सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

सुप्रीम कोर्ट जो न संविधान मानती है, न अपने द्वारा किए गये फैसलो का आधार, दोगलापन मतलब दोहरा रवैया,,,


एक बार पुनः सुप्रीम कोर्ट अपनी बकच#&! के लिए चर्चा में है, वैसे तो यह आम बात है| जजो की बकैती देखकर कभी कभी मन में आ जाता है कि ये लोग न्यायाधीश कम नेता ज्यादा लगते हैं| जैसे देश के कुछ चमन बेवकूफ नेता बिना तथ्यों, तर्को के आधार पर न्यूज में बने रहने के लिए बयानबाजी करते हैं वही स्थिति न्यायाधीशो की हो चली है|

अब तो लगने लगा है कि इस बार के लोकसभा इलेक्सन में सुप्रीम कोर्ट कहीं यह न कह दे की हम भी चुनाव लड़ेंगे, पार्टी कलेजियम है ही| पर कुछ लोग कहेंगे की चुनाव लड़ने की क्या आवश्यकता है, DY Chanduchur के नेतृत्व में 7 जजो की बेंच बैठालकर कह देंगे की हम 100 या 200 जो भी बहुमत के लिए आवश्यक हों को लोकसभा में मनोनीत करते हैं| फिर भी कुछ लोग कहेंगे कि इसकी क्या जरूरत है ऐसे एनार्की दिख जाएगा, कुछ ऐसा फैसला करते हैं कि लोगो को लगे लोकतंत्र की रक्षा कर रहे हैं| 

वह तो यह मी कह सकते हैं "पीठ यह फैसला सुनाती है कि लोकतंत्र में प्रधानमंत्री पक्ष या विपक्ष का नेता नहीं होता वह पूरे देश का नेता होता है, इसलिए लोकतंत्र के रक्षात्र 10 वर्षो से एक व्मक्ति का शासन में रहना अच्छा सिग्नल नहीं है, अतः पीठ इस फैसले पर पहुंची है कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा इसका निर्णय हमारी कलेजियम से होगा| यही संविधान सम्मत है क्योंकि कलेजियम ही मूल धांचा है..


आइये फालतू बाते छोड़कर मुद्दे पर आते हैं, तो बात है 2017 , 24 जुलाई की एक NGO कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार की लिखित याचिका पर जस्टिस चंद्र चूण और जस्टिस मिश्रा सुनवाई करते हैं, और याचिका निरस्त कर देते हैं यह कहकर कि घटना 1989-90 में हूयी थी 27 वर्ष हो गये| आगे कहते हैं कि "No fruitful purpose would emerge as evidence is unlikely to be available  at this late juncture."

आश्चर्यजनक बात यह है कि यहि जस्टिस मिश्रा 1884 में सिख भाईयो के साथ 34 वर्ष पहले हुए नरसंहार पर 11 jn, 2018 को सुनवाई करते हुए SIT गठित कर देते हैं|
दो एक जैसे मामले, सेम जज, पर फैसला अलग, इसे क्या समझा जाना चाहिए| 


एक बार और सुनवाई के दौरान कहा जाता है, कि जो मामला आप लेकर कोर्ट आए हैं यह purely executive का मामला है| आपको भारत सरकार के पास जाना चाहिए|

महत्वपूर्ण यह है कि आतंकी गतिविधियों को गंभीरता से लेते हुए, ताकि उन पर कार्यवाही की जा सके भारत की संसद धारा 370 को हटाती है, उसके बाद आतंकियों का आतंक कम हुआ है| जो कि कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार पर कार्यवाही के लिए महत्वपूर्ण कदम है, पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई के लिए तैयार हो जाता| इनके पास विस्थापित हिंदुओं के लिए समय नहीं है, पर जिस याचिका निरस्त कर देना चाहिए उस याचिका पर सुनवाई के लिए भरपूर समय है| 

टीस्ता सीतलवाड़ को बेल एक दिन में मिल जाती है, रात्रि  10 बजे तक कोर्ट खुला रहता है, किंतु मनीष कश्यप की बेल माचिका पर सुनवाई करने का समय नहीं मिलता जबकि मनीष के मुकाबले टीस्ता का अपराध संगीन है| 

वैसे तो बहुत से केस हैं, एक जजमेंट जिसमें 4 वर्ष की बच्ची के बालात्कारी के लिए कहा जाता, "Every sinner has Future" , पर वंशानुगत व्यवस्था से बने इन न्यायाधीशो से कोई पूछे कि क्या उस 4 वर्ष का मासूम का कोई भविष्य नहीं जिसे इस दरिंदे बालात्कार करके मौत के घात उतार दिया| ऐसे मामले तो बहुत हैं, पर खैर,,,,,,,,,  कर भी क्या सकते हैं| 

#supremecourtofindia

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