- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
बड़ी से बड़ी विचारधारा की एक खास उम्र होती है और अपनी दमदार भूमिका निभाने के बाद यह विचारधारा भी इतिहास के न्यायशास्त्र के हिसाब से चुपचाप बेदखल हो जाती है।
हालांकि उस विचारधारा के प्रति संगठित जनसमूह की वह मादक लालसा, उसके सम्मोहन आकर्षण में गिरफ्त उसकी उन्मादी अवस्था भले बीत चुकी हो---लेकिन जन चेतना के परिसर में वह विचार अपने प्रासंगिक अर्थ के साथ हर समय मौजूद रहता है और इतिहास के फिसलन व घुमावदार रास्ते में जब जब जन सैलाब के उमड़ने पर उसके जीवन की यथावत तकलीफें व चुनौतियां सिर उठाकर दलदल से बाहर झांकती दिखती हैं, वही सुप्त विचार दहकते हुए शोले का रूप धारण कर लेते हैं तथा इतिहास की गैलेक्सी की परिक्रमा पुनः चालू कर देते हैं। लांचिंग पैड नष्ट होने के बावजूद ये विचारों के उपग्रह इतिहास गैलेक्सी के राजमार्ग पर अनवरत परिक्रमा करते रहते हैं।
इसी के चलते इन क्रान्तिकारी विचारों की महिमा और वैभव धरातल कभी पूर्णतया विलुप्त नहीं हो पाता !
पीड़ित और आशा उम्मीद से भरी मानव जाति के ये मुक्ति सिग्नल हैं !
दिक्कत इनके उद्देश्य, अभिप्रेत और औचित्य से नहीं है बल्कि मुश्किलात वहाँ से शुरू होती है जब इनके अनुयायी या इनके पैरोकार इन्हें व्यावहारिक धरातल पर उतारने की प्रक्रिया में इनके 'मूल' को संरक्षित रखने के बजाय या मूल को ज्यों का त्यों प्रतिफलित करने के बजाय उसमें कतर ब्यौन्त कर देते हैं।
वास्तविकता तो यह है कि मनुष्य चाहे जितना विराट क्यों न हो, काबिल नेता हो, इतिहास निर्माता हो, कुछ भी हो---अपने मानवीय दुर्गुणों, मूल मनोविकारों और संवेग परिवर्तनों से निरपेक्ष नहीं हो सकता। इसीलिए किसी वाद, सिद्धांत या विचारधारा के व्यावहारिक क्रियान्वयन के दौरान उसके मानवीय मनोवेग उसे उन निर्दिष्ट आदर्शों और महत्तर उद्देश्यों से पथ विमुख या पथभ्रष्ट कर देते हैं, और फिर वासनाओं या दुर्गुणों के वशीभूत यह नेतृत्वकर्ता वर्ग भी उस पार्टिकुलर विचारधारा से मनचाहा ऐतिहासिक बदलाव करा पाने में अक्षम हो जाता है !
मनुष्यता के वांछित आदर्श की प्राप्ति में सहायक इस खास सिद्धांत के व्यावहारिक प्रतिफलन में और भी कई त्रासदियां आगे जुड़ती चली जाती हैं।
एक बार जब ऐतिहासिक न्याय की तराजू पर ऐसी विचारधारा असफल और भद्दा प्रदर्शन करती है तो सर्वप्रथम तो उसकी भूमिका संदिग्ध व सीमित हो जाती है, उसके प्रति विश्वसनीयता और जन सैलाब की आसक्ति घट जाती है साथ ही उसके मूल आदर्शों का महत्व पूर्ववत होने के बावजूद उसे नेपथ्य में जाने पर विवश होना पड़ता है।
इस दौरान सबसे बड़ी त्रासदी ऐसे क्रान्तिकारी विचारों के साथ यह घटती है कि इनके सच्चे अनुयायी भी इतिहास की मुख्यधारा से किनारे लगा दिए जाते हैं।
अब इन पर तिगड्डों और दलालों या मध्यस्थों का कब्जा हो जाता है और इनके हाथों इस मौलिक विचारधारा की फिर ऐसी तैसी हो जाती है। धूर्त और निपट काइयां के हाथों इनका गला सहलाया जाता है और इनके तेवर परिवर्तित कर दिए जाते हैं।
जो पूर्णतया आदर्श च्युत, सिद्धांतहीन और अनैतिक है तथा अवसरवाद की सवारी करते हुए जिसने परिवेश को नियंत्रित और आच्छादित कर रखा है, वही फिर ऐसे पवित्र और मौलिक विचारों का रहनुमा बनकर जनमत की अगुआई करता है और नतीजा यह होता है कि इन विचारों के मूल पक्ष धुन्ध और प्रपन्च कुहेलिका में डूबकर निष्प्राण और अर्थहीन हो जाते हैं !
जो इन विचारों के वास्तविक अनुकर्ता या अनुरक्त समूह हैं---वे छटपटाते हुए इतिहास की इस विचित्रता को मूकदर्शक बनकर देखने व बेध्य होने को अभिशप्त हो जाते हैं !
इसीलिए तो कहा जाता है कि न तो कोई विचार, न कोई वाद और न कोई इतिहास दर्शन ---- बल्कि यह मनुष्य की अन्तःप्रकृति है ; उसके मानवीय भाव या मनोवेग हैं जिनकी थाह लेना किसी के वश की बात नहीं है !
इस अबूझ प्रकृति या मनुष्य मन को किसी गणितीय वैज्ञानिक फॉर्मूले, ऐतिहासिक विचारधारा या सैद्धांतिकी से जाना नहीं जा सकता, इसका तो अपना अनूठा व अद्वितीय प्रमेय है जिसके रहस्य विधान को अभी तक कोई गणितज्ञ यहाँ तक कि ईश्वर भी सुलझाने में सफल नहीं हुआ है !
किन्तु मोटा मोटी इस मानव स्वभाव की अभिवृत्ति, प्रवृत्ति व आदतों को देखकर यह निष्कर्ष तो निकलता ही है कि कोई भी विचार चाहे जितनी पवित्रता और गरिमा से झँकृत होकर इतिहास के प्रांगण में अवतरित क्यों न हुआ हो, मनुष्य के भाव स्पर्श और सांसारिक परछाई के भीतर कैद होते ही बहुत कुछ परिवर्तित होने की तैयारी करने लगता है।
उसका काम्य भले उच्चादर्शों और अलभ्य लालसाओं से पूरित हो, लेकिन उसका व्यावहारिक स्वरूप ---- और यही तो सब कुछ है भी--- मूल से बहुत भिन्न हो जाता है !
इससे कोई विचारधारा या सिद्धांत बच ही नहीं सकता !
साभार
कुमार शिव
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें