यह सूचना राजमहल में आती है, 'युद्ध में....भाला चलाते.... महाराज.... हाथी से.... गिर गए.... और.... और.... और.... अब वे.... नहीं रहे ।'
वज्रपात सा ह्रदय विदारक आघातकारी दुखद समाचार सारे राजमहल में तड़िता सा कौंध गया। हर ओर हाहाकार, रोदन, क्रंदन, चीत्कार, अफरा-तफरी घबराहट, बदहवासी, चींख-पुकार, भागमभाग । मानो कोई ज्वालामुखी फूटा हो या पहाड़ टूट पड़ा हो । भावी होनी, अनहोनी, दुर्गति और दुर्दशा की आशंकाएँ कुशंकाएँ उनके हाव-भाव में स्पष्ट आभासित हो रही हैं।
जंगल में आग की तरह महाराज के अवसान की खबर फैलते ही नेतृत्व विहीन सेना का मनोबल टूटना स्वाभाविक है और शत्रु सेना उस पर हावी हो जाती
है । मारकाट, उपद्रव, लूटपाट और उत्पात् मचाती शत्रुसेना कुछ ही देर में राजमहल तक आ धमकती है और महल में घुसकर लूटखसोट, तोड़फोड़ और मारामारी मचा देती है । रवि के रक्तिम स्नान तक राजमहल के शीर्ष पर रिपु की कुटिल पताका लहराती, इठलाती, खिझाती, चिढ़ाती और इतराती सी लग रही है ।
सर्वत्र रक्तपात, मारकाट, चींख-पुकार, रोदन, क्रंदन, चीत्कार और हाहाकार चींखती-चिल्लाती, रोती-बिलखती असहाय ललनाआओं से उनके बच्चों और परिजनों के सम्मुख खींचातानी, नोचखसोट, मारामारी और मरते दम तक मान मर्दन । दुधमुँहों की निर्जीव खिलौनों सी उठापटक और उछाल-उछाल कर भाले-तलवारों की नोकों पर टाँग कर नचाना-घुमाना । आबाल, वृद्ध, नर-नारियों का गाजर मूली सा शरीरोच्छेदन । उफ! लगता है मैं एकदम सुन्न पड़ गया हूँ । मेरे अंग प्रत्यंग शिथिल हो रहे हैं । लगता है टूट कर बिखर जाऊँगा । मगर लग रहा है मैं तो टूट भी नहीं सकता । मेरे सामने ही मैं सब कुछ किंकर्तव्यविमूढ़, हतप्रभ, असहाय, स्तंभवत् सा विस्फारित, रक्ताभ नयनों से असहनीय, भयानक और विभत्स मंजर देखने को विवशप्रयः हूँ और देख रहा हूँ । मगर मुझे कोई नहीं देख रहा और मेरी और किसी का ध्यान नहीं । मुझे कोई मार भी तो नहीं रहा । लगता है मैं किसी को दीख ही नहीं रहा । मैं सजीव, साकार, साक्षात हूँ भी या नहीं ? पता नहीं, कुछ समझ नहीं आ रहा ।
अगणित ललनाओं ने अग्निस्नान कर लिया है । दरिंदगी के शिकार असंख्य मृत और मृतप्रायः क्षत विक्षत शरीर रक्त सरोवर में हताहत मत्स्य समूह से दिख रहे हैं । नोचे-खसोटे, कटे-फटे अंग और फटे-चीथड़े वस्त्र बहेलियों के जाल से सर्वत्र फैले पड़े हैं । अंग भंग शरीरों और वस्त्रों में भेद करना भी कठिन है ।
सर्वथा अवर्णनीय, अकथनीय, भयावह और वीभत्स दृश्य । दरिंदगी का ऐसा नग्न नर्तन कि दरिंदगी भी शर्मा जाए और क्रूरता की पराकाष्ठा भी आह भरने लगे । मैं बुरी तरह मर्माहत असहाय मौन जड़वत् और स्तंभवत् सा एकदम सन्न खड़ा हूँ ।
क्रूर आक्रांताओं की गर्वित चहलकदमी, वीभत्स विजयोल्लास, भयावह अट्टहास हर्षातिरेक और गर्वोक्तियों के भयानक स्वर गुंजायमान। हैं । जीवित आबाल वृद्ध नर नारी दासत्व को विवश हैं । रात लगता है बीत गई है । पौ फटते ही राजमहल में उन्मादी आतताई यों का उत्पात् उपद्रव और धमाचौकड़ी पुनः प्रकट होने लगी है । राजमहल में सुसज्जित देवी-देवताओं राजपुरुषों पूर्वजों पुरखों के पूजनीय व सुशोभित चित्रों प्रतीकों व प्रतिमाओं को निष्ठुरता एवं निर्ममता से उठा उठा कर फेंका जा रहा है । राजमहल के मुख्य प्रवेश द्वार पर स्थापित कुलदेवी की प्रतिमा को तोड़फोड़ चकनाचूर कर उसके शिलापट पर एक शिलालेख जड़ा जा रहा है, जिस पर अंकित है -- 'आज की तारीख से पेशावर में खलीफा का परचम बुलंद हुआ और अब यहाँ से 300 मील दूर तक कोई हिंदू राजा नहीं ।' इसके साथ ही क्रूर आतताई आक्रांताओं के आतंकी उद्घोष और कर्णफोडू़ गगनभेदी भया़वह जयघोषों से हड़बड़ा कर मैं उठ बैठा हूँ और 4 दिसंबर 2022 की उस रात 4 डिग्री ठंड में भी अपने बिस्तर पर पसीने से तरबतर हूँ । मेरे मानस पटल पर सतत् तीन शब्द चोट कर रहे हैं --'पेशावर'....320मील.... हिंदू राजा' मुझे सांसों में तूफान, हृदय में घुड़दौड़ और मन में भूकंपपों कीऊभचूक सी अनुभूत हो रही है ।
पेशावर यह नाम तो कुछ सुना सा लग रहा था । व्याकुलता, कुतूहल, उत्कंठा और जिज्ञासा का सम्मिश्रण कुछ और जानने समझने को निरंतर झिंझोड़ कर झकझोर रहा रहा था । मैं ऐसी ही उहापोह और उलझन भरी मनोदशा से ग्रस्त दिनचर्या में व्यस्त हो गया । मगर जिज्ञासु मन, मानस की कुंडी अनवरत खड़खड़ा रहा था । मौका मिलते ही मैं गूगल और विकिपीडिया पर रिसर्चरत हुआ । उससे जो चौंकाने वाले तथ्य प्रकट हुए उनसे मुझे आश्चर्य मिश्रित रोमांच हो आया ।
पेशावर एक अत्यंत प्राचीन ऐतिहासिक नगर है । इसका पुरातन नाम पार्श्वपुर है, जो जैन तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ के नाम पर पड़ा है । पार्श्व का अर्थ पश्चिम भी होता है और यह भारत के पश्चिमी छोर पर ही स्थित है । भगवान शिव शंकर का भी एक नाम पर्श्वनाथ है ।
सम्राट पोरस, जिन्होंने सिकंदर के तूफान का सामना कर उसके विश्व विजेता बनने के सपने को चकनाचूर कर ध्वस्त किया और उनके शौर्य पराक्रम के समक्ष नतमस्तक सिकंदर वापसी को विवश हुआ और मार्ग में ही परलोक सिधार गया । उस समय के ग्रीक लोगों ने इस नगर को पारसपुर या पोरुषवर लिखा है । कलिंग के काल में इसे पुरुषपुर लिखा गया है । कालांतर में शताब्दी के अंत तक इसका नाम पार्श्वर पेशावर हो गया ।
इससे आगे का वृत्तांत तो और भी विस्मयकारी और रोमांचकारी है । पेशावर के अंतिम हिंदू राजा अपने पूर्ववर्ती सम्राट जयपाल के पुत्र आनंदपाल थे । सम्राट जयपाल सदैव अजेय रहे । उन्होंने महमूद गजनवी से छोटे-बड़े 15 युद्ध किए । सन 1001 से 1015 तक गजनबी बारंबार सतत् आक्रामक रहा और हार कर शरणागत हो, सम्राट जयपाल की सदाशयता और निहत्थे शरणागत अविश्वसनीय कुटिल शत्रु को भी, क्षमादान की सद्गुण विकृतियुत प्रवृत्ति का लाभ लेकर भाग जाता। रहा । तथापि वन संपदा और गुलामों की भारी लूट से प्रेरित मुँह को खून लग चुके नरभक्षी दरिंदे की मानिंद आक्रांता बना रहा । 15वें युद्ध का नेतृत्व करते हुए महाराजा जयपाल वीरगति को प्राप्त हुए और युवराज आनंदपाल राजा बने ।
ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार महमूद गजनबी ने 17 आक्रमण किए । वर्ष 1016 में हुए अंतिम युद्ध में महाराजा आनंदपाल सेना का नेतृत्व करते हुए, अपनी ही सेना में पठान सैनिकों की एक टुकड़ी के शत्रु से मिलीभगत एवं भीतरघात का शिकार हो गये। महाराजा आनंदपाल के अवसान के उपरांत महमूद गजनवी ने 1019 से 1023 के मध्य महान ज्योतिर्लिंग सोमनाथ और श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर मथरा का विध्वंस किया यह वृत्तांत इतिहास में दर्ज है और सर्वज्ञात है ।
अर्थात मेरे सपने में जिन्हें मैं देख रहा था वह महाराजा आनंदपाल थे। मुझे लगा मानो मैंने टाइम ट्रेवल किया हो और अपने ही किसी पूर्व जन्म के अतीत से मेरा सामम ना हुआ हो । तो क्या किसी निकट के अति विश्वसनीय दरबारी द्वारा ही विश्वासघात और भीतरघात करते हुए युद्ध के लिए कूच करने से पूर्व कोई विषैला पदार्थ महाराज आनंदपाल को पिलवाया गया, जिसके कारण वे रणभूमि में हाथी थे गिर कर परलोक सिधार गए ।
पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर स्थित पेशावर वर्तमान भारतीय सीमा से भी 480 किलोमीटर यानी लगभग 300 मील की दूरी पर ही है । इस स्वाध्याय से मन में एक अलग ही उथल-पुथल और व्यग्रता उत्पन्न हो गई । मैं सोचने पर विवश हूँ कि क्या स्वप्न में भी कोई आलौकिक या पारलौकिक संदेश अंतर्निहित हो सकता है ? या कहीं यह इतिहास का प्रतिबिंब तो नहीं ? क्या मैं इतिहास का हिस्सा हूँ, जो अपने पूर्व जन्म को देख रहा था ? मैं अदृश्य और जड़वत् क्यों था ? क्या मैं प्रेतरूप था ? तो क्या मैं महाराज जयपाल के अति विश्वसनीय शुभचिंतक दरबारी मंत्री या सेनानायक का प्रेतरूप था ? जो महाराज द्वारा बार-बार शत्रु की अनदेखी से व्यथित था और सचेत करने का प्रयास कर रहा था ।
मगर यह प्रश्न मुझे अब भी कचोट रहा था कि आखिर इस स्वप्न का कुछ सार तत्व वर्तमान संदर्भ या परिपेक्ष में भी है क्या ? कोई हमें फिर सचेत करने की चेष्टा तो नहीं कर रहा ? कहीं हम फिर उन्हीं गलतियों को दोहरा तो नहीं रहे, जिसके लिए स्वप्न हमें सचेत करना चाहता है ? मुझे लगा कि निश्चय ही हमारे अतीत में व्यतीत हमारे का कालखंड का ही कोई पूर्वज हमें चेतावनी देने एवं सचेत करने की चेष्टा कर रहा है । परिवेश और परिस्थितियाँ हमें फिर विश्वासघात का गरलपान करा रही हैं और हम जाने-अनजाने शुतुरमुर्गी प्रवृत्ति से ग्रस्त, आसन्न संकट के प्रति आत्मविमुग्ध बने हुए हैं और समझ रहे हैं कि अब हम सुरक्षित हो गए ।यद्यपि संकट की सुनामी सतत अनवरत हमें लीलती चली जा रही है । सुनामी के इस संकट से सचेत करने की स्वयं लीलाधर प्रभु की यह लीला भी हो सकती है । जो भी हो मगर कुछ ना कुछ तो है ही जिस पर गंभीर चिंतन-मनन और विचार-विमर्श अपरिहार्य जान पाता है । अन्यथा प्रबुद्धजन जो भी जैसा भी समझें। तथापि मुझे जो भी जैसा भी लगा तो मैंने प्रगट कर दिया । सादर प्रणाम ।
स्वप्न दृष्टा
तुषार बंसल
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