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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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गोलाहाट नरसंहार - 13 जून 1971
एक ट्रेन जो भारत न आ सकी 😤
13 जून की सुबह जब पाक सेना के जवानों ने उन 187 मारवाड़ियों को ये कहाँ कि हम तुम्हे मारना नही चाहते, तुम्हे मार कर हमारा कोई फायदा नहीं है, तुम लोग भारत जा सकते हो, हम तुम्हे सुरक्षित रास्ता देंगे । तो जैसे इन धनाढ्य वयापारी परिवारों को जैसे नया जीवन सा मिल गया और ये लोग तुरंत अपने परिवारो को लेने चल दिये । उन्हें आस थी कि जिस हिन्दू भूमि को ये को ये अपने जमे जमाये व्यापार के चलते 1947 में ठुकरा चुके थे अब वही इनकी जान बचेगी । अगले एक घण्टे में 187 लोगो की सँख्या बढ़कर लगभग 450 हो चुकी थी जिसमे सभी परिवारों के स्त्री और बच्चे भी थे । अब भेड़ियों के सामने 450 बकरियां हो गई थी और भेड़िए खुश थे कि ये हिन्दू अब भी कितने नादान है कि हमने कहाँ कि और भोजन ले आओ हमारे लिए और ये ले आये । भेड़ियों की आँखे चमकने लगी थी । और इन हिन्दुओ को ये एहसास भी नही था कि इनके साथ क्या होने वाला है ।
ये 450 लोगो का समूह सैदपुर के उन प्रभावशाली धनाढ्य लोगो का था जो शहर की आर्थिक व्यवस्था की रीढ़ थे । सैदपुर बांग्लादेश के रंगपुर डिवीजन के निलफामारी जिले में स्थित एक रेलवे शहर और एक व्यापार केंद्र है । यह परबतीपुर के पास स्थित है, जो अविभाजित भारत में एक महत्वपूर्ण रेल जंक्शन था, जो पूर्वोत्तर को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता था। व्यापार की संभावना से आकर्षित मारवाड़ी लोग भारत के विभाजन से बहुत पहले सैदपुर शहर आकर बस गए थे । कुछ समय बाद मारवाड़ी स्थानीय बंगाली आबादी का हिस्सा बन गए और समाज के विकास में इन्होंने भरपूर योगदान दिया । उनमें से बहुतों ने तो अपने सामाजिक कार्यों के कारण समाज में एक सम्मानित स्थान अर्जित किया था ।
इनमे से ऐसा एक था अग्रवाल परिवार जिसके मुखिया श्री तुलसीराम अग्रवाल जी ने 1911 में तुलसीराम गर्ल्स हाई स्कूल की स्थापना की थी । 1947 के विभाजन में इनके पास भारत जाने का विकल्प था पर इन मारवाड़ियों ने भारत जाने की बजाय पूर्वी पाकिस्तान में वापस रहने का विकल्प चुना । जब पूरे शहर पर अपने पैसे की धाक हो तो फिर भारत जाकर फिर से क्यो काम खड़ा करना । जिस वक्त उन्हें घर, धन और वयापार महत्वपूर्ण लग रहा था उस वक्त उन्हें अंदेशा भी नही था कि आगे काला नही बल्कि लाल अंधेरा है । उधर 1947 में जनसँख्या की अदला बदली के चलते उत्तरप्रदेश और बिहार हजारों उर्दू भाषी जिहादी सैदपुर में आकर बस गए और नगर में अब इनकी सँख्या बढ़कर 75% हो गयी । वो शुरुआत में तो इन मारवाड़ियों के यहाँ आकर मजदूर ही लगे थे पर उनकी दृष्टि हमेशा से उनकी संपत्ति और स्त्रियों पर थी ।
1971 के तथाकथित मुक्ति संग्राम में भी क्रांति के नेता मुजीबुर्रहमान के अपने लोगो ने पाकिस्तान का साथ दिया क्योकि उनके लिए मजहब बड़ा था न कि बंगाली संस्कृति ।75% उर्दू आबादी के चलते सैदपुर पाकिस्तानी सेना के लिए एक मजबूत कैम्प बन गया था क्योकि वहां से उन्हें पीस पार्टी के लिए अच्छी भर्ती मिली थी । 12 अप्रैल को, इन्ही पाक समर्थक जिहादियों ने रंगपुर छावनी के पास, निस्बतगंज में प्रतिष्ठित मारवाड़ी नागरिकों तुलसीराम अग्रवाल, यमुना प्रसाद केडिया और रामेश्वर लाल अग्रवाल की हत्या कर दी गयी । ये वो लोग थे जिन्होंने सैदपुर के लिए अकेले इतना काम किया था जितना हजारो जिहादी नही कर सकते थे । इन हत्याओं से मारवाड़ी समुदाय में खलबली मच गई और उन्होंने पलायन शुरू कर दिया तो उनके घरों को उर्दू भाषी बिहारी मुसलमानों ने लूट लिया ।
1 जून को, पाकिस्तानी कब्जे वाली सेना ने 185 मारवाड़ी पुरुषों को बंधक बना लिया और उन्हें सैदपुर छावनी में पहुँचाया । पाकिस्तानियों का नेतृत्व स्थानीय बिहारी नेताओं ने किया था। पाकिस्तानी सेना के मेजर गुल ने उन्हें सैदपुर एयरबेस के नवीनीकरण और सैन्य उद्देश्यों के लिए खाइयां खोदने में लगाया । कुछ दिनों बाद, मेजर गुल ने कहा कि वह उन्हें हल्दीबाड़ी में सीमा चौकी के माध्यम से भारत भेजेगा । इस बीच, 5 जून को, पाकिस्तानी कब्जे वाली सेना ने घोषणा की कि सैदपुर के हिंदुओं को चिल्हाटी सीमा के माध्यम से पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले में भारत के लिए एक सुरक्षित मार्ग प्रदान किया जाएगा ।
13 जून की सुबह करीब 6 बजे 185 कैदी जिहादियों पर विश्वास करके अपने परिवारों को भारत कॉण्य के लिए ले आये पाकिस्तानी सैनिकों और बिहारी मुसलमानों ने भीड़ को पुरुषों और महिलाओं में बांट दिया। सैदपुर रेलवे स्टेशन पर सुबह 8 बजे एक विशेष ट्रेन आई थी। उन्हें पुरुषों और महिलाओं के लिए दो-दो अलग-अलग डिब्बों में बिठाया गया। दरवाजे और खिड़कियो को बाहर से बंद कर दिया गया । बोर्डिंग के दौरान सभी युवा महिलाओं को पाकिस्तानी सैनिकों ने अपनी हिरासत में ले लिया जिन्हें बाद में सेक्स स्लेव (#गोनिमोटर_माल) बनाने के लिए सैदपुर छावनी ले जाया गया ।
लगभग 10 बजे विशेष ट्रेन ने भारत की ओर अपनी यात्रा शुरू की। यात्रा शुरू होने के तुरंत बाद, सैदपुर रेलवे स्टेशन से दो किलोमीटर दूर, सैदपुर शहर के बाहरी इलाके में गोलाहाट में एक रेलवे पुलिया पर ट्रेन अचानक रुक गई। डिब्बों के दरवाजे खोल दिए गए और बिहारी मुसलमान चमकते रामदाओ (तलवार) लिए डिब्बे में दाखिल हो गए। पूरा इलाका स्वचालित हथियारों से लैस पाकिस्तानी सेना से घिरा हुआ था।
सभी हिन्दुओ को संगीनों और रामदाओ से काटा जा रहा था तड़पा तड़पा कर तो कुछ पीड़ितों ने गोली मारकर जान लेने की मांग की, लेकिन उन्हें बूट से रौंदा गया । सैनिकों ने उनसे कहा था कि पाकिस्तान सरकार अपनी महंगी गोलियां मलौंस (गैर-मुसलमानों के लिए अपमानजनक शब्द) पर बर्बाद नहीं करेंगे । पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को एक-एक करके बाहर निकाला गया ।
पाकिस्तानी सेना और उनके मुस्लिम सहयोगियों (अल बदर, रजाकार, पीस पार्टी, जमाते इस्लामी आदि) ने संगीनो से हमला कर के उन्हें मौत के घाट उतार दिया । जो बच्चे डर के मारे रो रहे थे, उन्हें या तो रेल की पटरियों पर पटक दिया गया या हवा में उछाल दिया गया और फिर संगीनों से पकड़ लिया गया । बाद में शवों को रेलवे ट्रैक के दोनों ओर एक वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में घुटने के गहरे छेद में दफन कर दिया गया था । नरंसहार में बचे लोगों ने कहा, उन शहीदों को ज्यादातर गीदड़ और कुत्ते खा गए थे ।
#बंगाली_हिन्दू_नरंसहार
✒️ निखिलेश शांडिल्य
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