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समान नागरिक संहिता क्यो आवश्यक है समान नागरिक संहिता लागू होने से क्या परिवर्तन होंगे ? क्या जल्द लागू हो सकता समान नागरिक संहिता पढ़ें विस्तृत रिपोर्ट
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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बड़े आश्चर्य की बात आती है जिसमें समानता की बात आती है उसमें संप्रदायिकता है और संप्रदाय सापेक्ष नियम की बात आती हो वो धर्मनिरपेक्षता है ये विचित्र विडंबना पूर्ण व्याख्याए लोकतंत्र की सबसे बड़ी समास्या है मुख्यता बात यह है समान नागरिक संहिता का हिंदू मुस्लिम से कोई लेना देना नहीं है । मुस्लिम पर्सनल लॉ 1939 में लागू हुआ समान नागरिक संहिता के विषय पर 23 नवंबर 1948 में संविधान सभा में डॉ अंबेडकर ने कहा की मुझे इस बात का आश्चर्य क्यों नहीं देश में एक समान कानून होना चाहिए उन्होंने ने एक शब्द बोला था 1939 से 10 साल पहले सभी के लिए एक समान कानून थे वहां पर भी लागू थे । जो हिस्से आज के बांग्लादेश पाकिस्तान में चले गए यह सब अंग्रेजों के फूट डालो राज करो की नीति के तहत हुआ था ।
अंग्रेजों ने एक देश में दो कानून इसलिए बनाए थे जिससे हिंदू समाज की पारिवारिक सामाजिक आर्थिक और अध्यात्मिक व्यवस्था ध्वस्त किया जा सकें जिससे हिंदू समाज कभी एक होकर प्रतिकार न कर पाए मुसलमानों को विशेषाधिकार इसलिए दिए गए जिसमें हिंदू समाज के ऊपर प्रेशर बनाए रखा जा सके क्योंकि उन्हें मुस्लिम पॉलिटिक्स हिंदू समाज को प्रेशर में रखने के लिए करनी थी और अंग्रेज आज मुस्लिम या अल्पसंख्यक प्रताड़ित है यह कहकर भारत सरकार पर दबाव बनाने का प्रयत्न करते हैं। क्योंकि हिंदू समाज सामाजिक आर्थिक पारिवारिक आध्यात्मिक रूप से बहुत कमजोर हो चुका है मुस्लिम समाज की स्थिति बहुत मजबूत है इसलिए उनके इशारे पर मुस्लिम समाज सड़क पर आ सकता है और भारत को आग हवाले कर सकता है इसलिए अंग्रेजों ने उनके पाले हुए काले अंग्रेजों ने मुस्लिम समाज का विशेषाधिकार समाप्त करने का कभी प्रयत्न नहीं किया न आज भी करने का साहस है ।
समान नागरिक संहिता की पृष्ठभूमि
आज के समय हिन्दूओ के लिए हिंदू विवाह अधिनियम 1955 लागू है जबकि मुसलमानो के लिए वर्ष 1937 में अंग्रेजे द्वारा मुस्लिम पर्सनल लॉ लागू किया गया था । जिसके अनुसार मुस्लिमो को विवाह उतराधिकार के विषयों पर शरीयत के अनुसार चलने की अनुमति दी गई। एवं भारत में अपराधिक क्षेत्र में नागरिको को एक समान कानून लागू होते हैं । परंतु विवाह संपत्ति और उतराधिकार के संबंध में अलग अलग धर्मालंबियों के लिए पृथक पृथक कानून बनाए गए । सनातन हिन्दू धर्म के अनुयायियों के लिए विवाह उतराधिकार के लिए हिंदू कोड बिल 1955 है । जो सिक्ख बौद्ध जैनों पर समान रूप से लागू होती है। लेकिन तथाकथित पंथनिरपेक्ष राष्ट्र में ईसाई के लिए विवाह और उत्तराधिकार के लिए अलग नियम है मुसलमानों के लिए विवाह और उत्तराधिकार के लिए अलग नियम है । जिसके अनुसार कोई मुस्लिम व्यक्ति चार महिलाओं के साथ विवाह कर सकता है मुस्लिम पर्सनल लॉ 1937 के अनुसार तलाक दी गई महिलाओं को पति से गुजारा भत्ता प्राप्त करने का अधिकार नहीं है । इन अलग कानूनो को समाप्त करके सभी भारतीय नागरिको के लिए एक समान कानून होना चाहिए जिसमें विवाह उतराधिकार एवं तलाक प्रावधान नियंत्रित हो । कहने को देश पंथनिरपेक्ष लेकिन आज भी धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव किया जाता है । क्योंकि वोट बैंक की राजनीति को राष्ट्रनीति के ऊपर प्राथमिकता दी जाती है । संविधान के अनुच्छेद 44 में देश के सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून की बात की गई लेकिन वोट बैंक और तुष्टीकरण की राजनीति के कारण स्वतंत्रता के 75 वर्ष के बाद भी समान नागरिक संहिता लागू नहीं हो पाई ।
समान नागरिक संहिता पर सर्वोच्च न्यायालय के अहम निर्णय कांग्रेस की वोट बैंक की राजनीति
शाहबानो नामक मुस्लिम महिला को उसके पति द्वारा तलाक दे दिया गया था , परिणामस्वरूप शाहबानो ने प्रदेश उच्च न्यायालय में अपने पति को गुजारा भत्ता देने के लिए याचिका दायर की । पति ने न्यायालय में कहा मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अनुसार पत्नी को गुजारा भत्ता देने का प्रावधान नहीं है , अपराधिक संहिता में महिलाओं को गुजारा भत्ता प्राप्त करने का प्रावधान है मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने शाहबानो गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया । न्यायालय के अनुसार आपराधिक प्रक्रिया संहिता पर्सनल लॉ से अत्यधिक महत्वपूर्ण है । क्योंकि यह मामला महिला अधिकार से संबंधित है जिसे मज़हब के आधार पर मजहबी रंग देना तार्किक नहीं है । मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में में चुनौती दी गई । सर्वोच्च न्यायालय ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के निर्णय को वैधानिक माना । सर्वोच्च न्यायालय ने 1986 में सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया था । भारत में समान नागरिक संहिता को लागू करना अति आवश्यक है । परंतु अशराफ मौलाना वर्ग को सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय मान्य नहीं था उन्होंने तत्कालीन राजीव गांधी की सरकार के उपर इतना दबाव बनाया गया की राजीव गांधी की सरकार अशराफ मौलाना वर्ग के सामने घुटने टेक दिए । सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को संसद में अपराधिक प्रक्रिया संहिता में संशोधन विधेयक लाकर पलट दिया । इस संशोधन विधेयक में यह प्रावधान था मुस्लिम महिला तलाक के बाद अपने पति से गुजारा भत्ता नहीं प्राप्त कर सकती है । कांग्रेस की तुष्टिकरण की राजनीति के कारण समान नागरिक संहिता आज तक लागू नहीं हो पाया क्योंकि समान नागरिक संहिता लागू करने से वोट बैंक की राजनीति प्रभावित होती है इसलिए समान नागरिक संहिता लागू करने का साहस किसी तत्कालीन सरकारों ने नहीं किया है।
समान नागरिक संहिता लागू होने क्या परिवर्तन होंगे
पंथ निरपेक्ष राज्य की अवधारणा को साकार रूप मिल सकता है।
पंथनिरपेक्ष संविधान का आधारभूत ढांचा है और पंथनिरपेक्ष देश में धर्म और पंथ के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव अतार्किक प्रतीत होता है फिर भी स्वतंत्रता के 75 वर्षों के बाद भी धर्म और पंथ के नाम पर भेदभाव किया जा रहा है । सर्वोच्च न्यायालय ने शाहबानो मामले मे निर्णय देते हुए स्पष्ट कह दिया था भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता शरीयत के विरोध की स्थिति निर्मित करती है इसलिए भारत में समान नागरिक संहिता आवश्यक है । लेकिन वोट बैंक की राजनीति के समान नागरिक संहिता लागू नहीं हो पाई ।
समान नागरिक संहिता महिला सशक्तिकरण के लिए एक बड़ा कदम हो सकता है
सर्वोच्च न्यायालय में शाहबानो बनाम सरला मुदगल मैं स्पष्ट कहा कि महिला सशक्तिकरण के लिए समान नागरिक संहिता अति आवश्यक है इसलिए तीन तलाक के प्रवधान को असंवैधानिक घोषित करते हुए कहा कि यह अधिकार बस पुरुषो को प्राप्त है । समान नागरिक संहिता लागू होने से मुस्लिम समाज में व्याप्त बहु विवाह जैसी कुप्रथाओं का उन्मूलन हो सकेगा और मुस्लिम समाज की महिलाएं भी मुख्यधारा में आने लगेंगी जिससे मुस्लिम समाज की महिलाओं को शिक्षा और रोजगार के नए अवसर प्राप्त होंगे पुरुषवादी मानसिकता से उन्हें मुक्ति मिलेगी । इसलिए समान नागरिक संहिता महिला सशक्तिकरण के लिए बहुत बड़ा कदम हो सकता है ।
क्या समान नागरिक संहिता से भारत की विविधता हो सकती है ।
भारतीय समाज अत्यधिक विविधता पूर्ण है पूर्वोत्तर राज्यों में नागालैंड ,असम मेघालय त्रिपुरा वा मिजोरम में भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता कानून के प्रथम लागू नहीं होते हैं वैवाहिक विधियों का निर्धारण स्वयं करते हैं जो जनजातियों परंपराओं पर आधारित है । इसलिए भारत जैसे विविधता पूर्ण समाज में एकता का यह आशय है अनेकता में एकता अतः इन विविधता को ध्यान रखते हुए समान नागरिक संहिता ड्राफ्ट तैयार जाए किया जाए तो समान नागरिक संहिता लागू करने में कोई परेशानी नहीं आएगी ।
समान नागरिक संहिता पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संबोधन के बाद नई बहस छिड़ गया क्या जल्द लागू होगा समान नागरिक संहिता ?
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा भोपाल के एक कार्यक्रम में समान नागरिक संहिता का विषय उठाते हुए यह कहा क्या एक घर में दो विधान हो सकते हैं इसके बाद समान नागरिक संहिता पर बहस छिड़ गई 13 जुलाई तक समान नागरिक संहिता पर विधि आयोग ड्राफ्ट तैयार करके सरकार को समिट कर सकता है । राजनैतिक चर्चाओं का बाजार गर्म संभावना जताई जा रही है इसी मानसून सत्र में समान नागरिक संहिता का विधेयक संसद में पेश हों सकता है ।
दरअसल समान नागरिक संहिता लाने की तैयारी तेज हो गई है. 22 वें विधि आयोग (लॉ कमीशन) ने समान नागरिक संहिता पर आम जनता से विचार विमर्श की प्रक्रिया शुरू कर दी है. आयोग ने जनता, सार्वजनिक संस्थान और धार्मिक संस्थानों व संगठनों के प्रतिनिधियों से एक महीने में इस मुद्दे पर राय मांगी है
इससे पहले पिछले विधि आयोग ने 2016 में इस मुद्दे पर गहन विचार विमर्श प्रक्रिया शुरू की थी. 21वें विधि आयोग ने 2018 मार्च में जनता के साथ विमर्श के बाद अपनी रिपोर्ट में कहा था कि फिलहाल समान नागरिक संहिता यानी कॉमन सिविल कोड की जरूरत देश को नहीं है. लेकिन पारिवारिक कानून यानी फैमिली लॉ में सुधार की बात जरूर की थी
जय श्री कृष्ण
दीपक कुमार द्विवेदी
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