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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
पूर्वी पाकिस्तान से बांग्लादेश बनने की एक साल की यात्रा में एक धर्म, एक संस्कृती के रूप में जो हमने खोया उसका विवरण
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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काफी लोगो को ये लगता है कि हमने 1971 का युद्ध बड़ी जोर शोर से जीता था तो उन्हें थोड़ा और अध्ययन / रिसर्च करने की आवश्यकता है कि किसी समाज और देश की जीत की परिभाषा क्या होती है और हार किसे कहते है ।
पूर्वी पाकिस्तान से बांग्लादेश बनने की एक साल की यात्रा में एक धर्म, एक संस्कृती के रूप में जो हमने खोया उसका विवरण ।
1. बंगाली हिन्दूओ की हत्या - 35 लाख
2. हिन्दू महिलाओं के बलात्कार - 4 लाख
3. बलात्कार पीड़ित हिन्दू महिलाओं के गर्भपात - 1 लाख 70 हजार
4. बलात्कार से पीड़ित हिन्दू महिलाओं के गर्भ से जन्म लिए वार चाइल्ड - 30 हजार
5. बंगाली हिन्दुओ का पूर्वी बंगाल से पलायन - 1 करोड
6. युद्ध मे खोए भारतीय सैनिक - 4 हजार
7. युद्ध मे घायल भारतीय सैनिक - 12 हजार
और बंग्लादेश (पूर्वी बंगाल) से हिन्दू सभ्यता का अंत ।
पश्चिमी पाकिस्तान के नेताओ का यही लक्ष्य था जो उन्होंने प्राप्त किया, पूरे पूर्वी बंगाल को सांस्कृतिक रूप इस्लामिक मुल्क बनाकर । मैदान में जनरल मानेकशॉ से युद्ध मे हारने के बाद भी पाकिस्तान, इंदिरा से शिमला की मेज पर युद्ध जीत गए । पाकिस्तान बड़ी चतुराई से अपने 93000 सैनिक, अल बदर के सैनिक, और रजाकारों को छुड़ा ले गया जो सिर्फ और सिर्फ मृत्युदंड के काबिल थे ।
अब मई महीने की कहानी 👇👇
मई 1971 का पूरा महीना बंगाली हिन्दुओ के नरसंहारों से भरा महीना था जहाँ एक दिन में 20000 तक हत्याएं हुई थी । इस महीने रोज बंगाली हिन्दू नरंसहार पर बात होगी और जातिगत हीनता बोध से ग्रस्त समूह के नायक जोगिंद्रनाथ मण्डल की गलतियों की सजा कितनो ने पाई इसका भी हिसाब करेगा ।
2nd May #ईशानगोपालपुर_नरसंहार
3rd May #मुजफ्फराबाद_नरसंहार
यूँ तो इतिहास ने ये पढ़ाया है कि पूर्वी पाकिस्तान के सभी बंगाली पश्चिमी पाकिस्तान से अपनी आजादी के लिए लड़ रहे थे पर शायद सच इससे ज्यादा कही भयानक था क्योकि जनरल याह्या खान का अत्याचार शुरु करने से पहले यही नारा था "सबसे पहले इस पूर्वी पाकिस्तान को मजहबी बनाओ"।
इनकी महिलाये साड़ी पहनती है, सिंदूर लगाती है, बंगाली बोलती है तो ये मुसरमानी किधर से हुई। इनके गर्भ से पाक मजहब के बालक पैदा करो, तब ही मजहब का राज इधर कायम होगा। ये भारत के बंगाल का एक हिस्सा दिखता है पाकिस्तान नही, इसे पाकिस्तान बनाओ। मिटा दो बंगाली संस्कृति को इस जमीन से ।
बस इसी नारे के साथ वहाँ शुरू हो जाता है कत्लेआम, बलात्कार और युद्ध शिशुओं का जन्म। 25 मार्च से शुरू हुए #ऑपेरशन_सर्चलाइट को शुरू हुए 35 दिन बीत चुके थे और लाखों हिन्दू मारे जा चुके थे। हजारो महिलाये सैनिकों और रजाकारों के शिविरों में #गोनिमोटर_माल बन कर रह रही थी। रोज उनके साथ आठ दस बलात्कार आम हो चले थे। महिलाओ के बाल काट दिए जा रहे थे और उनकी साड़ियां भी स्थाई रूप से फाड़ दी गयी थी क्योकि उससे उनके फाँसी लगाने का खतरा बरकरार था। उन्हें अधिकतर नग्न रखा जाता था या ज्यादा से ज्यादा एक छोटी लुंगी जिससे वो पहनने ओढ़ने पोछने आदि के सारे काम लेती थी।
सुन्दर लड़की थोड़ा अच्छी स्तिथि में होती थी क्योकि वो अधिकारी के लिए रखी जाती थी। उससे कमतर सैनिकों के लिए और बाकी रजाकर और स्थानियो मौलानाओं के लिए जो अक्सर सूचना देने का काम करते थे और हमले की योजना में भी मदद करते थे।
अनवरत चलते इस युद्ध मे 2 मई को बारी आती हैं ईशानगोपालपुर की जहाँ 28 हिन्दुओ की बर्बर हत्या की जाती है । जब पाक सेना अप्रैल में फरीदपुर में अपना कैम्प बनाती है तो वहाँ से 60 हिन्दू परिवार भागकर 6-7 किमी दूर गोपालपुर आ जाते है । यहाँ पर ईशान सरकार के मकान में उनके पौते लक्ष्मण सेन, NAP नेता चितरंजन घोष, जगदीश चन्द्र घोष और काफी कार्यकर्ता शरण ले लेते है। यहाँ पर ये लोग अपने कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण भी शुरू कर देते है रजाकारों से लड़ने के लिए।
2 मई को स्थानीय मजहबी लोग और पाक सेना आकर इशान सरकार का घर घेर लेती है और सभी पुरुषों की हत्या कर देती है । बची हुई स्त्रियों को सेना अपने साथ ले जाती है और छोटे बच्चों को स्थानीय मजहबियो को दे जाती है खतना के लिये।
इसी क्रम में 3 मई को नम्बर आता है मुज़फराबाद गाँव का, जहाँ चटगांव के काफी हिन्दू शरण लिए हुए होते है। मुजफ्फराबाद गांव चटगांव जिले में पाटिया उपजिला के दक्षिण पूर्वी छोर पर खरना संघ के अंतर्गत स्थित है। 1971 में, मुजफ्फराबाद पटिया पुलिस थाने के तहत कई हिंदू बहुल गांवों में से एक था। 1970 के चुनावों में मुजफ्फराबाद के 95% मतदाताओं ने अवामी लीग को वोट दिया था। 26 मार्च को जब सेना की कार्रवाई शुरू हुई, तो चटगांव के कई लोगों ने मुजफ्फराबाद में अपने रिश्तेदार के यहां शरण ली।
16 अप्रैल को, पाकिस्तानी कब्जे वाली सेना ने पाटिया पर बमबारी की और बाद में चटगांव जिले के दक्षिणी हिस्से पर कब्जा कर लिया । उन्होंने दोहाजरी और पाटिया में डेरे डाले । परपाटिया , पाकिस्तानी कब्जे वाली सेना ने प्राथमिक प्रशिक्षण संस्थान में डेरा डाला। शिविर में निहत्थे ग्रामीणों को गिरफ्तार कर उन्हें प्रताड़ित किया करते थे। कई लोग मारे गए और पीटीआई मैदान के नीचे दब गए।
अप्रैल के अंत में, खरना और इलाहाबाद गांवों के रजाकारों ने उत्पीड़न और लूट के लिए हिंदू गांव को निशाना बनाया। जैसे ही असामाजिक तत्वों को गाँव में बार-बार देखा जाने लगा, बुजुर्गों ने गाँव की रक्षा स्थापित करने का फैसला किया। गाँव की सीमा पर बीस छावनी स्थापित की गईं, जिनमें से प्रत्येक में निगरानी के लिए बीस व्यक्ति थे। हमले की स्थिति में, शिविर के पुरुष अलार्म लगाते हैं ताकि दूसरे शिविरों के पुरुष हमलावरों का विरोध करने के लिए एक साथ आ सकें। शिविरों में चौतरफा निगरानी ने ग्रामीणों को रजाकारों के हमलों को एक से अधिक बार विफल करने में मदद की। असफल होने के बाद, रजाकारों ने मुजफ्फराबाद पर हमला करने के लिए दोहाजरी शिविर में पाकिस्तानी कब्जे वाली सेना को राजी कर लिया।
3 मई को सुबह करीब साढ़े पांच बजे भोर होने पर, जब मुजफ्फराबाद के लोग अभी भी सो रहे थे, पाकिस्तानी सेना और रजाकारों ने गांव को तीन तरफ से घेर लिया। सुबह हल्की बूंदाबांदी हुई। सुबह करीब 7 बजे पाकिस्तानी सेना सैन्य ट्रकों में गांव में घुस गई। सुबह करीब आठ बजे वे घर-घर जाकर ग्रामीणों की हत्या करने लगे।
सत्तर वर्षीय रजनी सेन देश की शांति और समृद्धि के लिए रामायण पढ़ रही थीं। जब पाकिस्तानी सेना और रजाकार उसके स्थान पर पहुंचे, तो उन्होंने उन्हें अतिथि के रूप में बैठाया। रजाकारों में से एक ने सेन से #जय_बांग्ला कहने को कहा । जैसे ही उन्होंने जय बांग्ला का उच्चारण किया , एक पाकिस्तानी सैनिक ने अपनी राइफल की बैरल सेन के गले में डाल दी और उसे मार डाला। नबीन साधु, एक 75 वर्षीय साधु, जो गीता का पाठ कर रहे थे, को इसी तरह गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। हमलावरों ने गांव के पुजारियों को घेर लिया और उनकी पूजा की हुई मूर्तियों को तोड़ने के लिए मजबूर किया। इसके बाद पुजारी की गोली मारकर हत्या कर दी गई।
सामाजिक कार्यकर्ता निर्मल सेन को उनके पिता उपेंद्रलाल सेन के साथ पास के धान के खेत में घसीटा गया। वहां उन्हें गमछा से बांध दिया गया और उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई। मुजफ्फराबाद हाई स्कूल के शिक्षक रायमोहन, जिन्होंने गांव के एक तालाब में मछली पकड़ना शुरू किया था, को उनके बेटे के साथ मछली के जाल में बांध दिया गया और फिर गोली मारकर हत्या कर दी गई।
जो ग्रामीण छुपे हुए थे, जब पाकिस्तानी कब्जे वाली सेना ने हत्या की होड़ शुरू की, तो एक-एक करके रजाकारों ने भी सब गाँव वालो को घेर लिया । यह जांचने के लिए कि वे हिंदू हैं या मुस्लिम, ग्रामीणों को कलमा पढ़ने के लिए कहा गया। जब वे असफल हो गए, तो उन्हें ज़बीहा की तरह मौत के घाट उतार दिया गया ।
दोपहर 2 बजे तक चले इस हत्याकांड में पाकिस्तानी सेना ने लगभग 300 से ज्यादा हिन्दू पुरुषों और वृद्ध महिलाओ की हत्या की । युवा महिलाओ और बच्चियों को अपने साथ ले गए । उनके जाने के बाद स्थानीय रजाकारों ने बचे हुए घरों को लूट लिया और जो अधेड़ महिलाये सैनिक छोड़कर गए थे उनका बलात्कार शुरू कर दिया । 3 मई को हुए हत्याकांड के बाद भी लक्षित हत्याएं जारी रहीं । 7-8 मई को इलाहाबाद के कुछ रजाकारों ने नतुन चंद्र चौधरी को बेरहमी से पीट-पीट कर मार डाला था। कुछ दिनों बाद मुजफ्फराबाद हाई स्कूल के शिक्षक बरेन रे चौधरी की हत्या कर दी गई। वह अपनी बीमार मां के लिए दवा खरीदने जोरा मुनसिरहाट गए थे। वापस जाते समय, उन्हें मोहम्मदपुर के पास रजाकारों ने रास्ते में मार दिया और मार डाला।
और इसी प्रकार बंगलादेश से हिन्दू बंगालियों का नरसंहार जारी रहता है और मजहब का परचम धीरे धीरे लहराना शुरू हो जाता है ।
क्रमशः ...... क्योकि इस माह हर दिन सैकड़ो बंगाली हिन्दू महिलाओ के बलात्कार, पुरुषों की हत्या और बालको के खतना हुए ।
✍️ निखिलेश शांडिल्य 😡
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