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विश्व की अधिकांश समस्याओं की जड़ सम्पत्ति का असमान वितरण है

विश्व की अधिकांश समस्याओं की जड़ सम्पत्ति का असमान वितरण है। "ऑक्सफैम" के सर्वे के अनुसार देश एवं दुनिया के आधे लोगों के पास जितनी सम्पत्ति है उतनी अकेले शीर्ष के 8 लोगों के पास है। हमें उस कार्य प्रणाली को समझना होगा, जिसमे अमीर और अमीर तथा गरीब और गरीब होता जा रहा है। कॉर्पोरेट के चंदे से राजनैतिक दल चुनाव लड़ते हैं और फिर उनको लाभ पहुंचाने के लिए नीतियां बनाई जाती हैं। समाज में संगठन एवं विद्रोह न हो इसलिए वर्गों में विभाजित समाज में फूट डालकर उलझाया जाता है। और इसीलिए कहा जाता है कि- 'जब तक राजनैतिक सत्ता अच्छे लोगों के पास नहीं आयेगी तब तक सुधार होना असम्भव है।' देश एवं दुनिया में राजनैतिक बदलाव लाये बिना बड़े परिवर्तन नहीं हुए हैं। इसीलिए जिन्होंने राजनीति में कभी प्रत्यक्ष भाग नहीं लिया ऐसे महात्मा गांधी, विनोबा भावे, जयप्रकाश नारायण एवं अन्ना हजारे ने भी अपना कार्य क्षेत्र राजनीति को ही बनाया। राजनीति में होने वाली टांग खिंचाई, चमचागिरी, भाई-भतीजावाद, अपराध एवं धनबल का वर्चस्व जैसी बुराईयों से स्वाभिमानी एवं अच्छे व्यक्ति राजनीति से दूरी बनाये रखते हैं। उन्हें यदि सामाजिक कार्य करना है, तो सेवा कार्यों से जुड़ जाते हैं। ऐसे में राजनीति पूरी तरह से दुर्जन शक्ति के हाथ में चली जाती है। चुनावों में मतदाताओं को अच्छे व्यक्ति नहीं, बल्कि अपेक्षाकृत कम बुरे को चुनना पड़ता है और तब चुनाव नागनाथ एवं सांपनाथ के बीच हो जाता है। संविधान निर्माता डा. अम्बेडकर ने कहा था- "यह संविधान अच्छा भी है, और बुरा भी है।" महत्वपूर्ण यह है कि इसको लागू करने वाले लोग कौन से हैं? राजनीतिक कार्यों की आदर्श स्थिति में राष्ट्र सर्वप्रथम, पार्टी दूसरे एवं व्यक्ति का हित सबसे अंतिम वरीयता होनी चाहिए मगर हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। राजनीति में वंशवाद एवं परिवार की जागीर जैसे तर्ज़ पर पार्टियां चलाई जाती हैं, जो देश को भारतियों की अपेक्षा जातियों का अजायबघर बनाने में तुली हुई हैं। राजनीति को गंदा कहकर सामान्य व्यक्ति हाथ झाड़ लेता है, मगर राजनीतिक सत्ता की शक्ति से सम्पूर्ण देश प्रभावित होता है। ऐसे में तटस्थ रहना भी घोर अपराध हो जाता है, क्योंकि राजनीति मानव जीवन को सबसे ज्यादा प्रभावित करती है। अमेरिका एवं स्विटजरलैंड जैसे देश लोकतंत्र के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। इन देशों में नागरिक अपने समर्थक पार्टी को भरपूर 'डोनेशन' देते हैं, मगर भारत में शतप्रतिशत लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाली राजनीति के लिए सामान्य व्यक्ति का आर्थिक सहयोग एक प्रतिशत से भी कम है। ऐसे में पार्टियां कॉर्पोरेट के पैसे संचालित होती हैं और वो जिसका खाते हैं, उसी का बजाते हैं। इसीलिए नेताओं के भाषण जनता के पक्ष में तथा एक्शन कॉर्पोरेट के पक्ष में होता है। यही वजह है कि 1892 के अनुमान के अनुसार भारत में सबसे अमीर और सबसे गरीब के बीच ढाई गुना से ज्यादा का अंतर नहीं था, वहीं आज शीर्ष 100 लोगों के पास देश की सत्तर प्रतिशत सम्पदा पहुंच गई है। सरकार के कुल आय का 90 प्रतिशत टैक्स 15 प्रतिशत मध्यम वर्ग से वसूला जाता है, जिसमें से 80 प्रतिशत शीर्ष वर्ग को कॉर्पोरेट सब्सिडी के नाम पर दे दिया जाता है। 10 प्रतिशत निम्न वर्ग को लोक कल्याण के नाम पर देते हैं। दुखद पहलू यह है कि निम्न वर्ग, मध्यम वर्ग को एवं मध्यम वर्ग, निम्न को अपनी बदहाली के लिए दोषी समझता है, जबकि असल खेल ऊपर के लोग खेल रहे होते हैं, जिन पर किसी की दृष्टि नहीं जा पाती है और आपस में ही लड़ते रहते हैं। समाज को तोडऩे के लिए जाति, धर्म, नशा, विकृत मनोरंजन, भ्रष्टाचार जैसी अनेक समस्याएं खड़ी करके समाज को भ्रम में रखा जाता है। हालांकि ऐसा नहीं है कि राजनीति में अच्छे लोग नहीं हैं पर उन्हें पार्टी अनुशासन के कोड़े से हांका जाता है। उन्हें अपनी बात भी नहीं रखने दी जाती। लोकतंत्र पर पार्टीतंत्र हावी हो जाता है। धीरे-धीरे अच्छे लोग भी उसी रंग में रंग जाते हैं या क्षमतावान लोगों को पीछे कर दिया जाता है। अभी तक राजनैतिक सुधार के जो छुटपुट प्रयास हुए वह भी पूर्णरूपेण सफल इसलिए नहीं हो पाए, क्योंकि हमने एक व्यक्ति के भरोसे सम्पूर्ण भारत को बदलने का सपना देखा। यह कभी इंदिरा, कभी जयप्रकाश, कभी अटल, कभी अन्ना तो कभी नरेन्द्र मोदी रहे, मगर जब स्थानीय स्तर पर जब अच्छे लोग नहीं मिले तब पार्टी चलाने के लिए और चुनाव जीतने के लिए उन्हीं पुराने घिसे-पिटे नेताओं से ही काम चलाया गया। चुनाव चिन्ह बदलते रहे, चेहरे वही रहे। हालांकि प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध शोषण, धन पर कुछ लोगों को बढ़ता कब्जा एक विश्वव्यापी समस्या है और यह दुनिया को समाप्त होने की आंशका की ओर ले जा रही है। मगर भारत ने आशा की एक किरण इसीलिए दिखाई देती है कि भारत का मतदाता हमेशा सर्वश्रेष्ठ विकल्प चुनता है और जनसंचार माध्यमों की सशक्त नेटवर्क से अच्छी बातों को तेजी से प्रसारित किया जा सकता है। यदि सम्पूर्ण भारत के अच्छे लोगों के कार्य की जानकारी दी जाए तो समस्त सज्जन शक्ति को अखिल भारतीय स्तर पर एक प्लेटफॉर्म पर लाया जा सकता है। भारत में 543 लोकसभा, 4120 विधानसभा, 9 लाख बूथ एवं 90 करोड़ मतदाता हैं। यदि सर्वे एजेंसियां एवं समाजसेवी एक साथ आएं तो प्रत्येक बूथ से 10 सबसे प्रभावशाली लोगों का नाम निकालकर लगभग एक करोड़ लोगों के सैम्पल साइज सर्वे से योग्यतम प्रत्याशियों को चुनना असम्भव नहीं है। यह एक तरह से चुनाव के पहले चुनाव होगा जैसा कि अमेरिका में राष्ट्रपति के लिए समर्थकों के बीच आंतरिक लोकतंत्र की मजबूती के लिए चुनाव होते हैं। इससे पार्टी में शीर्ष नेताओं की तानाशाही कम होगी तथा सच्चे जनसेवकों को मौका मिलेगा धीरे-धीरे ही सही गैर राजनीतिक क्षेत्र से अच्छे लोगों को आना शुरू होगा। राजनैतिक शुचिता के लिए दो बार से अधिक चुनाव लडऩे, आयु, परिवार, आदि जैसे प्रतिबंध भी लगाये जा सकते हैं। इस सन्दर्भ में "माई इंडिया 2020" एक ऐसा ही कार्य कर रहा है। इस अभियान में जैसे-जैसे सैम्पल साइज बढ़ता जाएगा सर्वे के परिणाम उतने ही प्रमाणिक होते जाएंगे। इस अभियान में देश के अन्य सर्वेक्षण एजेंसी, समाजसेवी संस्थाएं, प्रबुद्ध नागरिक, अपना सुझाव एवं सहभागिता प्रदान करें, जिससे लोकप्रियता मापन का एक पारदर्शी मॉडल खड़ा हो सके।

साभार
सूरज नारायण पाण्डेय
लेखक, विचारक, समाजिक कार्यकर्ता 

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