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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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नरिया गांव मौलवीबाजार जिले के जिला मुख्यालय मौलवीबाजार से 10 किमी पश्चिम में मौलवीबाजार सदर उपजिला के पश्चिमी छोर पर ऊपरी कागाबाला यूनियन में स्थित है । 1971 में, मौलवीबाजार जिला सिलहट जिले का ही एक सबडिवीजन था ।
नरिया गाँव कई हौरों से घिरा हुआ है , जो बारिश के दौरान गाँव को दुर्गम बना देता है। बारिश के दौरान गांव में आने-जाने के लिए देशी नावें ही परिवहन का एकमात्र साधन हैं। 1971 में, गांव में ज्यादातर गरीब और पिछड़े हिंदुओं का निवास था, जो मामूली श्रम के माध्यम से अपनी आजीविका चलाते थे।
26 मार्च को, पाकिस्तानी कब्जे वाली सेना ने #ऑपेरशन_सर्चलाइट शुरू किया और हिंदुओं को भगाने के लिए निशाना बनाया। मार्च और अप्रैल के महीनों में लाखो हिंदुओं को मार डाला गया था और जो भाग लिए उन लाखो हिंदुओं ने भारत में शरण ली थी।
इस दौरान स्थानीय रजाकारों ने एक मद्रिच अली के नेतृत्व में नरिया के ग्रामीणों को प्रस्ताव दिया कि वे बड़े पैमाने पर धर्मांतरण करें और फिर अपनी लड़कियों की मुस्लिम लड़कों के साथ शादी करें। इस प्रकार गाँव पाकिस्तानी कब्जे वाली सेना के हमले से बच जाएगा। जब गांव वालों ने मना किया तो रजाकारों ने उनसे अपनी सारी गायें सौंपने को कहा, जिसे गांव वालों ने फिर मना कर दिया। इस पर रजाकारों ने उन्हें सबक सिखाने की धमकी दी।
5 मई को शेरपुर कैंप से 12 पाकिस्तानी सैनिक पास के साधुहाटी गांव से होते हुए पैदल गांव पहुंचे । उनके साथ मौलवीबाजार की शांति समिति के अध्यक्ष भी थे । कुछ ग्रामीणों ने पहले ही पास के फरछा बील में शरण ले ली थी और पाकिस्तानी सैनिकों के गांव में आने पर अन्य लोग अपनी जान बचाने के लिए भागने लगे। रजाकारों और अल बद्र से संबंधित पाकिस्तानी कब्जे वाली सेना के स्थानीय सहयोगी ग्रामीणों को भागने से रोका। सौ से अधिक पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को पकड़ा गया और फिर गांव के एक हिंदू निवासी कामिनी कुमार देब के घर लाया गया। महिलाओं और बच्चों को पुरुषों से अलग कर एक कमरे में बंद कर दिया गया। खुद कामिनी कुमार देब सहित पुरुषों को एक लाइन में खड़ा कर दिया गया और आग लगा दी गयी । पुरुषों को मारने के बाद, पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। इसके बाद रजाकारों और अल बद्र के स्थानीय सहयोगियों ने गांव में 19 घरों और 6 अन्न भंडारों में आग लगा दी।
नरसंहार के बाद, नरिया एक निर्जन गाँव बन गया और लाशें बिना दाह संस्कार के वहीं पड़ी रहीं। कामिनी कुमार देब और उनकी पत्नी के कंकाल दो दिन बाद उनके जले हुए घर से बरामद किए गए थे। जैसे ही शवों से आने वाली दुर्गंध असहनीय हो गई, रजाकारों ने मृतकों के परिजनों को शवों को दफनाने या मार डालने की धमकी दी। धमकियों के बाद, पास के अब्दलपुर, नौगांव और खगराकांडी गांवों के पांच या छह हिंदू आए और कामिनी कुमार देब के आवास के परिसर में शवों को दफना दिया।
और इस सब पर विडंबना ये है कि, बहुत से बंगाली हिन्दू बालक भी 1971 को हिंन्दू जेनोसाइड से ज्यादा आज़ादी की लड़ाई मानते है । 😭
साभार
निखिलेश शांडिल्य
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