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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
हिन्दू समाज अपने अंदर की विकृतियों को दूर किए बिना सामाजिक, और सांस्कृतिक रूप से एक क्यो नही हो सकता है ?
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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स्वयमेव मृगेन्द्रता
सनातन जीवन पद्धति, हिन्दू राजव्यवस्था तथा उसके सामाजिक, धार्मिक, दार्शनिक-बौद्धिक विधान के भीतर विमर्श, संवाद व जिरह करने के मूलभूत स्वभाव के चलते न जाने कितने पन्थ, सम्प्रदाय, स्कूल और मठ तथा संघ बने। यह हिन्दुत्व व सनातन की मौलिक जातीय विशेषता रही। हिन्दू-बौद्ध जीवन धारा जैसा विभेदकारी शब्द तो बहुत बाद की उपज है।
जिस देश के आचार्यत्व, धर्म-संस्थान, राजव्यवस्था और सांसारिक लौकिक नियामक मशीनरी का औपनिवेशीकरण हो जाता है। उसके मूल स्वरूप को विरूपित कर दिया जाता है ---- वहाँ इसी प्रकार विकृत, दूषण और विघटन का बीजारोपण करते हुए उस खूबसूरत समाज व सभ्यता परिसर के आन्तरिक सौन्दर्य को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया जाता है। ब्रिटिश काल में यही हुआ।
संशोधन, मार्जन, सुधार और रूपान्तरण के साथ नित्य नवीनीकरण और ताजगी की ओर प्रस्थान करना व नये बदलावों परिवर्तनों को सहजता के साथ आत्मसात करते हुए उन्हें आत्मस्थ करना सनातन व हिन्दुत्व का आधारभूत स्वभाव रहा है। इसी मुख्य प्रवृत्ति या आदत के चलते इसके भीतर आंतरिक शोधन व रूपान्तरण स्वतःस्फूर्त होते रहे। वाह्य हस्तक्षेप की जरूरत ही नहीं पड़ी कभी।
यही सनातन व उसके ऐतिहासिक सन्दर्भ का आशय है। यही परम्परा भी है। जड़ या यथास्थितिवादिता परम्परावान होने के सही चरित्र को दर्शा ही नहीं सकती। सनातन के भीतर इतिहास और परम्परा को स्वतःस्फूर्त सुधार, रूपान्तरण और बदलाव से ही जोड़कर देखा चला गया है। इसीलिए चार्वाक, जैन, लोकायत, बौद्ध, सिद्ध, आजीवक, नाथ, वज्रयान, सहजयान, निर्गुण पन्थ जैसे विभिन्न सम्प्रदाय, उप-सम्प्रदाय बड़ी सहजता से हिन्दुत्व और सनातन के महासागर में उत्ताल तरंग विक्षोभ करते हुए उठते झूमते निकले व इसके भीतर युगानुरूप सुधार, संशोधन का महत्वपूर्ण कार्य करते रहे। अपनी ऐतिहासिक पारी खेलकर इसी अथाह, अपरिमित महासागर में विलीन होकर इसकी चमक व उल्लास को बढ़ाते रहे।
इस कड़ी में गौतम बुद्ध हिन्दुत्व के भीतर एक असाधारण प्रकाश लेकर उद्भूत हुए।
उनके द्वारा प्रवर्तित पन्थ व सम्प्रदाय द्वारा हिन्दुत्व का संहार नहीं किया गया बल्कि उत्तम शल्य चिकित्सा विचिकित्सा द्वारा उसके कर्दम दूषण को दूर करके उसे नीरोगी स्वस्थ व ऊर्जावान बना दिया गया। इसकी आवश्यकता उस समय बहुत थी भी।
इसीलिए यह मान्य व स्थापित तथ्य ही हो चला कि ---- 'गौतम बुद्ध हिन्दुत्व के संहारक नहीं बल्कि उत्तम शोधक थे। वे सनातन धर्म के अन्य समादृत महापुरुषों की तरह सर्वश्रेष्ठ हिन्दू थे।'
अठारहवीं उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में जबसे हमारे देश काल, इतिहास, सभ्यता बोध व सांस्कृतिक जातीय सन्दर्भ का विकृत नैरेटिव्स औपनिवेशिक दुष्चक्र के भीतर खड़ा किया गया। बल्कि हिन्दू जीवन पद्धति व उसके सांस्कृतिक इयत्ता में सायास व कठोर हस्तक्षेप करते हुए विभेदों व अंतर्विरोधों का प्रहसन रचा गया --- तबसे तमाम सन्दर्भ, अवधारणाएं और शब्दावलियाँ राजनीतिक सामाजिक व वैचारिक मंचों पर तैरने बहने लगी :
◆ हिन्दू vs बौद्ध, जैन, सिक्ख आदि की भिन्नता।
◆ सवर्ण vs अवर्ण की भिन्नता।
◆ आर्य vs दलित।
◆ आर्य vs अनार्य का जमघट।
◆ हिन्दू vs बौद्ध परम्परा।
◆ ब्राह्मण vs शूद्र का विभाजन।
◆ आर्य vs द्रविड़ झमेला।
◆ स्वदेशी vs विदेशी का लोचा।
◆ संस्कृत vs देशज भाषाओं का भौंडा कुचक्र।
: इस रूप में विभेद, तनाव व कुत्सा के जितने विघटनकारी तत्व हो सकते हैं सबको राजनीतिक, धार्मिक सामाजिक सांस्कृतिक और बुद्धिजीवियों के मंच से उठा उठाकर पूरे हिन्दू समाज को पतित, भ्रष्ट, यथास्थितिवादी, जड़, अमानवीय आदि बताकर उसके पारम्परिक ताने बाने के अन्तरसूत्र धागों को जगह जगह से उधेड़ दिया गया।
पूरा समाज एक दूसरे के विरोध और प्रतिकार, प्रतिशोध व नफरत में सुलगने लगा।
और जब यह कुत्सित व भयंकर विनाशकारी नैरेटिव्स एक बार गहरे से हम सबके बीच स्थापित हो गया तब खुद हिन्दुओं के भीतर से उठे भद्र शिक्षित, सेकुलर लिबरल और नराधम वामपंथियों ने ---- दुर्भाग्य से इन सबकी संख्या ही बहुमत(90 प्रतिशत से ऊपर) में रही ---- इस दूषित औपनिवेशिक तर्क को राजपथ बना दिया।
आज हिन्दुत्व और सनातन के सम्मुख यह आंतरिक चुनौती कुछेक सबसे बड़ी चुनौतियों के साथ बल्कि औरों से भी बड़ी ---- या कहिए सबसे महत्वपूर्ण चुनौती बनकर खड़ी है।
एक गौरवशाली सभ्यता, आहत व घायल साज सज्जा, अभिविन्यास के साथ अपने वजूद को सार्थक सिद्ध करने में भगीरथ प्रयत्न के साथ जुटी हुई है और उसके भीतर के रचनात्मक व सृजनधर्मी महापुरुष उसके सहायक व शार्दूल होने के बजाए विरोधी व शत्रु दिखाए जा रहे हैं ---- यह बहुत आश्चर्य व विस्मय का प्रश्न है।
इस पर मन्थन ही नहीं इसका ठोस समाधान ढूंढने की जरूरत है तभी हिन्दुत्व अपने आंतरिक और शक्तिशाली वाह्य शत्रुओं से मुकाबला भी कर सकेगा तथा अपने मौलिक स्वरूप को संरक्षित भी रख सकेगा।
साभार
कुमार शिव
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