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Teesta Setlvad को SC ने दिया आंतरिम बेल, दोपहर मे पिटीशन, रात्रि 9:30 पर खुली कोर्ट, फिर महीनो के उपरांत मनीष को क्यू नहीं मिल रही डेट? प्रश्न चिंतनीय है?

एक बार फिर हमारी माननीय सुप्रीम कोर्ट के सुप्रीम जजो ने देश को अचंभित कर दिया| आप सबको याद ही होगा दशक पहले कैसे एक आतंकवादी के लिए रात्रि 12 बजे कोर्ट को खोला गया और सुनवाई की गयी|
आज फिर कूछ वैसा ही घटिट हुआ,,

सबको ज्ञात है कि इस समय माननीय सर्वोच्च न्यायालय ग्रीष्म कालीन अवकाश पर है, इसके उपरांत आज रात्रि 9:30 कोर्ट खोला गया और सुनवाई की गयी| 
मामला क्या है? समझते हैं-

आज सुबह ही गुजरात उच्च न्यायालय ने एजेंडा धारी टीस्ता सेतलवाड़ को तुरंत आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया था, जो कि माननीय कोर्ट के आदेश के बावजूद 2002 की घटना पर गलत तथ्यों के आधार पर उस समय के मुख्यमंत्री, वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी जी की छवि के बदनाम करने का कार्य कर रही है| 

इसके आदेश के उपरांत कुछ बड़े नामी वकील सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन फाईल करते हैं, आंतरिम बेल का जिसे तुरंत ही सुनवाई के लिए समय दे दिया जाता है, अवकाश के बावजूद 2 जजो की बेंच बैठती है और आंतरिम बेल प्रदान कर दी जाती है|

अब यहां पर आप देखिए, समस्या ये नहीं है कि बेल मिल गयी वो तो वैसे भी माननीय जज ने कहा है कि बेल  नियम है जेल अपवाद है| समस्या वहां पर आती है जब यह बेल का प्रावधान सेलेक्टिव लोगो के लिए ही आर्डर होता है| माननीय कोर्ट का पूरा सम्मान है पर सम्मान का मतलब यह नहीं की प्रश्न न किया जाए! प्रश्न मंशा पर नहीं है, प्रश्न है सेलेक्टिविटी का| 

अभी हाल में मनीष कश्यप को अरेस्ट किया गया था, उस पर कई सारे फर्जी केस डाले गये, NSA तक लगा दिया गया, जबकि ऐसा कोई मामला भी नहीं बनता| मनीष ने याचिका सुप्रीम कोर्ट में डाली, कोर्ट को महीने भर लगे याचिका सुनवाई के लिए टाईम देने में, जो कोर्ट मनीष से गम्भीर मामले में 2 घंटे के अंदर बेंच बैठा देती है और जो कोर्ट जब अवकाश नहीं होता तब 4 बजे के पहले ही बंद हो जाता है वह रात्रि 9:30 में खुलता है और सुनवाई करता है| इसे आप क्या कहेंगे?? आश्चर्य की बात ये भी है कि कोर्ट शनिवार रविवार को बंद रहता है| और आज शनिवार था|

माननीय न्यायालयों में साढ़े 4 करोड़ केस पेंडिंग हैं, जिनमें से 68000 केस केवल सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग हैं, लोग वकीलो को फीस भरभर कर प्रताड़ना के शिकार हो गये, पीढ़िया बीत गयी पर फैसला नहीं आया, आए दिन डेट बढ़ता है, पर सुनवाई नहीं होती|तारीख पे तारीख, तारीख पे तारीख, तारीख करते करते आम आदमी का जीवन खत्म हो जाता है, उनके बच्चे तारीक में कोर्ट के चक्कर काटने लगते हैं, पर न्याय है कि मिलता ही नहीं| माननीय न्यायालय को जिन मामलो में प्रो एक्टिव होना चाहिए वहां पर माननीय न्यायालय की आंखो में मरोड़े पड़ जाते हैं| 

अर्नब के मामले भी जमानत देने और तिथि देन में कोर्ट ने महीनो का समय लिया, अर्नब को प्रताणित किया गया, मनीष कश्यप को प्रताणित किया जा रहा है, पर माननीय कोर्ट आंखे बंद किए हुए है| किंतु जैसे ही विशेष लाबी के वकील  का केस मिला, चंद घंटो में बेंच बैठ गयी, इसे क्या समझा जाए, लोकतंत्र की जीत जिसमें लाबी के लिए अलग व्यवस्था और दूसरो लोगो के लिए अलग|

क्या कोर्ट संविधान के एकार्डिंग कार्य कर रहा है, यह भी प्रश्न है?? अगर हां तो क्या यह संवैधानिक या कानूनन है कि एक जैसे मामलो में एक को तुरंत जमानत और दूसरे को तिथियां बढ़ाते जाओ|

4.5 करोड़ पेंडिंग केसेस का क्या? क्या वो केवर रिटायर होने के उपरांत चिंता व्यक्त करने के लिए है?? 

माननीय सर्वोच्च न्यायालय पर बहुत से प्रश्न चिन्ह हैं?? 

#supremecourtofindia

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