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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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आह पंजाब
महाभारत युद्ध के बाद भारत भूमि अवैदिक मतों के उद्धव के लिए सिंचित भूमि बन गई। किशोरावस्था में लड़के सर मुड़ाकर बौद्घ भिक्षु बनने लग गए और परिणाम ये हुआ कि देश की एक ऊर्जावान आबादी बेकार ही नहीं बनी बल्कि समाज पर पलने वाली परजीवी बन गई।
बुद्ध का मार्ग व्यक्तिगत जीवन जीने के लिए तो ठीक था पर बुद्ध मत सामूहिक जीवन में बदल गया। "हर इंसान बुद्धत्व नहीं पा सकता" इस बात को भूलकर हजारों हज़ार की संख्या में लोग बौद्ध भिक्षु बनने लग गये और हुआ ये कि बाद में मठों में पड़े ये भिक्षु इस जीवन की नीरसता और अप्रासंगिकता से ऊब गए।
बुद्ध ने मानव जीवन में दु:खों का जितना वर्णन किया उसे सही से न समझने के चलते उनके भिक्षु शिष्यों में अपने जीवन के प्रति घृणा हो गई। कहा जाता है कि बुद्ध के दुःख सिद्धांत ने उनके अंदर इतना पैठ कर लिया था कि कई भिक्षु उनके वैशाली प्रवास के दौरान एक कसाई के पास चले गए और उससे कहा कि तुम यदि हमारा वध कर दोगे तो बदले में हम तुम्हें अपना चीवर और पवित्र भिक्षा पात्र दे देंगे। उस कसाई के हाथों सैकड़ों भिक्षुओं ने स्वयं ही अपने जीवन को समाप्त कराया महज इस तृष्णा में कि इससे उनको निर्वाण मिलेगा और इस शरीर के दुःख से मुक्ति।
"कट्टरपंथ" किसी भी वाद का हो अंततः यही कराता है। इसलिए "आत्म चेतना का बोध" ही सबसे उच्चतर वस्तु है।
बुद्ध ने भले निरीश्वरवाद का प्रचार किया हो पर उनकी शिक्षा का अतिरेक भी "एकोपास्यवाद" का ही रूप था।
आप भले किसी भी किताब को, पैगंबर को, गुरु को या विचार को मानते हों पर इसके साथ आपको अपने अंदर ये बोध विकसित करना होगा कि "आत्म-चेतना" को प्रकाशित करना ही मानव जीवन की सर्वोत्तम उपलब्धि है। कोई एक विचार आपके ऊपर हावी हो जाए और उसके साथ ये सनक भी सवार हो जाए कि बस यही विचार सबका विचार होना चाहिए तो फिर ये रास्ता पहले व्यक्तिगत और फिर सामूहिक आत्महत्या की ओर जाता है।
ऐसे विचार तब हावी होते हैं जब आप "पांथिक" बनते हैं, "मज़हबी" बनते हैं, "एकोपास्यवादी" बनते हैं या फिर किसी वाद या मत के अंधानुगामी बनते हैं। फिर अंतत: आप भी वही बन जाते हैं जो तब बुद्ध के भिक्षु बन गए थे।
आज कनाडा के खालिस्तानी भी उसी "सुसाइडल राह" पर है।
अभिजीत सिंह
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