सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

आज श्रमिक दिवस क्यों मनाया जाता है जानने के लिए पढ़ें पूरा लेख

मजदूर दिवस पर सभी को हार्दिक शुभकामनाएं🌹🌹

एक बार फिर विमर्श में वही अतीत के पदचिन्ह खींचे जाने लगे, वही गीत पुनः गुनगुनाने लगे, जो किसी काल में प्रगतिशील माने जाते थे। वही स्पीच सुनाई देने लगे जो अतीत की कालिमा को छुपाने और भुनाने के लिए गढ़े जाते थे।
फिर मेरी यादों में बंगाल की वो विभीषिका तैरने लगी, जिसे पढ़ने के बाद #मजदूर_संघ" शब्द से घृणा होने लगी थी। बड़े यत्न और झूठी आशाओं से उन विभीषिकाओं को भुलाई हूँ, जो अक्सर अपनी याद ताजा कराने कभी "नर्स हड़ताल" कभी "डॉक्टर हड़ताल" कभी "बिजली/पानी हड़ताल" तो कभी परिवहन/ट्रांसपोर्ट हड़ताल" के रूप में दिख ही जाता है।

एक समय था जब बिहार, बंगाल और उत्तर प्रदेश अंग्रेजी शाशन की आर्थिक नगरी के रूप में प्रतिष्ठित हुआ करते थे। मेरा गृहनगर तो महत्वपूर्ण "आर्थिक केंद्र" के रूप में स्थान रखता था। परन्तु दुर्भाग्य देखिए आज बिहार उन्नति के श्रेणी में 29वें और बंगाल आदि भी नीचे से 3सरे चौथे स्थान पर अवस्थित देखे जा रहे। अगर मैं बात करूँ उत्तर प्रदेश की तो, यह प्रदेश भी प्रतिव्यक्ति आय में निचले पायदान से दो चार पग ही ऊपर है। 
क्या कारण हुआ होगा? क्या कभी विचार किया गया?

जब बॉलीवुड की पुरानी फिल्में देखती हूँ, जिनके गाने आज भी सदाबहार गानों में प्रतिष्ठित हैं, मन अत्यंत क्लान्त हो उठता है। नायक की छवि सदैव "अत्यंत गरीब और लाचार" के रूप में ही इस प्रकार दिखाई देती है मानो वास्तविक भारत उस नायक के चरित्र में ही बसता हो। और नायक का चरित्र भी कैसा?
इसका अनुमान बस इतने से ही लगा लें कि, वह भी मजदूर यूनियन, कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाला तो कभी भ्रष्टाचारी के खिलाफ। सदैव उसकी लड़ाई सिस्टम से ही रही। परन्तु हाय रे तक़दीर! वो सिस्टम कभी बदलने वाला था ही नहीं।
हद तब हो जाती है जब भारत की "आयरन लेडी" ग़रीबी हटाओ" का नारा बुलन्द करती है। उस नारे के साथ शुरू होता है वास्तविक स्वरूप का दर्शन।
सबसे लोकप्रिय युवा राजनेता जी सार्वजनिक मंच से बड़े गर्व से कहते हैं कि, जो पैसा केंद्र से 100 रुपये के रूप में चलता है, वह पैसा वास्तविक लाभार्थी तक पहुँचने तक 16रुपये/पैसे(जो भी हो देख लें आप सब) हो जाता है।
परन्तु हाय रे ग़रीबी! तू कभी मिटी नहीं।
कंगाली की कुछ ऐसी दशा भारत की रही कि कुपोषित पुरुषों और महिलाओं के फोटोज़ पश्चिमी देशों में सहानुभूति और भीख प्राप्त करने के लिए भारत सरकार द्वारा वितरित किये जाते थे। 
फिर भी ये ग़रीबी कभी मिटी नहीं। 
कवियों ने लिखा, "मरता क्या नहीं करता" वही कुछ प्रगतिशील लेखकों ने लिखा "भूख भली या बहू के जुठ(जूठा)" इतने पर ही सोशल रिफॉर्म्स कहाँ ठहरने वाले थे, उन्होंने लिखा "पॉवर के बिना समानता नहीं आती"। फिर क्या था, बंदूक के बल पर ही क्रान्ति आती है, और आंदोलन ही लोकतंत्र की आत्मा है" जैसे ज्ञान धाराओं के निःसृत हो सर्व समाज में प्रवाहित होना सहज हो गया।
फिर भी ये ग़रीबी डायन ही बनी रही। हाय रे ग़रीबी......

90 का दशक भारत के लिए सबसे विनाशकारी रहा, बंगाल से लेकर कश्मीर तक जल रहा था साम्प्रदायिकता की आग में, परन्तु हमारे प्रगतिशील विचारक और लेखक इस "डायन ग़रीबी के उन्मूलन" में व्यस्त रहे। 
प्रगतिशील लेखकों की लेखनी से चित्रित छवियों को आज जब AI टेक्निक से चित्रित किया जाता है, तो एक ऐसे नवोत्कर्ष पर भारत की छवि दिखाई देती है, जब भारत सरकार पश्चिमी देशों में पर्चे बांटती थी।
परन्तु ये छवि कभी धुँधली न हुई, और सम्भव है कि कभी यह छवि धुँधली होने वाली भी नहीं।

वर्त्तमान भारत की संस्कृति में, 50% सेवा प्रकल्प, 30% विनिर्माण प्रकल्प और 18% कृषि प्रकल्प का आर्थिक योगदान देखा जाता है।
वर्त्तमान भारत में कैरोसिन की सप्लाई बंद कर दी गयी है, यह वही कैरोसिन है, जो घरों में उजाले किया करती थी, जिसे धनाढ्य वर्ग अक्सर हड़प कर गरीबो के झोपड़े के उजाले को भी छीन लिया करती थी। अगर मैं प्रगतिशील लेखकों की कविताओं को धरातलीय मानूँ, तो आज गरीबों को चिराग हीन करने वाली सबसे दुष्ट सरकार ही है।
तनिक मैं झोपड़े की बात भी कर लेती हूँ:-
"इंदिरा आवास के नाम से गरीबी हटाओ अभियान" जिस कालखण्ड से आरम्भ हुआ, तब से अब तक भारत की आबादी के 20% के बराबर अर्थात, प्रत्येक परिवार पर एक आवास आबंटित किया जा चुका है।
परन्तु हाय रे गरीबी, तू झोपड़ा हटने ही नहीं देती। 
जो आज भी कविताओं में झोपड़ा दिखाई दे रहा है।

मैं शहर की बात करूँ तो, 
नव विकसित क्षेत्रों में नियोक्ता स्वयं कार्यकारी मजदूरों के झोपड़े वही कार्यस्थल पर बनाता है। जिससे मजदूरों को किसी प्रकार की असुविधा न हो, और उन्हें अतिरिक्त खर्च न करना पड़े। एक वीरान क्षेत्र में रहने के लिए।
ऐसे झोपड़े विनिर्माण तक ही देखे जाते हैं। बाद में सभी वर्कर्स अन्य साइट पर चले जाते हैं।
ये मजदूर अनिवार्यतः बाहरी राज्यों से आते हैं। जो अक्सर ग्रामीण अंचलों से होते हैं।
इसलिए इन्हें बाहर से आय अर्जन ही करना होता है, किसी भी प्रकार का कार्यस्थल से कोई जुड़ाव नहीं होता।
इसलिए स्थायी निवास के बारे में वे विचार तक नहीं करते। शेष क्या ही कहूँ।

परन्तु इन प्रगतिशील कविताओं को जब पढ़ती हूँ, जो आधुनिक प्रगतिशील लेखकों की कालजयी रचना रूप प्रसिद्ध हैं, फिर सोच में डूब जाती हूँ,
हाय रे ग़रीबी, तू जाती क्यों नहीं?

मोदिया कैरोसिन छीन लिया, नियोक्ताओं ने "घरेलू इकोनॉमी" बर्बाद कर दी। वो इकोनॉमी जो कभी एक रुपये के आय के बिना भी जीवन बसर करवाने में सक्षम थी।
नई कृषक योजनाओं ने "बैल और हल" छीन लिए, जिनसे वर्ष में कम से कम चार माह खाने के लाले पड़े ही रहे।
हलवाइयों ने तो "बच्चों के हलक का दूध ही छीन लिया" पैसों का लालच देकर।
नहीं तो सो जाते थे कुपोषित बच्चे माँ की छाती से लिपट, जब घरों में दुग्ध गङ्गा बहती थी।परन्तु-
 हाय रे गरीबी तू डायन आज भी बसती है मेरे दिलों दिमाग में,
आज भी बसती है मेरी लेखनी के ताज में।

बस कर ऐ मेरी लेखनी, तू भी तो ग़रीबी का ही गुणगान कर रही😁😁😁

टिप्पणियाँ

  1. साहित्य समाज का दर्पण है, लेकिन तब जब तल खुरदरा नहीं हो या पूर्व टंकित चित्रों की प्रतिछाया नहीं हो। युग के सत्य को पल्लवित और पोषित करता हो। यानी लीक छोड़ नया लीक भी तैयार कर रहा है।
    जय श्री हरि।

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