सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

आधुनिक न्याय व्यवस्था और सनातन न्याय व्यवस्था की समीक्षा,

आजकल की लोकतांत्रिक अन्याय व्यवस्था और सनातन न्याय व्यवस्था के बारे विचार करने ‌पर ही इस बात का कारण ज्ञात होगा कि क्यों आजकल लोग संस्कृत, वेद आदि पढ़ने-पढ़ाने में रुचि नही लेते। 
कभी आचार्य चाणक्य ने कहा था कि जो संस्कृति लोक व्यवहार में नही होती वह समाप्त हो जाती है। तो क्या आज हमारी संस्कृति,हमारे वेद और दर्शन इत्यादि हमारे व्यवहार में शामिल हैं तो उत्तर है बिल्कुल ही नहीं।
क्या कारण हैं कि हमारे वेद दर्शन संस्कृति आदि हमारी प्रतिदिन के जीवन में शामिल नही है,
चाणक्य का कहना था कि अगर तुम्हारी संस्कृति और तुम्हारा पतन हो रहा है तो उसके कारण तुम स्वयं हो।
अगर तुम्हारी संस्कृति महान थी तो उसका पतन क्यों हो गया। 
तुम्हारे पतन का कारण तुम स्वयं हो I
अगर हमें लगता है कि हमारी संस्कृति महान है तो उसको जी कर भी दिखाना भी होगा किसने रोका है सभी को।यही पालन ही सारी समस्यायों का हल भी है । 
तो इसके लिए हमें वर्तमान की आयातित सामाजिक और न्याय व्यवस्था के सामने अपनी सनातन न्याय व्यवस्था का मॉडल रखना होगा ।
हम कहीं ना कहीं हम सनातन व्यवस्थायों का आजकल की व्यवस्थाओं के साथ तुलनात्मक माडल रखने में असफल रहें हैं। 
हम हमेशा आजकल की न्याय व्यवस्था की कमियां निकालते रहते हैं लेकिन हम कभी सनातन न्याय व्यवस्था की बातें करते हैं पर उस व्यवस्था का हु-ब-हू मॉडल पेश ही नहीं कर पायें हैं।
हमारे सनातन मॉडल चाहे कि वह न्यायिक व्यवस्था पर हो,या शिक्षा व्यवस्था पर ,या वह इन्वेस्टमेंट मॉडल हो ,या गवर्नेस का मॉडल, या टैक्सेशन का मॉडल चाहे ,सरकार चुनने का, जमीन का प्रबंधन का मॉडल हो चाहे या सामाजिक व्यवस्थाओं का मॉडल और फूड प्रोसेसिंग का मॉडल , सभी मॉडल मौजूद हैं और वर्तमान में प्रचलित आजकल की व्यवस्थाओं से कहीं अच्छे और ऐतिहासिक दृष्टि से सिद्ध प्रमाणित है इन सारी सनातन व्यवस्थाओं के कारण सनातन भारत लगातार 10000 वर्षों तक दुनिया का विश्व गुरु और अमीर देश रहा है | 
हमें इन सब मॉडलों का अध्ययन करना पड़ेगा और उनको पुनः स्थापित करना पड़ेगा जैसे कि हमने आजकल की एलोपैथी मॉडल के सामने अपना सनातन वैदिक आयुर्वेदिक मॉडल दुनिया के सामने रखा है।
हमने आजकल की एलोपैथी मॉडल के सामने अपना सनातन योग चिकित्सा व आयुर्वेद का मॉडल रखा दुनिया तो एलोपैथी से निराश वहां से स्वास्थ्य पा कर आयुर्वेद और योग की ओर मुड़ने लगे |
अब इससे हुआ यह कि सभी लोगों को आयुर्वेद और योग आदि को समझने के लिए हमारी संस्कृति और शास्त्रों को समझने पढ़ने में रुचि जागने लगी।
एक विदेशी व्यक्ति ने आयुर्वेद और योग के माध्यम से अपनी किसी असाध्य बीमारी का इलाज कर लिया था जिसके लिए एलोपैथ ने‌ हाथ खड़े कर लिए थे।
 फिर उस व्यक्ति की रुचि जागी कि यह योग और आयुर्वेद आया कहां से है तो उसे पता लगा कि यह योग और आयुर्वेद सनातन वैदिक धर्म की देन है ,तो तो उसने संस्कृत भाषा सीख कर हमारे पुरातन ग्रंथों का अध्ययन शुरू कर दिया और सनातन जीवन पद्धति को ही अपना लिया।
कहने का तात्पर्य यह है कि हमें दुनिया के सामने अपने मॉडल रखने होंगे और यह हो सकता है मात्र उन व्यवस्थाओ को जी कर ही।
शोषक पूंजीवादी व्यवस्थाओं का विकल्प देना पड़ेगा जब पूंजीपति व्यवस्थाओं से त्रस्त लोगों को एक पोषक व सुमित्र व्यवस्थाओं का सुगठित सहारा मिलेगा तो वह स्वयं अपने आप सनातन व्यवस्थाओं का चुनाव करेंगे।
और एक प्रतिभाशाली पोषक संस्कृति की सर्वमान्य स्वीकारिता भी होगी।

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