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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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इतिहास के रास्ते में कौन से मोड़ आएंगे यह नेस्त्रादमस भी नहीं भांप सकता. हमने क्रांतियों के इतिहास में देखा है. एक छोटी सी चिंगारी विकराल रूप ले सकती है. जब मुगलकाल का समापन निकट था तो वह समय एक निर्णायक सभ्यतागत युद्ध का था जो न हो सका. मराठा शासन अपूर्ण रह गया. बाजीराव जैसे शासक असमय चले गये. राजस्थान के राजपूत बहुत समय से आइसोलेशन में थे, महाराणा के अवसान के बाद एक प्रतिबद्ध समूह को छोड़कर शेष सब मुगलों की सहयोगी भूमिका में दिखे. अर्थात् भारत में रहते हुए भी वे जैसे भारतीय राजनैतिक परिदृश्य में नहीं थे. समय आ रहा था, इतिहास की धारा एक सशक्त नेतृत्व की भूमिका बनाती.
ऐन उसी समय अंग्रेजों ने दस्तक देनी प्रारंभ कर दी थी. और इस कारण वह निर्णायक सभ्यतागत युद्ध स्थगित हो गया. अंग्रेजों से पहले का छह सौ वर्षों का इस्लामिक कालखंड लगभग नौ करोड़ भारतीयों के नरसंहार व पांच करोड़ के बलात् धर्मपरिवर्तन का गवाह बना.
वह युद्ध जो इस हत्यारी सुल्तान-मुगल सत्ता के विरुद्ध होना था वह अनगढ़़ लक्ष्य व दिशाहीन होता हुआ अंततः 1857 के विद्रोह में अंग्रेजों के विरुद्ध प्रकट हुआ.
यह युद्ध तत्कालीन विश्व की सबसे बड़ी शक्ति अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध हुआ. जिनके साम्राज्य में सूरज डूबता न था, वे पराजय के निकट खड़े थे. यदि नेपाल पंजाब बस न्यूट्रल ही रहे होते, सिंधिया की भागीदारी रही होती तो सेनाविहीन अंग्रेजों को भागना ही पड़ता. फिर उस सभ्यतागत युद्ध की भूमिका स्वतः बन जाती जिसकी भारतवर्ष आज तक प्रतीक्षा कर रहा है. लेकिन अंग्रेजों से हमारी पराजय हुई, उसके दुष्परिणाम आज भी सामने हैं. यहूदी होलोकास्ट से कहीं बड़ा नरसंहार अंग्रेजों व उनके गुलामों ने किया.
दिशाएं खोजते हुए लगभग साठ वर्षों के अंतराल के बाद इस भीरु, शोषित, विभाजित, विखंडन की ओर बढ़ रहे नेतृत्वविहीन भारत के वातावरण में गांधी का आगमन होता है. उनका सबसे बड़ा योगदान भारत की राजनैतिक जागरूकता, सामाजिक एकीकरण के जनआंदोलन व राष्ट्रीयता व स्वतंत्रता की भावभूमि की पुनर्स्थापना में है. एक वातावरण बना. विदेशी शासकों को पहली बार अपराधी सिद्ध किया गया. यह एक बड़ा योगदान था. लेकिन त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन के बाद महानता की ऊंचाई से ढलान की ओर उनकी यात्रा प्रारंभ हो जाती है. बहरहाल, वह अलग विषय है. उस पर फिर कभी कहा जाएगा.
दरअसल, लोकतंत्र क्रांतियों का वाहक नहीं होता यह यथास्थिति की व्यवस्था होती है. नेतृत्व जब आज के समान सक्षम होता है तो देश समग्र विकास के नये प्रतिमान स्थापित करता है. लेकिन नियत सीमाओं का अतिक्रमण तो क्रांतिधर्मी सोच ही कर सकती है. पाकिस्तान का ध्वंस विकास से न होगा. यह तो राष्ट्रीय क्रांति का मूल लक्ष्य बनेगा. इसे पार करेंगे, तभी तो हम उन सरहदों तक पहुंचेंगे जो सदा से हमारी थीं. इस यथास्थिति के काल में देश-समाज का स्वरूप व स्थिरता का आभास उभरता है और शत्रु-समूहों की पहचान होती है. वर्तमान भारत में यही युद्धविराम का कालखंड चल रहा है. प्रधानमंत्री मोदी जी की राष्ट्र-प्रतिबद्धता व निस्सीम धैर्य हमें आश्वस्त करता है.
अब समय आ रहा है. निराशा का यहां कोई स्थान नहीं है. हम मूलतः युद्धप्रिय समाज हैं जिस पर अस्थायी रूप से शांति की चादर उढ़ा दी गयी है. हम बहते हुए रक्त से घबराते नहीं. नौ करोड़ के बलिदान व हमारे ही कटे सिरों की कितनी ही मीनारें हम पीछे छोड़ आए हैं. हमी भारतीयों मे से ही मराठे, राजपूत, हरिहर-बुक्का, बंदा बैरागी, अहोमों जैसे अनगिनत योद्धा खड़े हुए हैं. और भी आएंगे. कौन जानता था मराठों को शिवाजी से पहले. बप्पा रावल ने ही तो राजपूतों का परम योद्धा रूप स्थापित किया. कौन जानता था कि ब्राम्हण 1857 की क्रांति के संवाहक बन जाएंगे ? ऐसे ही बहुत से समाज हैं जो आगे आने वाली चुनौतियों से जूझने के बाद विख्यात हो जाएंगे.
बस एक विचार क्रांति व सांगठनिक क्षमता चाहिए. लक्ष्य का अकाल नहीं है, वह सामने है. शत्रुबोध खण्डित न हो. यह लोकतंत्र का समय एकीकरण व तैयारियों के लिए है. और फिर दूसरों को क्या कहें आप स्वयं के बदलाव को ही न पहचान पायेंगे. बस, हम उस निर्णायक युद्ध की आकांक्षा रखें, प्रतिबद्ध रहें.आप उस स्वर्णिम भविष्य के सिपाही है. यह युद्ध तो होकर रहेगा ..! हां, इसी के दौरान कितने ही लोग कब घर वापस आ जाएंगे, हमें पता भी न चलेगा.
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साभार
Raghavendra Vikram
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