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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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इतिहास के भीतर कुछ घटनाएं इतनी ज्यादा निर्णायक व असरदार होती हैं कि उनके परिणाम और प्रतिफल किसी प्रजाति के पूरे ऐतिहासिक नियति व तकदीर को बदलकर रख देते हैं।
पानीपत का तृतीय युद्ध हिन्दू जाति के जीवनधारा को त्रासदी की ओर ले जाने वाली ऐसी ही अत्यन्त महत्वपूर्ण घटना है। अगर इस युद्ध में मराठों की विजय हुई होती तो यह अकेली ऐसी ऐतिहासिक घटना होती जिसके सहारे हमारे जातीय जीवन का सौभाग्य सूर्य प्रशस्त और दमकते हुए हमारे स्वाधीन चेतना का संवाहक बनकर जीवन पथ को संचालित कर रहा होता !
बिन्दुवार कुछ बातें यहां प्रस्तुत कर रहा हूँ इस घटना के सन्दर्भ व परिप्रेक्ष्य में जिन्हें आप सब देखने का कष्ट करें :
◆ भारतीय इतिहास लेखन की मौजूद मुख्य धारा तथा साम्राज्यवादी इतिहास लेखन दोनों के भीतर मुस्लिम सल्तनतों, मुगल साम्राज्य, क्षेत्रीय मुस्लिम रियासतों के शासनकाल और ब्रिटिश पीरियड को उनकी विजयों और प्रभुत्वशाली उपस्थिति के चलते बहुत बढ़ा चढ़ाकर दिखाया गया है। जबकि यह सच्चाई का एक हिस्सा है। मराठों का हिन्दू पदपादशाही अभियान और पूरे भारतवर्ष से म्लेच्छों के विदेशी शासन का खात्मा व सदियों से चली आ रही गुलामी का उन्मूलन ही छत्रपति महाराज शिवाजी के "हिन्दवी स्वराज" का उद्देश्य था। इसे व्यावहारिक धरातल पर मराठा स्वराज्य ने उतार भी दिया। 1713 ईस्वी से लेकर 1758 ईस्वी के बीच तीन महान पेशवाओं ----- बालाजी विश्वनाथ, बाजीराव प्रथम व बालाजी बाजीराव के नेतृत्व में 700 वर्ष बाद भारतवर्ष हिन्दू राष्ट्र व सनातन धर्म गरिमा से पुनः मण्डित होने की दिशा में उन्मुख हुआ।
◆ पूरी 18 वीं सदी जो विश्व फलक पर भी बहुत बड़े परिवर्तनों और हलचलों का ज्वार लेकर प्रस्तुत हुई थी, भारतीय इतिहास में इस सदी के भीतर पानीपत के तृतीय युद्ध(14 जनवरी 1761 ईस्वी) जैसी व इससे महत्वपूर्ण कोई घटना है ही नहीं। और इसमें हिन्दू प्रजाति(मराठा आंदोलन) की पराजय जैसे भी हुई हो ----- हिन्दुत्व के इतिहास में इससे बड़ी त्रासदी कोई है भी नहीं ---- कारण यह कि प्राचीन काल में जितने भी हिन्दू राजवंश थे उनके बीच राजनीतिक युद्ध भले हुए हों, धार्मिक सभ्यतागत और भिन्न जीवन दर्शन के युद्ध कदापि न हुए थे। इस्लाम के वर्चस्व और प्रतिष्ठा तथा 700 वर्ष तक हिन्दू जीवनधारा को मर्दित और निष्प्रभ करने के बाद हिन्दुत्व का शौर्य और पुरुषार्थ बहुत सशक्त और ओजस्वी ढँग से मराठा स्वराज्य व हिन्दू पद पादशाही के माध्यम से सत्रहवीं अठारहवीं सदी में मुखरित हुआ था। बीच में क्षेत्रीय हिन्दू राज्य और भी थे जिन्होंने प्रतिरोध व जीवन संचार को जारी रखा। राजपूत राज्य, विजयनगर राज्य, जाट शक्ति, सिक्ख राज्य, अहोम ये सब थे ---- लेकिन समुद्रगुप्त, चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य शकारि, ललितादित्य व मिहिरभोज के बाद पहली बार मराठा स्वराज्य के माध्यम से हिन्दू जनजागरण अखिल भारतीय स्तर पर प्रकट व पुंजीभूत हुआ था।
पानीपत के इस युद्ध में अहमदशाह अब्दाली, नजीबुद्दौला और शुजाउद्दौला के दृढ़ इस्लामिक गठबंधन व उनके धर्मयुद्ध सम्बन्धी आह्वान(जिहाद व मिल्लत की अवधारणा) के मूल में जिस भय, असुरक्षा और महासंकट की कल्पना करके इन ताकतों का संलयन हुआ था ---- वह था ---- मराठों का हिन्दू पद पादशाही व हिन्दू राजतन्त्र का व्यापक रूप से पुनुरुत्थान तथा इस प्रक्रिया में सम्पूर्ण मुस्लिम शासन व विदेशी शक्तियों का सफाया।
अगर यह युद्ध मराठों द्वारा जीता जाता तो ब्रिटिशर्स को तो छोड़िए ----- 700 वर्ष पहले के ये मुस्लिम विदेशी जिन्हें व्यर्थ में देशी शासक मानकर प्रशस्ति गान होता है, उन्हें स्वदेशी बनना पड़ता। वास्तविक देशीकरण भी तभी उनका होता। तब वे इस मातृभूमि को हिन्दुओं की तरह स्वयं की भी मातृभूमि मानते। 900 वर्ष साथ मे रहकर सारे के सारे मुसलमान मुहम्मद अली जिन्ना के साथ खड़े होकर भारतवर्ष की देह के टुकड़े टुकड़े कर डाले ---- यह इनके विदेशी चरित्र का ही सबूत रहा है। देशी शासक वर्ग कभी ऐसा स्वप्न में भी नहीं सोच सकता !
◆ हमारे जातीय जीवन की महादुर्भाग्य से भरी तिथि है 14 जनवरी 1761 ईस्वी। इस युद्ध में मराठों की जीत निश्चित तौर पर भारतवर्ष के सनातन जातीय जीवन बोध को पूर्णतया प्रतिष्ठित कर देती। देश का कभी विभाजन भी नहीं होता। विष्णुपुराण में वर्णित जम्बूद्वीप की संकल्पना साकार होती .... न जाने क्या क्या होता ?
◆ इसीलिए मैं नजीबुद्दौला को 18वीं सदी का सबसे दूरदर्शी(इस्लामिक सत्ता, इस्लाम धर्म के वर्चस्व व प्रतिष्ठा के सन्दर्भ में) व्यक्तित्व व हिन्दुत्व के जीवन अध्याय का सबसे विकराल शत्रु मानता हूँ। उसने अकेले अपने बलबूते इस्लाम को भारतवर्ष में उसके अधःपतन के दौर में सर्वाधिक शक्तिशाली कर डाला। इसे अगर मराठे अपने संरक्षण में आने के दौरान मार डाले होते तो उस दौर में इतना सशक्त धर्म आह्वान व मिल्लत और कोई बना ही नहीं पाता। इस दौरान पूरे भारतवर्ष के भीतर 18वीं सदी के रंगमंच पर नजीब खान से बड़ा कोई जेहादी मौजूद ही नहीं था, यह एक ठोस ऐतिहासिक तथ्य है।
इस्लाम धर्म के नजरिए से इस्लाम के सबसे बुरे दौर ---- औरंगजेब की मृत्यु के बाद हिन्दू राज्यवंशों का एक के बाद एक उत्थान --- के बीच इस्लामिक सत्ता का सर्वोच्च उद्धारक बनता है नजीबुद्दौला। भले पानीपत के तृतीय युद्ध का मुख्य नायक अहमद शाह अब्दाली हो लेकिन इस पूरे नाटक का डायरेक्टर, प्रोड्यूसर व पटकथा लेखक नजीबुद्दौला ही है।
◆ इसीलिए मल्हारराव होल्कर बहुत पराक्रमी होते हुए भी हिन्दू स्वराज के भीतर मौजूद योद्धाओं के बीच सबसे बेवकूफ व खलनायक व्यक्ति ठहरता है। सावरकर जी ने भी इस तथ्य को रेखांकित किया है।
◆ रघुनाथ राघोवा और मल्हारराव होल्कर ---- ये दो उद्भट योद्धा हिन्दू पद पादशाही के महानतम उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए प्रयत्नरत ऐसे नायक थे जो अपनी नीचतम प्रवृत्तियों के वशीभूत होकर अपने उच्चस्तरीय पुरुषार्थ को कलंकित कर बैठे थे। राघोवा तो हिन्दुत्व के इतिहास प्रांगण का सबसे अधम जीव बनकर एक समय उपस्थित हुआ था। यद्यपि इन दोनों ने एक समय दिल्ली के भीतर मुगल सिंहासन का मानमर्दन करते हुए हिन्दू पदपादशाही का परचम लहराया, सिन्धु सरिता के तट पर हिन्दू ध्वज को फहराया लेकिन मानवीय दुर्बलताओं के वशीभूत हो सब कीर्ति भी लुटा बैठे। सावरकर जी ने सर्वाधिक दुःख इन्हीं दोनों नायकों के कारनामों पर व्यक्त किया है। इनके पास हंबीर राव मोहिते, सन्ताजी घोरपड़े और धनाजी जाधव जैसी शपथ प्रतिज्ञा का अभाव था। बिना इस शपथ प्रतिज्ञा के छत्रपति महाराज शिवाजी के हिन्दवी स्वराज का लक्ष्य प्राप्त करना व राष्ट्रीय उद्देश्य को पूर्णतर करना सम्भव न था।
◆ यह मल्हारराव होल्कर ही थे जिसने 1757 ईस्वी में नजीबुद्दौला को मराठों द्वारा बंधक बनाए जाने तथा रघुनाथ राव, दत्ताजी शिंदे और स्वयं बालाजी बाजीराव पेशवा के चाहने पर भी उसका सिर कलम नहीं होने दिया। बाद में उस काल-फेंटार ने इन सबको डस लिया।
◆ मूर्ख मल्हारराव होल्कर नजीबुद्दौला के अतिशय मक्कार स्वभाव और नीचतम चरित्र की अनदेखी करके या आत्ममुग्धता के वशीभूत होकर उसके घिनौने स्वभाव को कभी पहचान ही ही नहीं सका। तारीफ और उदारता में फूला गुबरैले की तरह डोलता मल्हारराव उसके धार्मिक कट्टर चरित्र व नीचतम उद्देश्य को कभी जान नहीं सका ---- यह उसके राजनयिक दृष्टिकोण की स्पष्ट विफलता है। वह राजनेता कैसा जो अपने समकालीन इतने निकटस्थ विपक्षी व परम शत्रु का बैकग्राउंड न जान सके ?? एक विदेशी यूसुफजई पठान, मुस्लिम सल्तनत का जन्मजात हिमायती इनका पुत्र होने का अभिनय करता था और ये फूले न समाते थे।
◆ मराठों में कई राजनेता ऐसे थे जो अवध के नवाब, रुहेल्लों, बहमनियों, बीजापुर, गोलकुंडा की मुस्लिम रियासतों व मुगलों को विदेशी चरित्र का तथा हिन्दुत्व के सबसे बड़े शत्रु के रूप में मानते ही नहीं थे। बाजीराव प्रथम, शम्भाजी, ताराबाई, छत्रपति शिवाजी महाराज जी का दृष्टिकोण इस मायने में एकदम क्लीयर था लेकिन ये मराठा जागीरदार अदूरदर्शी थे।
◆◆ हिन्दुत्व का भला तो आज भी नहीं हो सकता। विश्व की सर्वाधिक दुर्भाग्यशाली प्रजाति तो हम अब भी हैं। सेकुलरिज्म के नुमायेदार, 80 प्रतिशत भद्र शिक्षित लिबरल हिन्दू ही हिन्दुत्व के सबसे कट्टर विरोधी है आज भी।
पानीपत तो आत्मा में धँसा खंजर है, जब हाथ लगे इस पर रक्त टपकता है, हथेली भीगती है। पोंछने के लिए हमारा कुर्ता ही शेष रह जाता है !
साभार
कुमार शिव
टिप्पणियाँ
कुमार शिव जी ने बड़ी लिखा है।
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत धन्यवाद
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