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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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सिरसा 7 जुलाई 1987 की शाम मौसम बड़ा सुहाना था और थोड़ी थोड़ी बूंदाबांदी हो रही थी । सिरसाबस स्टैंड से लगभग 7:15 पर दिल्ली के लिए दुर्भाग्यशाली बस रवाना होती है । बस की सवारियों को ये पता ही नही था कि वो आज घर ही नही पहुँचने वाले । बस में सिरसा से फतेहाबाद डेली अप-डाउन करने वाले काफी यात्री मौजूद थे ।
हरयाणा रोडवेज की इस बस को ड्राइवर जगदीश चला रहा था और रामफल कंडक्टर था । कंडक्टर बार बार आवाज दे रहा था कि ये बस डिंग से पहले नही रुकेगी, पर उस बेचारे को क्या पता था कि डिंग में ही आतंक के सौदागर उनका इंतजार कर रहे थे । इन आतंकवादियों के पास हनुमानगढ़ से लूटी हुई जीप थी जो उन्होंने डिंग से ही बस के साथ लगा ली ।
दरियापुर पार करते ही जीप ने बस को क्रॉस किया और जीप को बस के आगे लगा दिया । ड्राइवर जगदीश ने इनको नशेड़ी समझ झुंझला कर बस रोक दी । जब तक जगदीश इनको कुछ बोलता आतंकियों ने बस के शीशे ओर फायर झोंक दी । ड्राइवर की पहले ही आक्रमण में मौत हो गयी । किस्मत से कंडक्टर रामफल पिछली खिड़की पर टिकट काट रहा था तो वो गोली की आवाज सुनते ही भाग खड़ा हुआ । आतंकियों ने उस पर भी गोली चलाई पर उसकी किस्मत गोली से तेज निकली और वो बच निकला ।
KCF के 20-21 साल के युवा आतंकी (माचिस फिल्म टाइप) बस में घुस गए और हिन्दू पुरुषों को अलग होने का आदेश दिया । महिलाओं से गहने लूटने थे और पुरुषों को खत्म करना था । सभी पुरुषों से कैश और महिलाओं से गहने लूटने के बाद पुरुषों के उपर अंधाधुंध फायर खोल दिया गया । चीख पुकार मच गई और लोग गिरने लगे । बस में खून की नदी बहने लगी । महिलाएँ रो रही थी, उनके सुहाग उनकी आँखों के सामने उजड़ रहे थे । वो कुछ नही कर सकती थी क्योकि मदद के लिए दूर दूर तक कोई नही था ।
तभी फतेहाबाद से सिरसा जाने वाली एक और बस वहाँ से गुजरती है । बस के ड्राइवर को लगा कि शायद सामने से आने वाली बस खराब हो गयी है और उसे कुछ मदद चाहिए हो सकती है । वो बस को धीरे करते हुए रोकने लगता तो अचानक से बस के पीछे से गोलियों की आवाज आती है । आतंकियों ने सिरसा जाने वाली बस पर भी आक्रमण कर दिया । पिछली सीट पर बैठी 4 सवारी औंधे मुहँ बस के फर्श पर आ गिरती है । बस के ड्राइवर को माजरा समझ आ जाता है और वो बस को भगा ले जाता है । उस बस में बैठी सवारियों की किस्मत बढ़िया निकली जो बस थोड़ी आगे रुकी और गोलियां पीछे से चली । अगर सामने से गोलियां चलती तो इस बस का हाल भी सिरसा दिल्ली वाली बस जैसा होता ।
आंतकी इसके बाद भी लाशों पर गोलीबारी करते है और जब उन्हें लगता है कि सब मर गए तो वो जीप में बैठकर निकल जाते है । आतंकियों के जाने के बाद के दृश्य और ज्यादा भयावह था । घायल लोग चीख पुकार कर रहे थे मदद के लिए पर मदद करने वाला दूर दूर तक कोई नही था । मोबाइल उस जमाने मे थे नही और आतंकवाद के डर से रातों को सड़के सुनसान रहती थी । जिन स्त्रियों के पति मर चुके थे वो चीख ही रही थी पर जिसके सामने उसका पति तड़प तड़प कर दम तोड़ रहा था उसके हाल की तो कल्पना करने से ही सिहरन हो उठती है ।
ऐसे में एक 17-18 साल का युवक जिले सिंह उठता है और ड्राइवर सीट से जगदीश की लाश को उठाकर एक तरफ करता है । जिले सिंह ने बस कभी नही चलाई थी पर मरता क्या न करता । ट्रैक्टर के अनुभव से उसने बस को निकालने की ठानी और धीरे धीरे बस को फतेहाबाद की तरफ ले चला । बस को फतेहाबाद नागरिक अस्पताल ले जाकर उसने डॉक्टरो की सूचना दी । तब तक ये खबर शहर में फैल चुकी थी । लोग बदहवास होकर अस्पताल की तरफ दौड़े और अपनों को ढूंढने लगे । पर ढूंढना आसान न था, लाशें एक के उपर पड़ी थी । धीरे धीरे युवक इकट्ठे हुए और एक एक करके 35 लाशें निकाली गयी ।
#smriti_lest_we_forget
पर याद कौन रखे ? पँजाब हरयाणा के हिन्दू तो शायद अब इसका जिक्र भी नही करते । 1978 से लेकर 1992 तक 40000 हिन्दुओ की हत्याओ का 14 साल का सिलसिला ऐसे भुला दिया गया जैसे कुछ हुआ ही न हो । पोलिटिकल करेक्टनेस के चलते सिर्फ एक विशेष साल और महीना याद करते है लोग, बाकी के 13 साल का आतंकी दौर किसी को याद नही । इतिहास गवाह है कि जो कौम अपने घाव स्वयं याद नही रखती उसके दर्द का कोई जिक्र भी नही करता ।
✍️ Nikhilesh Shandilya
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