सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

Bharat: भारत का इतना विरोध का क्यो जानने के लिए पढ़ें पूरा आलेख

अभी जब से भारत को अपनी मूल पहचान के अनुसार केवल भारत नाम से सम्बोधित करने की चर्चा शुरू हुई है, कांग्रेस, वामपंथी और अन्य पश्चिम प्रेमियों के नेतृत्व वाला एक तथाकथित बुद्धिजीवी समूह विरोध में उतर आया है।



भांति भांति के बयान दिए जा रहे हैं।
एक बौना तो इसे इंडिया के साथ गद्दारी बता रहा है।
जो भारत को लूटने वाले अंग्रेजों के टुकड़ों पर पलते हैं, उनकी ये बौखलाहट स्वाभाविक ही है क्योंकि इनको अकारण ही सनातन वैदिक परंपराओं से कष्ट होता है।
विश्व इतिहास के सबसे प्राचीन ग्रंथ की मान्यता प्राप्त ऋग्वेद में हिमालय पर्वत के दक्षिण और हिन्द महासागर के उत्तर में स्थित भूमि को भारत बताया गया है।
भारत नाम स्वंयम में लाखों वर्ष का गौरवपूर्ण इतिहास संजोए हुए है।
भारत नाम लेते ही उस विश्वगुरु भारत का स्मरण हो आता है, जो ना केवल उद्योग -व्यापार में अग्रणी होकर सोने की चिड़िया कहलाया था, बल्कि वैश्विक ज्ञान पिपासुओं की तृप्ति भी भारत में आकर ही सम्भव हो पाती थी। जहां भारत में सतयुग त्रेतायुग द्वापरयुग इत्यादि की बात की जाती है वही पश्चिम विद्वान केवल पाषाण युग कहकर चुप्पी साध लेते है।
प्रभु श्रीराम और श्रीकृष्ण के प्राकट्य की पुण्यभूमि और विश्वविजयी चन्द्रगुत विक्रमादित्य तक के शौर्य के स्मरण के साथ ग्रह -नक्षत्रों की सटीक गणना करने वाले ऋषियों, आयुर्वेद के जनक भगवान धन्वंतरि, सुश्रुत और पाणिनि जैसे विद्वानों से सहज ही हमारा जुड़ाव हो जाता है।
दूसरी ओर India हमारा ऐसा नामकरण है, जो हमें लूटने आये अंग्रेजो द्वारा किया गया।
जब हम स्वयं को indian मानने लगते हैं, तो तुरन्त कोई शेक्सपियर हमारा आदर्श बन जाता है, कालिदास या तुलसीदास हमें याद भी नही रहते है।
लुटेरों ने हमारी सभ्यता व संस्कृति का अस्तित्व मिटा दिया,हम अपनी माटी से कटकर अंग्रेजों और अन्य लुटेरों को अपना आदर्श मानें,इसके लिए हमारा indian बने रहना आवश्यक था।
धूर्त अंग्रेज इस सच को समझते थे, इसलिए भारत को स्थाई रूप से गुलाम बनाये रखने के लिए उन्होंने 1885 में कांग्रेस नामक संस्था का गठन किया। कांग्रेस में सदैव अंग्रेजो के पिट्ठुओं का आधिपत्य रहा, समय के साथ कुछ राष्ट्रभक्त यदि कांग्रेस में आ भी गए तो उन्हें योजनापूर्वक किनारे कर दिया गया।
1947 में जब नेताजी सुभाषचंद्र बोस जी की आज़ाद हिन्द सेना और क्रांतिकारियों से डरकर उन्हें भारत छोड़कर भागना पड़ा तो उन्होंने ये सुनिश्चित कर लिया कि सरदार पटेल जैसे स्वयं को भारतीय मानने वाले किसी स्वाभिमानी व्यक्ति के हाथों में भारत की सत्ता ना आये और देश की माटी से कटे एक मानसिक अंग्रेज नेहरू को ही सत्ता सौंपी।
कांग्रेस ने प्रयत्नपूर्वक अपने आकाओं की इच्छा के अनुरूप कार्य करके भारत को india का गुलाम बनाये रखा।
परन्तु आज जब भारत अपने वास्तविक स्वरूप में पुनर्स्थापित हो रहा है तो कांग्रेस को अपनी वर्षों की मेहनत पर पानी फिरता दिख रहा है।
वो परेशान है कि यदि अब सच में भारतीयों को अपने मूल स्वरूप का स्मरण हो गया, तो ना केवल उनके विदेशी आकाओं का खेल समाप्त हो जाएगा, बल्कि उनके द्वारा फैंके गए टुकड़े भी मिलने बन्द हो जाएंगे।
इसलिए ......
हम भारतीयों को अपने अंतिम लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित रखते हुए कांग्रेसियों के विलाप का आनन्द लेना चाहिये।
अंतिम विजय भारत और मानवता की ही तय है।
एकाग्रता बनाए रखिये।

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